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         गुमनामी में रहे क्रांतिवीर सुखदेव राज 

                                                                                       -अनिल वर्मा 

                                   कुछ दिनों पूर्व मुझे   दुर्ग (छत्तीसगढ़) से  १४ कि.मी. दूर स्थित अंडा गावँ जाकर  प्रख्यात  क्रांतिकारी  सुखदेव राज के स्मारक के दर्शन करने का सौभाग्य मिला था , पर यह देखकर मन दुखित  हो गया कि वह क्रांतिवीर जो अमरशहीद चंद्रशेखर आज़ाद के अंतिम पलो का  साथी  था , जिसने  क्रांतिकारी भगत सिंह , आज़ाद , भगवतीचरण, दुर्गा भाभी आदि के  साथ मिलकर वतन की आज़ादी के लिए अपने प्राणो की बाज़ी लगा थी ,उसे आज  समाधिस्थल के आसपास रहने वाले लोग तक नहीं जानते है , उनकी श्वेतप्रतिमा पर सालो से जमी धूल मिट्टी  और मकड़ी के जाले  यह  बखूबी बयां  कर रहे थे कि स्वाधीन भारत में एक महान क्रांतिकारी के लिए लोगो के मन में  सम्मान की क्या भावनाएं बची है।

सुखदेव राज का अंडा स्थित स्मारक
वैशम्पायन के साथ सुखदेव राज
                                बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में उभरे क्रान्तिकारी  आंदोलन को जिन लोगो ने अपना सर्वस्व्  समर्पण कर पल्ल्वित किया , उनमें  सुखदेव राज का भी  प्रमुख स्थान है।  उनका जन्म ७ दिसम्बर १९०७ को पंजाब के गुरदासपुर जिला के एक  छोटे से गावं के धनाढ्य खत्री  परिवार  में हुआ था , माता ने  कठोर अनुशासन और ममता के साथ उनकी शिक्षा पर  काफी ध्यान  दिया , पर सन १९१९ में जलियाँवाला हत्या कांड में हज़ारो देशवासियों के बलिदान से प्रेरित होकर सुखदेव राज ने अपना जीवन भारत माता की आज़ादी के लिए समर्पित करने का संकल्प कर लिया।  लाहौर  से इण्टरमीडिएट प्रथम श्रेणी से पास करने के बाद पिता की जिद पर उन्होंने मजबूरन रेलवे के ऑडिट  ऑफिस में नौकरी कर ली , पर  लाहौर में  वह दौर क्रान्ति युग की शुरुवात का था , वह पहले क्रान्तिकारी भगवतीचरण वोहरा और उनकी पत्नी दुर्गा भाभी के संपर्क में आये , फिर भगत सिंह और धन्वन्तरी से उनकी मुलाकात हुई , सुखदेव ने फिर से कॉलेज में प्रवेश ले लिया ,वह स्टूडेंट फेडरेशन के सेक्रेटरी बन गए और सक्रिय  रूप से  क्रान्तिकारी दल से जुड़ गए.भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव द्वारा एडिशनल एस.पी.  साण्डर्स की हत्या करने की ऐतिहासिक घटना के लाहौर षड्यंत्र केस  में वह पृष्ठभूमि में थे भगवती चरण जी के कहने पर,सुखदेव राज दल के कार्य से कलकत्ता गए , पर वहां से रंगून चले गए ,वहां किसी तरह से सी. आय.डी.पुलिस से पीछा छुड़ाया , फिर वह कलकत्ता लौटकर कुछ दिनों तक शांतिनिकेतन में रहे।

