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आजाद की शहादत: १९३१ में ब्रिटैन में छपी खबर

                 

                                                                               - अनिल वर्मा  

                                          अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत को करीब ८६ साल व्यतीत  हो चुके है , पर आज भी आज़ाद का नाम लेते ही अपार जोश से भुजाये फड़कने उठती  है और  जहन  में देशभक्ति  और बलिदान  का जज्बा सैलाब की भांति उमड़ने लगता है।   चंद्रशेखर तिवारी   ने बचपन में बनारस में १५ बैत की सजा पाने के बाद आज़ाद नाम वरण किया था, वह क्रान्तिकारी दल हिसप्रस के सेनापति होने के नाते दल के सभी महत्वपूर्ण एक्शन में शामिल थे ,ब्रिटिश हुकूमत ने आज़ाद को जिन्दा या मुर्दा पकड़वाने के लिए २५,००० हजार रूपये का ईनाम  घोषित किया था ,पर अपने नाम को सार्थक करते हुए वह आजीवन आज़ाद रहे और अंततः २७ फरवरी १९३१ को अल्फ्रेड पार्क इलाहाबाद में ब्रिटिश पुलिस से बहादूरीपूर्वक लड़ते हुए वतन  की आज़ादी  के लिए भारत माता की गोद में सदा के लिए सो   गए ।   यह विडंबना है कि स्वाधीनता उपरांत भी  इस महान क्रांतिकारी पर  नगण्य  शोध  हुआ है ,यद्यपि अब उनसे संबधित इतिहास  मिटने की कगार पर आ गया है ,फिर भी   उनके  बारे में कभी कभार नए संस्मरण सामने आ जाते  है।आज़ाद की शहादत उपरांत ब्रिटैन के एक छोटे से अखबार में उनके बारे में छपी एक खबर मैंने   गहन शोध उपरांत हासिल की है , जो  सर्वप्रथम  बार देश के सामने प्रस्तुत  है ।


               उन दिनों इंग्लैंड के स्कॉटलैंड काउंटी  के एनगस शहर में डुंडी नामक छोटे से स्थान से '' Dundee Evening Telegraph ''अख़बार प्रकाशित होता था।  इस अख़बार के २ मार्च १९३१ के ऐतिहासिक अंक में शीर्षक  '' Crowd   throw  flowers before  procession '' से वर्णित  समाचार में भारतीय  क्रांतिकारी चंद्र शेखर आज़ाद के ब्रिटिश पुलिस के साथ मुठभेड़ में अल्फ्रेड पार्क इलाहाबाद में मारे जाने , उनकी शिनाख्त एवं पोस्टमार्टम किये जाने तथा अंतिम यात्रा का जुलूस निकाले जाने का महत्वपूर्ण उल्लेख है।  समाचार में यह भी बताया गया था कि आज़ाद के रिश्तेदार व बनारस के कांग्रेसी सदस्य श्री शिव विनायक मिश्र ने उनका अंतिम संस्कार किया थाऔर  आज़ाद की अंतिम यात्रा के जुलुस  के दौरान शहर की गलियों में उन पर पुष्प वर्षा  की गयी थी और उनके पार्थिव देह क़ी राख को काले  रंग के हस्तनिर्मित कपड़े में  सहेज कर रखा गया था।    


                   

 

                                       

                      ब्रिटैन के अख़बार की इस दुर्लभ कतरन के साथ भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की सुनहरी यादों को ताजा करते हुए , अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद को सादर शृद्धा सुमन अर्पित है।


                                                                                                                            - अनिल वर्मा



                                                           
                                         
              अमरशहीद चंद्रशेखर आज़ाद की टोपी 
                                                                                  - अनिल वर्मा 
 
                                     



                                           अमरशहीद चंद्रशेखर आज़ाद ने बाल्यकाल  में वाराणसी में वीरतापूर्वक १५ बैत की सजा भुगतने के बाद यह भीष्म  प्रतिज्ञा ली थी कि   ब्रिटिश हुकूमत उन्हें फिर कभी जीते जी पकड़ नहीं पायेगी।  वह सन १९२५ के काकोरी ट्रैन डकैती कांड से लेकर २७ फरवरी सन १९३१ को अपनी शहादत  तक लगातार फरार रहे,इस दौरान ब्रिटिश हुकूमत   पूरे देश मेंउनकी तलाश में शिकारी  कुत्तो की तरह पीछे पड़ी रही , पर वह  फिर कभी पुलिस के हत्थे नही चढे। उनके इस लंबे और सफल फरारी जीवन का मुख्य राज यह   था कि वह  अपनी पहचान छिपाये रखने के लिए अपना परिवेश  , बोलचाल  और वेश भूषा निरंतर बदलते रहते थे  और उनका व्यक्तित्व ऐसा अनूठा था  कि वह वेश बदल कर  कभी निपट देहाती बन जाते ,तो  कभी  साधु संत, पंडित, सेठजी, या  शिकारी बन जाते थे  , फिर उनके परिचित तक उन्हें पहचान नहीं पाते थे।