                                   सुखदेव राज को २४ दिसम्बर सन १९२९ को वाइसराय की ट्रैन के नीचे बम रखने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया , तब लाहौर की बोस्टल जेल में निरूद्र रखा गया था , बाद में उन्हें जमानत पर छोड़ दिया गया . असेम्बली बम विस्फोट की ऐतिहासिक घटना में भगतसिंह  और बटुकेश्वर दत्त गिरफ्तार किये जा चुके थे , उन्हें छुड़ाने के लिए लाहौर  की बहावलपुर कोठी में  क्रान्तिकारी दल एकत्र था , सुखदेव राज भगवतीचरण के साथ रावी नदी के किनारे बम को परखने के लिए गए थे , तब अचानक हाथ   में बम फट जाने से भगवती भाई शहीद हो गए , इसके बाद पुलिस की सक्रियता बढ़ जाने से सुखदेव राज आज़ाद के आदेश पर बम्बई चले गए , वहां पर उन्होंने दुर्गा भाभी और पृथ्वीसिंह आज़ाद के साथ मिलकर लेमिंगटन रोड पर बम्बई के पुलिस कमिश्नर को शूट करने की साहसिक घटना में भाग लिया था , उसमे एक यूरोपियन अफसर मारा गया हुआ था , पुलिस ने दुर्गा भाभी और सुखदेव राज को घेर लिया , पर वो अंतिम समय पर पुलिस को चकमा देकर भाग निकले थे , वह द्वितीय लाहौर षड़यंत्र केस में फरार अभियुकत धोषित किया जा चुके  थे। भगत सिंह , सुखदेव , राजगुरु , यतीन्द्रनाथ दास , बटुकेश्वर दत्त ,सदाशिव मलकापुरकर , भगवानदास माहौर आदि की गिरफ्तारी से दल   छिन्न  भिन्न हो चूका था , पर तब भी सुखदेव राज दल के सेनापति चंद्रशेखर आज़ाद के साथ दल का पुनः संयोजन का प्रयास कर रहे थे ,२७ फरवरी सन  १९३१ को सुबह ८ बजे वह आज़ाद के साथ अल्फ्रेड पार्क इलहाबाद  में थे , तभी अचानक पुलिस ने उन्हें घेर लिया , आज़ाद  जीवटता से अंतिम समय तक पुलिस का डटकर मुकाबला करते हुए देश के लिए शहीद हो गए , पर उनके  आदेश पर सुखदेव राज उन्हें छोड़कर वहां से फरार  होना पड़ा , सुखदेव राज को आज़ाद को शहादत के समय छोड़कर जाने का दुःख सदैव सालता रहा , बाद में लाहौर में शालीमार पार्क में सुखदेव राज भी गिरफ्तार किये गए , उन्हें इस बार लाहौर जेल में कैद रखकर भीषण नारकीय यातनाये दी गयी ,उन्हें आर्म्स एक्ट में तीन साल की कठोर कारावास की सजा दी गयी ,, लाहौर में स्पेशल ट्रिब्यूनल के सामने उन पर द्वितीय लाहौर षड़यंत्र केस का मुकदमा चला और इस मामले में  उन्हें  तीन साल की सजा दी गयी , पर जेल के भीतर भी उनकी जीवटता और जिंदादिली में रंच मात्र भी कमी नहीं आई , वह वहाँ  भी अंग्रेजों  अफसरों के अन्याय पूर्ण दुर्व्यवहार के खिलाफ जमकर मुकाबला करते थे , वह करीब १५०० दिन लाहौर और मियांवाली जेल में सजा भोगे थे।
                                 आज़ादी को लेकर क्रांतिकारियों के मन में एक सपना था , जिसे जीवित क्रांतिकारियों ने आज़ादी के बाद ढहते देखा , इसी अपूर्णता को लेकर सुखदेव राज के भीतर बैचेनी बढ़ गयी और उन्होंने सदा के लिए घर छोड़ दिया , उन्होंने बौद्ध धर्म  अपना लिया , वह कई वर्षो तक गया में रहे , सन ५० के दशक में जब वो आचार्य विनोबा भावे से मिले , विनोबा जी उनसे कहा कि  क्रान्तिकारी को ऐसा जीवन शोभा नहीं देता है , फिर वह विनोबा जी की प्रेरणा से कुष्ठ रोगियों की सेवा में जुट गए। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री कैलाश नाथ काटजू के कहने पर वह दुर्ग जिले के अंडा गावं में आ गए और फिर उन्होंने कर्मठतापूर्वक यहाँ अपना बचा हुआ सम्पूर्ण जीवन कुष्ठ रोगियों की सेवा के मिशन के लिए समर्पित कर दिया , बाहरी दुनिया से उनका संपर्क कट गया ,काफी दिनों बाद उनके क्रन्तिकारी साथी वैशम्पायन ने जो रायपुर में महाकौशल पत्रिका के संपादक थे , उन्हें दुर्ग रेलवे स्टेशन पर देखकर पहचाना , फिर वैशम्पायन जी की प्रेरणा और सरोजिनी नायकर के सहयोग से उन्होंने एक पुस्तक '' जब जागी ज्योति '' लिखी थी।