                        अभी हाल में जनवरी २०१७ में मुझे कानपुर में अमरशहीद चंद्रशेखर आजाद की ऐसी ही एक दुर्लभ  टोपी देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ .जिसके बारे में आज भी बहुत कम लोग जानते है. कानपुर के परेड इलाके की तंग गलियो में सन १९३३-३૪ के बने तिलक मेमोरियल हाल में एक पुरानी लायब्रेरी में आजाद की यह टोपी रखी हुई है. सन १९२५ में काकोरी कांड के बाद आजाद ट्रेन से कानपुर जा रहे थे. तब तक अधिकांश क्रन्तिकारी पकडे जा चुके थे। उन्हें  भलीभांति यह आभास था कि कानपुर में सी.आई. डी पुलिस सरगर्मी से उन्हें चप्पे चप्पे में तलाश कर रही है. वो गंगाघाट स्टेशन पर उतरकर पैदल ही गंगापुल पार करके पटकापुर में अपने परिचित श्री नारायण प्रसाद अरोडा के घर चले गये और सुबह वहां से रवाना होते समय उन्होने वेष बदलने के लिये अपनी खादी टोपी उतारकर अरोडा जी के बेटे द्रोण को दे दी और उसका हैट पहनकर बेख़ौफ़  पटकापुर की गलियो से होते हुए, सकुशल अपनी राह पर आगे बढ़  गये थे । 

                            आज़ाद की   इस टोपी को श्री नारायण प्रसाद अरोड़ा ने आजीवन बहुत संभाल कर  रखा था , वह हर साल   यह टोपी केवल राखी के समय ही  पहनते थे। अरोड़ा जी की मृत्यु उपरांत उनके पौत्र डा. अरविन्द अरोडा ने इस टोपी को तिलक मेमोरियल सोसाइटी कानपुर को भेंट किया  था . अमरशहीद आजाद की इस  ऐतिहासिक टोपी को  देख कर मैं काफी भावुक हो गया था. उस समय मेरे साथ श्री क्रांति कुमार कटियार जी भी थे .जो कि शहीद भगत सिंह के अन्यय साथी और लाहौर षड़यंत्र केस में कालापानी की यातना  भुगतने वाले महान क्रांतिकारी डा. गया प्रसाद कटियार  के सुपुत्र है. 
                                                                                                                      -अनिल वर्मा
            आजाद की माता की लाड़ली बहू : शांता मलकापुरकर 
 
                                                                                                                           - अनिल वर्मा

शांता ताई और अनिल वर्मा
आज़ाद की माता जगरानी देवी
आज़ाद
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सदाशिव राव मलकापुरकर



                                                 इतिहास के पन्ने गवाह है कि अमरशहीद चन्द्रशेखर आज़ाद  ने वतन के लिए अपना घर परिवार  और  जिंदगी सहित सर्वस्व बलिदान कर दिया था।  27 फरवरी 1931 को आज़ाद के अल्फ्रेड पार्क इलाहबाद शहीद होने के पूर्व उनके चारो भाई काल कलवित हो चुके थे , 2 -3 साल बाद उनके पिता प. सीताराम तिवारी का भी निधन हो गया , फिर अकेली रह गयी उनकी वृद्ध माता जगरानी देवी को असहाय हालात में भाभरा (जिला अलीराजपुर म. प्र. )  में एक छोटी सी टूटी फूटी कुटिया में भीलों के बीच जीवन संध्या व्यतीत करना पड़ी। यह विडम्बना है कि देश के लिए मर मिटने वाले इस अमर शहीद की माता को 1 -2 पैसे के गोबर के उपले बेचकर जो सस्ता अनाज कोदो कुटकी नसीब होता   था ,  रोटी बनाने के लिए अपर्याप्त न होने से उसे पानी में  घोलकर  किसी तरह से पेट की भूख मिटाना पड़ती  थी. इधर अनपढ़ भील उसे  यह ताने देते थे कि तेरा बेटा तो चोर डाकू था ,इसलिए ब्रिटिश हूकूमत ने उसे मार गिराया था , वह बेचारी गरीब देहाती महिला अपने आँसुओ को पीकर  दुनिया से अपना मुँह छिपाते फिरती थी।

                                                                               देश की आज़ादी के बाद सन 1949 में आज़ाद के दांये हाथ माने जाने वाले उनके विश्वस्त साथी क्रांतिकारी सदशिवराव मलकापुरकर को जब माता जी के जीवित होने की जानकारी मिली, तो वह माता जी को ससम्मान  अपने घर ले आये।  माताजी उनके साथ कभी झाँसी और कभी रहली (जिला सागर म. प्र. )में रहने लगी।  सदाशिवराव के बड़े भाई शंकरराव भी क्रांतिकारी थे , उन्हें भी जलगांव बम केस में  जेल की सजा हुई थी . दोनों भाईयो ने असीम सेवा और स्नेह से माता जी को कभी भी बेटे की कमी महसूस न होने दी , सदाशिव ने तो आज़ाद के पदचिन्हों पर चलते हुए शादी नहीं की थी , पर शंकरराव की पत्नी शान्ता ताई माताजी की बहुत सेवा करती थी और माताजी भी उन्हें प्यार से दुल्हन कहती थी और उन पर खूब वात्सल्य लुटाती थी , 1949 में सदाशिव और शान्ता ताई ने माताजी की  चारो धाम की तीर्थयात्रा  की अंतिम अभिलाषा पूरी करायी थी .माताजी अक्सर कहती भी थी कि यदि चंदू (चंद्रशेखर आज़ाद ) जिन्दा भी होता तो इससे ज्यादा क्या सेवा करता।

                   मेरा यह परम सौभाग्य है कि सागर में पदस्थापना के दौरान मुझे मलकापुरकर परिवार के  सानिध्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ था , शंकरराव जी बड़े पुत्र हेमन्त राव मलकापुरकर के साथ मिलकर हम लोग हर साल 27 फरवरी को आज़ाद जयंती पर किसी न किसी क्रांतिकारी के वंशज को रहली आमंत्रित कर कार्यक्रम आयोजित करते थे ,आदरणीय माता जी (शांता ताई ) मेरे प्रति असीम स्नेह रखती थी , आज़ाद और उनकी माता जी के उल्लेख से ही वो खिल उठती थी , जब मैं उनके चरणस्पर्श करता था, तो वो बड़े प्यार से हाथ पकड़कर मुझे अपने गले लगा लेती थी , मैं भी स्नेहित भाव से उनमे अपनी स्व. माँ का अक्स  पाकर गदगद हो जाता था . माता जी 90 वर्ष की उम्र के पड़ाव पर भी एकदम स्वस्थ थी , वो घर , मोहल्ले ,बाजार सब तरफ आसानी से पैदल घूम फिर आती थी।

                                                    वक्त के धपेड़े भी माताजी के मानसपटल से 60 -62 पुरानी  स्मृतियों को धूमिल नहीं कर सके थे , वह अक्सर उत्साहपूर्वक यह बताती थी कि आज़ाद की माताजी उनके साथ अधिकतर झाँसी वाले घर में रहती थी और कभी कभी रहली के इस घर में आकर भी रहती थी ,वह रहली से ही उनके साथ अधिकांश तीर्थ यात्राओ पर गयी थी .माता जी सुबह जल्दी उठ जाती थी , उन्हें बिना प्याज लहसुन का सादा खाना पसंद था , वह अपना खाना खुद बनाती थी और सदु (सदाशिव) को भी खिलाती थी ,उन्हें मैथी के लडडू बहुत पसंद थे ,वह पुरी जाते समय भी अपने साथ डिब्बे भर के मैथी के लड्डू ले गयी थी।   माता जी ने ही उनके छोटे बेटे जगन्नाथ का नामकरण किया था  और बहुत लाड़ प्यार के साथ झाँसी से बच्चे के लिए 5 रु. भेजे थे , जिससे बहुत सारे कपङे , खिलौने , गद्दे रजाई ख़रीदे गए थे  , पर बिचारी वह  उस बच्चे का मुँह न देख पायी , आजाद की माता जगरानी देवी ने  23 मार्च 1951 को  झाँसी में सदाशिव की बाँहों में अंतिम सांसे ली थी। शान्ता ताई  आज़ाद की माता का लोहे संदूक ,और लोटा स्मृतिचिन्ह के बतौर आजीवन सहेज कर रखी रही , हम लोग उस संदूक और लोटे का स्पर्श कर खुद को धन्य महसूस  करते थे। इन सब ऐतिहासिक घटनाचक्रों  का  मेरी पुस्तक ''आजाद की माता जगरानी देवी '' में विस्तृत वर्णन किया गया है।