                                             गुमनामी के अंधेरों में रहते हुए ही सुखदेव राज  ५ जुलाई १९७३ को दुनिया से अलविदा हो गए , उनकी मौत के बाद अंडा गावं में सन १९७६ में उनकी स्मृति में स्मारक बनाया गया , जिसका अनावरण म. प्र. के मुख्यमंत्री श्री श्यामाचरण शुक्ल ने किया था , पर स्मारक की वह जगह अब वो किसी गणपति प्रोडक्ट इंडस्ट्रीज को बेची जा चुकी है , उनका समाधि स्थल अब परिसर में बंद  है , बाहर कोई सूचना पटल तक नहीं है ,अब  यहाँ सुखदेव राज का स्मारक होने के बारे किसी को पता नहीं लगता है, छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार से यह  उम्म्मीद है कि वह इस महान क्रांतिवीर को सम्मान प्रदान करने के लिए उनके स्मारक को विकसित करेगी, ताकि उनसे युवा पीढ़ी को देशप्रेम और बलिदान की प्रेरणा मिल सके ।

कुष्ठरोग आश्रम का भवन
स्मारक पर अनिल वर्मा, अजीत बक्शी
उनके स्मारक पर अंकित उद्गार
सुखदेव राज द्वारा लिखित पुस्तक

क्रान्तिमूर्ति दुर्गाभाभी की जन्मस्थली शहजादपुर

                       

                                                                                           -अनिल वर्मा एवं हेत सिंह 

                                                            अपने जीवन को समिधा की भांति होम करके स्वाधीनता यज्ञ की पावन अग्नि को सदा प्रज्वलित करने वाली  क्रान्तिमूर्ति दुर्गा भाभी वास्तव में देश की आज़ादी की नींव के चन्द पत्थरों में से एक है .वह आज़ादी के लिए क्रांति के पथ पर चलने  वाली प्रथम भारतीय नारी थी,उन्होंने शौर्य और जीवटता के साथ क्रान्तिकारी आन्दोलन मे  सक्रिय योगदान दिया था .धन्य है,उत्तरप्रदेश के कौशाम्बी जिला के सिराथू तहसील के गाँव शहजादपुर की धरती,जिसने इस महान वीरांगना को जन्म दिया था . 

                            भगतसिंह, सुखदेव , आजाद आदि   प्रखर क्रांतिकारियों  की अनन्य साथी दुर्गा देवी बोहरा का जन्म ७ अक्टूबर १९०७ को शाहज़ादपुर में हुआ था , उनके पिता बांकेबिहारी भट्ट इलाहाबाद  कलेक्ट्रेट में  नाज़िर थे ,जब वह केवल १० माह की थी , तभी उनकी माता यमुना की मृत्यु हो गयी ,पिता ने दूसरा विवाह कर लिया , सौतेली माँ ने  प्रताड़ित करके कर तीसरी कक्षामें ही उनकी पदाई छुड़ा दी थी , पिता को भी वैराग्य की धुन लग गयी थी ,बुआ जी  की  सख्त संरक्षकता में शहजादपुर और गंगा नदी के किनारे  करेहटी की कुटी में उनका बचपन बीता था  ,महज 11 वर्ष की अल्पायु में ही सन १९१७-१८ में भगवती शरण बोहरा से उनका विवाह हो गया , वह  प्रखर  देशभक्त थे , उनके साथ ने दुर्गा देवी के मन में भी राष्ट्रप्रेम और  देश की आज़ादी के लिए संघर्ष करने की अलख  जगा दी थी .हालाँकि उनके ससुर अंग्रेजपरस्त थे , जब उन्हें ब्रिटिश हूकुमत रायबहादुर का ख़िताब से विभूषित करने  जा रही थी ,तब इसके विरोध में भगवतीचरण और दुर्गा देवी ने उनका घर त्याग  दिया ,फिर दुर्गा देवी ने पति की प्रेरणा से अपनी अधूरी  पढाई  पूरी की और  नेशनल कॉलेज लाहौर से प्रभाकर की उपाधि ली थी  .