                                                     करीब 3 साल पहले माताजी (आदरणीय शान्ता ताई ) के गिर जाने से उनके कूल्हे की हड्डी टूटने पर डॉक्टरों सहित किसी को भी यह यकीन  न था कि  वो 93 साल की आयु में डायबिटीज़ के रहते हुए दुबारा फिर कभी बिना सहारा के चल सकेगी , पर उनमे तो आज़ाद और उनकी जन्मदायिनी माता की दिव्यशक्ति का अंश था , उन्होंने अपनी प्रबल इचछा शक्ति के दम पर 6 -7 माह में बिना सहारे के चल फिर कर सबको चकित कर  दिया था , पर फिर एक बेटे की मौत ने उनके अंतर्मन को तोड़ दिया और वो यह कहने लगी थी कि अब मुझे जाने दो।  उन्हें अभी २ दिन पहले ही जब उन्हें दिल  और लकवे के दौरे के कारण गंभीर स्थिति में सागर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था ,तब भी हम सब को फिर उन्हें  पूर्ण स्वस्थ  देखने की आस थी , पर आज 25 अगस्त 2016 को दोपहर के समय वह हम सब को रोते बिलखते छोड कर अपनी प्यारी सासूमाँ (माता जगरानी) के पास सदैव के लिए उस अंतिम यात्रा पर चली गयी है , जहाँ से फिर कभी उनकी वापसी न हो सकेगी। परमपिता ईश्वर से यही वंदना है कि उनकी पुण्य आत्मा को अपने चरणों में स्थान प्रदान करे।

                                                                                                                               - अनिल वर्मा

विलुप्त हो चुका है : प्रताप प्रेस का 'प्रताप'


                         गणेशशंकर विद्यार्थी और प्रताप प्रेस

                                                                                      - अनिल वर्मा

कटियार जी के साथ प्रताप में

प्रताप एक ओर चित्र

प्रताप का बंद दरवाजा
प्रताप पिछला दरवाजा


प्रताप सामने से एक विहगम चित्र

                       

                                         कानपुर के फीलखाना स्थित प्रताप प्रेस की लगभग खंडहर में तब्दील हो चुकी ऐतिहासिक इमारत भारतीय क्रांतिकारी युग की गवाह रही है , पर यहाँ की फ़िज़ाओं में अब भी अमरशहीद गणेशशंकर विद्यार्थी , भगत सिंह , चन्द्रशेखर आज़ाद ,अशफ़ाक़ उल्ला ,रामप्रसाद बिस्मिल आदि के त्याग और बलिदान की खुशबू समायी हुई हैं। महान क्रांतिकारियों की कर्मस्थली रहा ऐतिहासिक प्रताप प्रेस अब कठिन दौर से गुजर रहा है। सुनहरे इतिहास के नाम पर अब यहां सिर्फ प्रेस के बंद पड़े जर्जर दरवाजे ही बचे है।
                                                                          
                                   आजादी की जंग में जान फूँकने के लिए गणेश शंकर विद्यार्थी ने‘ 9 नवम्बर 1913 को कानपुर से प्रताप हिंदी साप्ताहिक पत्र 'प्रताप' का प्रकाशन आरंभ किया था। विधार्थी जी ने महाराणा प्रताप के उच्च त्याग और स्वातंत्र्य-प्रेम, आत्म गौरव से प्रेरित होकर अपने पत्र का नाम ‘प्रताप’ रखा था। ‘प्रताप’ के प्रथम अंक में मुखपृष्ठ पर , आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी द्धारा यह अमर पंक्तियां लिखी गयी थी -

                                            ' जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है,
                                                             वह नर नहीं, नर-पशु निरा है और मृतक समान है।’