                                                          ससुर की मौत के बाद अंग्रेज सरकार द्वारा प्रताड़ित करने पर दुर्गा देवी अपने पति सहित १७ अगस्त १९२० को शहजादपुर आ गयी थी  ,२ माह तक वह दोनों यहाँ चोरी छिपे क्रांतिकारियों की  मदद करते रहे ,   अपार धन दौलत , एश्वर्य और सुखों को त्याग कर क्रांति के कंटक  से भरे मार्ग पर चलना कठिन तपस्या की भांति था ,दुर्गा   देवी  को ससुर जी से ४० हज़ार रूपये मिले थे ,हालाँकि पिता उनकी क्रांति पथ  के पघधर  नहीं थे , फिर भी उन्होंने दुर्गा के लिए ५ हज़ार रूपये श्री बटुक नाथ अग्रवाल के पास रखवा दिए थे , बाद में यह सम्पूर्ण राशि क्रान्तिकारी गतिविधियों के संचालन में  काफी काम आयी थी  .  

                    दुर्गा भाभी ने अपने पति भगवतीचरण बोहरा  साथ मिलकर अंग्रेजो के खिलाफ  सशस्त्र  क्रान्तिकारी  गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लिया  , उन्होंने भगत सिंह , सुखदेव , राजगुरु , आजाद और यशपाल के साथ कन्धा से कन्धा  मिलाकर  आज़ादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी  , सभी क्रान्तिकारी साथी उन्हें आदर से ''भाभी ''  कहते थे , उनके पति भगवती शरण ने भगतसिंह के साथ मिलकर क्रान्तिकारी दल हिन्दुस्तानी रिपब्लिक आर्मी का गठन किया था , लाहौर में रावी के तट के किनारे बम विस्फोट में पति की शहादत के सदमे को भी उन्होंने अदम्य  धैर्य एवं हौसले  से झेला था और अपने वैधव्य के दर्द को भुला कर अपना जीवन दल और देश के लिए समर्पित कर दिया था . क्रान्तिकारी दल द्वारा अंग्रेज पुलिस कप्तान सांडर्स के वध उपरांत उन्होंने भगत सिंह और उनके साथियों को पुलिस लाहौर के चप्पे चप्पे में शिकारी कुत्तों की तरह तलाश कर रही थी , तब दुर्गा भाभी ने  अफसर के वेशधारी भगत सिंह की पत्नी बनकर   मेमसाहब के रूप धारण कर के  अपने छोटे से बच्चे शची का जीवन भी खतरे में डालकर उन्हें  ट्रेन से लाहौर से कलकत्ता पहुचने में असीम शौर्य  का परिचय दिया था .उनका दूसरा खास काम लैमिग्टन रोड गोलीकांड को अंजाम देना था ,  9 अक्टूबर १९३० को उन्होंने बम्बई  के गवर्नर हैली को मौत के घाट उतरने के लिए  उसी  बंगले में धुसकर  गोलिया चलायी थी , पर दुर्भाग्य से  हैली तो बच गया , परन्तु एक अग्रेज अफसर और  महिला को गोली लगी थी .

                                           सन १९३१ में भगतसिंह , राजगुरु और सुखदेव फांसी पर चढकर शहीद हो गए , आजाद सहित सभी प्रमुख क्रान्तिकारी   शहीद हो गए थे अथवा पकड़ जा चुके  थे , क्रान्तिकारी दल छिन्नं भिन्न हो गया , गहन हताशा का दौर था फिर भी दुर्गा भाभी क्रान्तिकारी  बुलंद हौसले के साथ आन्दोलन को आगे बढ़ने में जुटी रही , अंततः वह भी पकड़ी गयी और जेल  गयी , जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने कुछ दिनों तक दिल्ली में कांग्रेस के साथ काम किया , फिर उन्होंने सन १९३९ में लखनऊ के पुराना किला इलाके में एक मांटेसरी स्कूल की स्थापना की और इसके बाद उन्होंने  अपना संपूर्ण जीवन  बच्चो की  शिक्षा और समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया , बाद में उन्होंने यही पर क्रान्तिकारी शिव वर्मा के साथ मिलकर शहीद स्मारक और स्वतंत्रता संग्राम शोध संस्थान की स्थापना की थी और बाद में अपनी पूरी सम्पति संस्थान को समर्पित करके उनके इकलौते बेटे शचि के पास गाज़ियाबाद चली गयी , वही पर १४  अक्टूबर  १९९९ को दुर्गा भाभी ने दुनिया को अलविदा कर दिया था .

                                 दुर्गा भाभी का शादी के बाद शहजादपुर आना जाना लगा रहता था , वह सन १९४२ में पिता की मृत्यु के बाद यहाँ आई थी , फिर उनका शहजादपुर आना संभव न हो सका , मेरे आदरणीय बुजुर्ग शुभचिंतक   श्री हेतसिंह जी  के भीतर ८० वर्ष की आयु  में  आज भी राष्ट्रप्रेम का  वही अनूठा जज्बा है , जो स्वाधीनता के पूर्व युवावस्था में था , देशभक्तों  और क्रांतिकारियों की  उपेक्षा से उनका मन  बहुत व्यथित रहता है . वह स्वयं गत १ अप्रैल २०१४  को शहजादपुर गए थे और दुर्गा भाभी के चचेरे भतीजे श्री उदयशंकर भट्ट से मिले थे , उदय जी ने उन्हें यह  बताया कि उनके पूर्वज करीब ३५० वर्ष पूर्व गुजरात से यहाँ आकर बस गए  थे , कालांतर में यहाँ उनके पूर्वजो की जमींदारी कायम हो गयी थी ,  दुर्गा भाभी और भगवती शरण जी के क्रान्तिकारी हो जाने से अंग्रेजो ने उनके परिवार की  सारी संपत्ति कुर्क कर हडप ली थी , पर उन्हें अपने परिवार के इस महान वीरांगना पर गर्व है . 

                                      स्वाधीनता उपरांत  महान क्रान्तिकारी दुर्गा भाभी ने देश के लिए  अपनी महान सेवाओं के लिए कोई प्रतिफल नहीं चाहा , उनसे कम उपलब्धि हासिल करने वाली एक महिला क्रान्तिकारी   सरकार  ने भारत रत्न से नवाजा , जबकि भाभी  पूर्णता गुमनामी के अँधेरे में खोयी रही  . यह विडम्बना है कि अपनी ही सरजमीं  पर भी  दुर्गा भाभी आज तक यथोचित सम्मान से वंचित है ,  राजनेताओं द्वारा अनेक बार घोषणायें करने के बावजूद शाहजादपुर में दुर्गा  भाभी का आज तक कोई राष्ट्रीय स्मारक नहीं बन सका  है,  शहजादपुर में जिस ऐतिहासिक घर में दुर्गा भाभी का जन्म हुआ था ,उसकी  पावंन भूमि हर देशभक्त के लिए एक तीर्थ की भांति नमन किये जाने योग्य  पवित्र स्थल   है , पर आज भी वह मकान  जीर्णशीर्ण हालत में  पड़ा हुआ है , दुर्गा भाभी के  नाम का सहारा लेकर राजनीति की वैतरणी पार करने वाले नेताओ द्वारा  उनकी  कोई सुध न लिया बेहद शर्मनाक है ,आज यह स्थिति शहजादपुर की ही नहीं वरन पूरे देश की है , क्रांतिकारियों और स्वाधीनता संग्राम सेनानियों से जुड़े अधिकांश  ऐतिहासिक स्थल उपेक्षा के शिकार हो रहे  है . उनका अस्तित्व ही मिटने की कगार पर है , आगामी   पीढ़ियों के लिए  देश की आज़ादी के इतिहास की इस बेशकीमती विरासत को  संजोने की किसी को कोई फिक्र नहीं है .निसंदेह स्वाधीनता के उपरांत हम आर्थिक और भौतिक रूप से विकास  की बुलंदियों तक पहुँच रहे है, पर यह भी कटुसत्य  है कि स्वाधीन भारत के वाशिंदों  ने अपनी नीवं के उन पत्थरों को भुला दिया है , जिन पर तरक्की की यह बुलंद इमारते खड़ी  है .