                                       प्रताप का का कुल बजट, चार भागीदारों गणेशशंकर विद्यार्थी, नारायण प्रसाद अरोड़ा, शिवनारायण मिश्र और यशोदानंदन  के सौ-सौ रुपए के  हिस्से जोड़कर उतना ही था, जितने में आज चार किलो मूंगफली आती है। संपादक गणेशशंकर विद्यार्थी ही  थे।  अखबार की शुरुआत टेब्लॉयड से बड़े आकार में 16 पृष्ठों से हुई। उस समय ‘प्रताप’ का कार्यालय शहर के एक छोर पर पीली कोठी में रखा गया था। सोलह अंकों के बाद, छपाई का भुगतान समय से न हो पाने के कारण यह व्यवस्था रुक गई। यशोदानंदन ने अपना हिस्सा भी अखबार से वापस ले लिया। लगभग साल भर बाद नारायण प्रसाद अरोड़ा भी अपना निजी अखबार निकालने के इरादे से अलग हो गए। बाकी बचे विद्यार्थी जी और शिवनारायणजी। उनका तो एक ही संकल्प था ‘प्रताप’। विद्यार्थी जी के पास  पैसा नहीं था ,अपना प्रेस नहीं था , दूसरे प्रेस वाले छापने को तैयार नहीं , पर विद्यार्थी जी इससे जरा भी विचलित न हुए। उन्होंने जल्द ही  एक छोटा-सा अपना प्रेस भी खड़ा कर लिया और प्रेस का  कार्यालय भी पीली कोठी से उठकर फीलखाना वाली बिल्डिंग में आ गया, जो ‘प्रताप’ की अंतिम सांस (1964) तक उसका प्रकाशन-स्थल रहा और इसे ‘प्रताप प्रेस’ के नाम से जाना जाता रहा। वैसे था वह भी किराए पर ही। इन परिवर्तनों के बावजूद ‘प्रताप’ की आर्थिक दशा में कोई सुधार नहीं हुआ। कुर्सी मेज खरीदने की सामर्थ्य न थी, दरी और चटाई पर बैठकर संपादन, प्रबंधन और डिस्पैच के सब काम अंजाम दिए जाते। संपादक, मैनेजर से लेकर चपरासी और दफ्तरी तक का काम गणेशजी और मिश्रजी को स्वयं करना पड़ता था । 


                                 गणेश शंकर विद्यार्थी ने प्रताप के प्रथम अंक में ही यह स्पष्ट कर दिया था कि उनकी पत्रकारिता राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन, सामाजिक आर्थिक क्रांति, राष्ट्रीय गौरव, साहित्यिक सांस्कृतिक विरासत के लिए ही समर्पित है।उन्होंने ‘प्रताप’ के माध्यम से न केवल क्रान्ति का नया बिगुल फूँका था और बल्कि इसे एक ऐसा समाचार पत्र बना दिया, जो हिन्दी पत्रकारिता की आस्था और शक्ति का प्रतीक बन गया। इसमें देश के हर हिस्से में हो रहे अत्याचारों के बारे में जानकारियाँ प्रकाशित होती थीं, जिन्हे पढकर लोगों में आक्रोश भड़कने लगा था और वे ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए और भी उत्साहित हो उठे थे. प्रताप की आक्रामकता को देखते हुए अँग्रेज प्रशासन ने इसके लेखको व संपादकों को तरह-तरह की प्रताड़नाएँ दी, लेकिन यह पत्र अपने लक्ष्य पर डटा रहा।
 