                                   '' जिनकी लाशो पर चलकर यह आज़ादी आई है 
                                       उनकी याद बहुत ही गहरी लोगो ने दफनाई है .''

                                                                                                - अनिल वर्मा (मो. न. 09425181793   )
                                                                                                - हेत सिंह    (मो. न. 07275020220 )  
  
( निवेदन -  कृपया पाठक गण लेख पर टीप लिखकर अपने विचारों से अवगत करने का कष्ट करे )

    

                                                          
                           
दुर्गा भाभी का जन्मस्थल 

दुर्गा भाभी का मकान







Bhagat Singh's revolutionary Brother Sardar Kultar Singh

          भगत सिंह के क्रान्तिकारी भाई  कुलतार सिंह   

           

with Anil Verma
 son Kiranjeet Singh , Anil Verma,Joravar 


Kultar singh ,his wife Satvinder with Actor manoz kumar


with his family

with Mata Vidhyavati


                                              अमर शहीद भगत सिंह का सम्पूर्ण परिवार देशप्रेम और बलिदान की अनुपम मिसाल है , भगत सिंह की शहादत के बाद उनके परिवार में क्रांति की मशाल को उनके छोटे भाई कुलतार सिंह ने बखूबी थामा था . भगत सिंह ने अपनी  फांसी के २० दिन पूर्व सेंट्रल जेल लाहौर से  कुलतार सिंह को लिखे गए अंतिम पत्र में हौसले बनाये रखने की नसीहत देते हुए लिखा था कि -

                                       ''  कोई दम भर का मेहमां हूँ, ऐ अहले- महफ़िल 
                                                     चिरागे-सहर हूँ, बुझा चाहता हूँ 
                                           हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिज़ली ,
                                           ये मुश्ते-खाक है फानी, रहे रहे न रहे ''


                                  कुलतार सिंह ने   इन शब्दों को जीवन में आत्मसात करके , देश और समाज की सेवा करते हुए जीवन में हर कठिन घड़ी का सामना बुलंद हौसले के साथ किया . २९ अगस्त १९१८ को नवांकोट लाहौर( अब पाकिस्तान ) में जन्मे कुलतारसिंह को वतन से मोहब्बत का जूनून विरासत में मिला था . पिता किशनसिंह की निर्भीकता  एवं सादगी, चाचा अजीत सिंह और भाई भगत सिंह के  त्याग और बलिदान  के  श्रेष्ठ गुण उनकी रगों में समाये हुए थे . चाचा  सरदार अजीत सिंह ३७ वर्ष तक देश के बाहर रहकर आज़ादी के लिए लड़ते रहे , उन्हीं  की निस्संतान पत्नी हरनाम कौर ने ही  कुलतार सिंह की परवरिश की थी , उन्होंने  खटकरकलाँ  के उसी प्राथमिक  स्कूल से विद्यार्जन किया  था , जहाँ कभी  भगतसिंह भी  पढ़े थे,   बचपन से ही भगतसिंह उन्हें बहुत चाहते थे,वह  भगत सिंह से जेल में भी मिलने जाते थे , भगतसिंह ने उन्हें  अपने अंतिम पत्र में लिखा भी था कि  तुम्हारे आंसू मुझसे सहन नहीं होते है . 