                      प्रताप की पहचान लगातार अंग्रेजों के विरोध में लिखने से सरकार विरोधी बन गई थी और कानपुर के तत्कालीन मजिस्ट्रेट मि. स्ट्राइफ ने अपने हुक्मनामे में प्रताप को ‘बदनाम पत्र’ की संज्ञा देकर जमानत की राशि जब्त कर ली। विद्यार्थी जी की कलम ने स्वाधीनता आन्दोलन की क्रांति को ही प्रखर नहीं किया, बल्कि पूंजीवाद और सामन्तवाद की जनविरोधी नीतियों का भी अपनी पत्रकारिता के माध्यम से विरोध किया।विद्यार्थी जी को ‘प्रताप‘ में प्रकाशित समाचारो के कारण ही १९२१ से १९३१ तक पाँच बार जेल जाना पड़ा , विद्यार्थी जी ने सदैव निर्भीक एवं निष्पक्ष पत्रकारिता की। उनके पास पैसा और समुचित संसाधन नहीं थे, परन्तु उनके भीतर एक ऐसी असीम ऊर्जा थी, जिसका संचरण स्वतंत्रता प्राप्ति के निमित्त होता था। ‘प्रताप‘ प्रेस के निकट तहखाने में निर्मित पुस्तकालय में सभी जब्तशुदा क्रान्तिकारी साहित्य एवं पत्र-पत्रिकाएं उपलब्ध थी। यह ‘प्रताप’ ही था जिसने दक्षिण अफ्रीका से विजयी होकर लौटे तथा भारत के लिये उस समय तक अनजान महात्मा गाँधी की महत्ता को समझा और चम्पारण-सत्याग्रह की नियमित रिपोर्टिंग कर राष्ट्र को गाँधी जी जैसे व्यक्तित्व से परिचित कराया। चौरी-चौरा तथा काकोरी काण्ड के दौरान भी विद्यार्थी जी ‘प्रताप’ के माध्यम से नियमित लिखते रहे। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा रचित सुप्रसिद्ध देशभक्ति कविता पुष्प की अभिलाषा प्रताप अखबार में ही मई १९२२ में प्रकाशित हुई। बालकृष्ण शर्मा नवीन, सोहन लाल द्विवेदी, सनेहीजी, प्रताप नारायण मिश्र इत्यादि ने प्रताप के माध्यम से अपनी देशभक्ति को मुखर आवाज दी।
                                             प्रताप में ना  केवल क्रान्तिकारी लेखो का प्रकाशन होता था , बल्कि यह क्रांतिकारियों की अभेद्य शरणस्थली भी था , प्रेस की अनूठी बनावट ही कुछ ऐसी थी कि जिसमें छिपकर रहा जा सकता था तथा फिर सघन बस्ती में तलाशी होने पर एक मकान से दूसरे मकान की छत पर आसानी से जाया जा सकता था।  बनारस षडयंत्र केस के फरार अभियुक्त सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य प्रताप अखबार में उपसम्पादक थे। बाद में भट्टाचार्य और प्रताप अखबार से ही जुड़े पं. राम दुलारे त्रिपाठी को काकोरी काण्ड में सजा मिली थी । अमर शहीद भगत सिंह ने अपने फरारी के दिनों में ‘प्रताप‘ अखबार में बलवन्त सिंह के छद्म नाम से लगभग ढाई वर्ष तक पत्रकारिता का कार्य किया।   उन्होंने दरियागंज दिल्ली में हुये दंगे का समाचार एकत्र करने के लिए दिल्ली की यात्रा करने के बाद ‘प्रताप’ के लिए सचिन दा के सहयोग से दो कालम का समाचार तैयार किया था ।   चन्द्रशेखर आजाद से भगत सिंह की मुलाकात विद्यार्थी जी ने ही कानपुर में करायी थी, फिर तो शिव वर्मा सहित तमाम क्रान्तिकारी जुड़ते गये। यह विद्यार्थी जी ही थे कि जेल में भेंट करके क्रान्तिकारी राम प्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा छिपाकर लाये तथा उसे ‘प्रताप‘ प्रेस के माध्यम से प्रकाशित करवाया। १९१६ में लखनऊ कांग्रेस के बाद महात्मा गाँधी और लोकमान्य तिलक इक्के पर बैठकर प्रताप प्रेस आये एवं वहाँ दो दिन रहे थे ।
                                                     भगतसिंह और उनके साथियों की शहादत के उपरांत २५ मार्च १९३१ को चौबे गोला कानपुर में भीषण दंगे में घिरे हुए परिवारों की रक्षा के लिए विद्यार्थी जी ने अपने जीवन को बलिदान कर दिया था। खून के प्यासे दंगाइयों से घिरे होने पर भी विद्यार्थी जी ने अंत में जीवटता पूर्वक यह कहा था- ‘ यदि मेरे खून से ही सींचे जाने से हिन्दू-मुस्लिम एकता का पौधा बढ़ सके और तुम्हारे खून की प्यास बुझ सके, तो मेरा खून कर डालो।' उनके निधन पर   महात्मा गांधी ने अपनी पत्रिका ‘यंग इंडिया’ में लिखा था ‘ उनका खून हिन्दु-मुसलमानों के दिलों को जोड़ने के लिए सीमेंट बनेगा।' 
                                  
                                              विद्यार्थी जी की शहादत के बाद से ही प्रताप प्रेस का चमक खोने का सिलसिला शुरू हो गया । विद्यार्थी जी की मौत के बाद बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' प्रताप प्रेस के संपादक बने।उनके बाद बिहारी लाल ओमर को संपादक बना दिया गया।  कुछ ही दिनों बाद प्रताप प्रेस में ताला पड़ गया।  जब यहां से प्रिंटिंग बंद हो गई तो भवन के असली मालिक रहे शिव नारायण मिश्रा के बेटे ने भवन को अपने कब्जे में ले लिया। जहां पर छपाई होती थी, उस कमरे का दरवाजा बंद करके ताला लगा दिया गया। कुछ समय बाद भवन के अलग- अलग हिस्सों को अलग- अलग लोगों को बेच दिया। गत 23  मार्च 2016 को भगतसिंह की शहादत दिवस पर, उनके उनके साथी रहे डॉ. गयाप्रसाद के सुपुत्र क्रांति  कुमार कटियार के साथ जब मैं फीलखाना कानपुर की सकंरी गलियों में स्थित प्रताप प्रेस देखने गया ,तो यह देखकर मन दुःखित हो गया कि इतिहास के पन्नों में इतना अहम होने के बाद भी प्रताप प्रेस की आज कोई सुध लेने वाला नहीं है,। क्रान्तिकारी युग की मशाल रहा यह भवन अपनी बदहाली पर आसूं बहाता शिकस्त हालत में मिटने की कगार पर आ गया हैं ,यह विडम्बना है कि स्वाधीनता उपरांत भी प्रताप और विद्यार्थी जी की यादों को संजोने के लिए देश और समाज ने कुछ भी नहीं कर सका है ।विद्यार्थी जी को पत्रकारिता का पुरौधा मानने वाले नामी गिरामी और धनवान अख़बार प्रताप प्रेस के भवन पर एक बोर्ड तक नहीं लगवा पाये हैं . कविवर सनेही जी के शब्दों में हम कह सकतें हैं-  
          
                                                     ''  दीवान-ए-वतन गया, जंजीर रह गई,                                 
                                                     चमकी चमक के कौन की तकदीर रह गई।                                   
                                                     जालिम फलक ने लाख मिटाने की फिक्र की,                                      
                                                     हर दिल में अक्स रह गया तस्वीर रह गई। ''

                                                                                                                            - अनिल  वर्मा


पत्रकारिता के महान पुरोधा थे गणेशशंकर विद्याथी,क्रांतिकारी कार्य करने केलिएपांच बार सश्रम कारागार अंग्रेजी शासन ने दिया
गणेशशंकर विद्यार्थी आज ही के दिन 25 मार्च सन 1931 को कानपुर के हिन्दू-मुस्लिम दंगे में निस्सहायों को बचाते हुए साम्प्रदायिकता की भेंट चढ़ गए थे। इसी दंगे में उनकी मौत हो गई। उनका शव अस्पताल में लाशों के ढेर में पड़ा मिला। वह इतना फूल गया था कि पहचानना तक मुश्किल था। नम आँखों से 29 मार्च को विद्यार्थी जी का अंतिम संस्कार कर दिया गया। गणेशशंकर विद्यार्थी एक ऎसे साहित्यकार रहे, जिन्होंने देश में अपनी कलम से सुधार की क्रांति उत्पन्न की।
जीवन-
गणेशशंकर विद्यार्थी का जन्म 26 अक्टूबर, 1890 में अपने ननिहाल इलाहाबाद में हुआ था। इनके पिता का नाम जयनारायण था। पिता एक स्कूल में अध्यापक थे और उर्दू तथा फ ारसी के अच्छे जानकार थे। गणेशशंकर विद्यार्थी की शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर के मुंगावली में हुई थी। पिता के समान ही इन्होंने भी उर्दू-फारसी का अध्ययन किया।
गणेशशंकर विद्यार्थी एक निडर और निष्पक्ष पत्रकार तो थे ही, इसके साथ ही वे एक समाज-सेवी, स्वतंत्रता सेनानी और कुशल राजनीतिज्ञ भी थे। भारत के स्वाधीनता संग्राम में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा था। कलम की ताकत हमेशा से ही तलवार से अधिक रही है और ऎसे कई पत्रकार हैं, जिन्होंने अपनी कलम से सत्ता तक की राह बदल दी। गणेशशंकर विद्यार्थी भी ऎसे ही पत्रकार थे, जिन्होंने अपनी कलम की ताकत से अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी थी। गणेशशंकर विद्यार्थी एक ऎसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जो कलम और वाणी के साथ-साथ महात्मा गांधी के अहिंसक समर्थकों और क्रांतिकारियों को समान रूप से देश की आजादी में सक्रिय सहयोग प्रदान करते रहे।
पत्रकारिता के महान पुरोधा थे गणेशशंकर विद्याथी
किशोर अवस्था में उन्होंने समाचार पत्रों के प्रति अपनी रूचि को जाहिर कर दिया था। वे उन दिनों प्रकाशित होने वाले भारत मित्र, बंगवासी जैसे अन्य समाचार पत्रों का गंभीरता पूर्वक अध्ययन करते थे। इसका असर यह हुआ कि पठन-पाठन के प्रति उनकी रूचि दिनों दिन बढ़ती गई। उन्होंने अपने समय के विख्यात विचारकों वाल्टेयर, थोरो, इमर्सन, जान स्टुअर्ट मिल, शेख सादी सहित अन्य रचनाकारों की कृतियों का अध्ययन किया। वे लोकमान्य तिलक के राष्ट्रीय दर्शन से बेहद प्रभावित थे।