                                    कुलतार सिंह नौजवान भारत सभा के संस्थापक सदस्यों  से थे .फिर सन १९२९ में लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में वह सेवादल के सदस्य भी रहे .भाई भगत सिंह ने अपने आदर्शों पर कायम रहकर  फांसी के फन्दे पर झूलकर देश की युवा पीढ़ी में क्रांति की जो अग्नि प्रज्वलित की थी , उसने कुलतार सिंह के अंतर्मन पर भी गहरा असर डाला था ,  सन १९३५ में उन्हें जॉर्ज पंचम के सिल्वर जुबली कार्यकर्मों  में बाधा डालने का काम सौंपा गया था , जिसमें वह    पंजाब के कई जिलों  में बिजली की सप्लाई फ़ेल करके  बखूबी कामयाब रहे थे . सन १९३६-४० में वह पंजाब किसान सभा में सक्रिय रहे , १ मार्च १९३७ को  श्रीमती सतिन्दर कौर के साथ उनका विवाह हुआ था , अंग्रेजों ने कुलतार सिंह को द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान १९३९ से १९४५ तक रावलपिंडी , गुजरात , लाहौर और देवली की विभिन्न जेल में निरुद्ध रखा  था , उस दौरान उन्होंने जीवटतापूर्वक  एक बार ६३दिन और फिर ३२ दिन की  लम्बी भूख हडताल की थी .  तब सतिंदर कौर ने उस संघर्ष के दौर  में ना  केवल साहस   के साथ घर और खेती-बाड़ी  संभाली  , वरन भगत सिंह के माता पिता की खूब सेवा भी की थी .

                                 सन १९४७ में स्वाधीनता प्राप्ति उपरांत जब लायलपुर से विस्थापित  होनें के बाद कुलतार सिंह का परिवार जब वापस जलंधर लौटा , तब वह ४ वर्ष तक शरणार्थियों की सेवा और पुनर्वास के कामों में जुटे रहे , फिर सन १९५१ में वह सहारनपुर में फॉर्महाउस खरीदकर वही बस गए , सन १९६३ में जब भगत सिंह  के अनन्य साथी  बटुकेश्वर दत्त माता विद्यावती से मिलने खटकरकलां पधारे थे  , तब कुलतारसिंह ने बहुत जोश से उनका शानदार स्वागत कराया था . सन १९७४ में  वह उत्तरप्रदेश  विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की ओर से  सहारनपुर से विधायक निर्वाचित हुए थे, फिर उ. प्र.  के मुख्यमन्त्री श्री  नारायण दत्त तिवारी ने उन्हें अपने मत्रिमंडल में खाद्य और राजनैतिक पेंशन विभाग का राज्यमंत्री बनाया था , तब उन्होंने हजारों स्वाधीनता संग्राम सेनानियों के लंबित पेंशन प्रकरण निपटाए थे ,  लखनऊ के पास काकोरी में भव्य  काकोरी स्मारक बनवाया   और सन १९७६ में उनके अनथक प्रयासों से ही वाराणसी में अमरशहीद  चन्द्रशेखर आज़ाद के अस्थि कलश को खोज कर कई शहरों में जुलूस निकालने  के उपरांत  लखनऊ संग्रहालय  में स्थापित किया गया था ,

                         सन १९८६ में जब पंजाब आतंकवाद के दावानल से धधक रहा था , तब  कुलतार सिंह ने अमेरिका,कनाडा और ब्रिटेन की यात्रा करके  प्रवासी  सिक्खों में अलगाव और  आतंकवाद के  खिलाफ संघर्ष करने की अलख जगायी थी , उन्होंने क्रान्तिकारी शिव वर्मा , दुर्गा भाभी , जयदेव कपूर , शचीन्द्र नाथ बक्शी के साथ मिलकर शहीदों के अधूरे सपनों को पूरा करने का अभियान जारी रखा , वह शहीद शोध संस्थान  लखनऊ और उत्त्तर प्रदेश स्वाधीनता सेनानी संघ के अध्यक्ष भी रहे  तथा आर्य समाज की गतिविधियों से भी सदैव जुड़े रहे , उन्होंने अपने  दोनों  पुत्र  जोरावर सिंह ,  किरनजीत सिंह तथा तीनों पुत्रियों वीरेंद्र, इन्द्रजीत और कवलजीत को   देशभक्ति के पारिवारिक संस्कार दिए थे , वीरेन्द्र संधू ने भगत सिंह पर प्रख्यात पुस्तक '' भगत सिंह एवं उनके मृत्युंजय  पुरखे ' लिखी है .  डॉ. के . एल. जौहर ने कुलतार सिंह  पर  एक पुस्तक '' सरदार कुलतार सिंह सिम्बल ऑफ करेज एंड  कनविक्शन ''लिखी है. 

                            यह मेरा परम सौभाग्य है कि मैंने  सन २००३ में प्रधुम्न नगर सहारनपुर( उ.प्र.) में  स्थित' भगत सिंह निवास 'जाकर  इस महान क्रांतिकारी  की चरणधूलि और आशीर्वाद प्राप्त किया था , तब वह बीमारी और वृद्धवास्था  के कारण अधिक बोलने की स्थिति में नहीं थे  . पहले ३ जून २००४ को  कुलतार सिंह जी की पत्नी श्रीमती सतविंदर कौर दुनिया से विदा हो गयी  , फिर उसके २ माह बाद ५ सितम्बर २००४ को चंडीगढ़ में कुलतार सिंह भी इस नश्वर संसार को छोड़कर चले गए , पर आज़ादी की लड़ाई में शहीद भगतसिंह के साथ  कुलतार सिंह जी की यादें भी हमेशा कायम रहेगी 

                                                                                                                       -अनिल  वर्मा  .








Krantikari Durga Bhabhi

 Krantikari Durga Bhabhi             (Durgavati Devi )


                      Durga Bhabhi  (Birth-7 October, 1907) was an Indian revolutionary and a  Great patriot. She was one of the few women revolutionaries who took an active participation in armed revolution against the ruling British. She is best known for having accompanied Bhagat Singh on the train journey in which he made his escape in disguise after the Saunders killing, Since she was wife of another HSRA member Bhagwati Charan Vohra, other members of HSRA referred her as 'Bhabhi' (elder brother's wife) and became popular as "Durga Bhabhi" in Indian revolutionary cirlces. Durga was a Bengali and her mother tongue was Bengali. Durgavati Devi was married to Bhagwati Charan Vohra when she was aged eleven.her husband was also a revolutionary &  he died during a bumb explosion near Lahore.

                            She tried to kill Lord Hailey on October 1, 1931 at Lamington Road, Bombay  . Lord Hailey escaped but many of associates died.She was caught by the police and imprisoned for three years.  She was caught by the police and imprisoned for three years. She had also sold her ornaments worth Rs. 3,000 to rescue Bhagat Singh and his comrades under trial. 

                                   After Indian independence Durga bhabhi started living as a common citizen in quite anonymity and exclusion in Ghaziabad. She later opened a school for poor children in purana kila area Lucknow. Prime minister Pandit Jawaharlal Nehru visited her school in 1956. that school is now known as Montesory school, she also donated her land for Shaheed Sodh Sansthan, established by her revolunary member Shiv Verma ,  Durga Devi died in Ghaziabad on 15 October 1999 at the age of 92.  A terror to the British police she was "The Agni of India’, a flashback of its ancient heritage of sacrifice and fearlessness, a legend in her lifetime.                                                                                          - Anil verma