महात्मा गांधी ने उन दिनों अंग्रेजों के खिलाफ अहिंसात्मक आंदोलन की शुरूआत की थी, जिससे विद्यार्थी जी सहमत नहीं थे, क्योंकि वे स्वभाव से उग्रवादी विचारों के थे। विद्यार्थी जी ने मात्र 16 वर्ष की अल्प आयु में "हमारी आत्मोसर्गता" नामक एक किताब लिख डाली थी। वर्ष 1911 में भारत के चर्चित समाचार पत्र सरस्वती में उनका पहला लेख आत्मोसर्ग शीर्षक से प्रकाशित हुआ था, जिसका संपादक हिन्दी के विद्धान आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा किया जाता था। वे द्विवेदी के व्यक्तित्व एवं विचारों से प्रभावित होकर पत्रकारिता के क्षेत्र में आये।
द्विवेदी के सानिध्य में सरस्वती में काम करते हुए उन्होंने साहित्यिक, सांस्कृतिक सरोकारों के प्रति अपना रूझान बढ़ाया। इसके साथ ही वे महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के पत्र "अभ्युदय" से भी जुड़ गये। इन समाचार पत्रों से जुड़े और स्वाधीनता के लिए समर्पित पंडित मदन मोहन मालवीय, जो कि राष्ट्रवाद की विचारधारा का जन जन में प्रसार कर सके। अपने सहयोगियों एवं वरिष्ठजनों से सहयोग मार्गदर्शन का आश्वासन पाकर अंतत: विद्यार्थी जी ने 9 नवम्बर 1913 से "प्रताप" नामक समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारंभ कर दिया।
पत्रकारिता के क्षेत्र में क्रांतिकारी कार्य करने के कारण उन्हें पांच बार सश्रम कारागार और अर्थदंड अंग्रेजी शासन ने दिया। विद्यार्थी जी के जेल जाने पर "प्रताप" का संपादन माखनलाल चतुर्वेदी व बालकृष्ण शर्मा नवीन करते थे। उनके समय में श्यामलाल गुप्त पार्षद ने राष्ट्र को एक ऎसा बलिदानी गीत दिया जो देश के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक छा गया। यह गीत "झण्डा ऊंचा रहे हमारा" है। इस गीत की रचना के प्रेरक थे अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी ने जालियावाला बाग के बलिदान दिवस 13 अप्रैल 1924 को कानपुर में इस झंडागीत के गाने का शुभारंभ हुआ था।
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पत्रकारिता के महान पुरोधा थे गणेशशंकर विद्याथी,क्रांतिकारी कार्य करने केलिएपांच बार सश्रम कारागार अंग्रेजी शासन ने दिया
गणेशशंकर विद्यार्थी आज ही के दिन 25 मार्च सन 1931 को कानपुर के हिन्दू-मुस्लिम दंगे में निस्सहायों को बचाते हुए साम्प्रदायिकता की भेंट चढ़ गए थे। इसी दंगे में उनकी मौत हो गई। उनका शव अस्पताल में लाशों के ढेर में पड़ा मिला। वह इतना फूल गया था कि पहचानना तक मुश्किल था। नम आँखों से 29 मार्च को विद्यार्थी जी का अंतिम संस्कार कर दिया गया। गणेशशंकर विद्यार्थी एक ऎसे साहित्यकार रहे, जिन्होंने देश में अपनी कलम से सुधार की क्रांति उत्पन्न की।
जीवन-
गणेशशंकर विद्यार्थी का जन्म 26 अक्टूबर, 1890 में अपने ननिहाल इलाहाबाद में हुआ था। इनके पिता का नाम जयनारायण था। पिता एक स्कूल में अध्यापक थे और उर्दू तथा फ ारसी के अच्छे जानकार थे। गणेशशंकर विद्यार्थी की शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर के मुंगावली में हुई थी। पिता के समान ही इन्होंने भी उर्दू-फारसी का अध्ययन किया।
गणेशशंकर विद्यार्थी एक निडर और निष्पक्ष पत्रकार तो थे ही, इसके साथ ही वे एक समाज-सेवी, स्वतंत्रता सेनानी और कुशल राजनीतिज्ञ भी थे। भारत के स्वाधीनता संग्राम में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा था। कलम की ताकत हमेशा से ही तलवार से अधिक रही है और ऎसे कई पत्रकार हैं, जिन्होंने अपनी कलम से सत्ता तक की राह बदल दी। गणेशशंकर विद्यार्थी भी ऎसे ही पत्रकार थे, जिन्होंने अपनी कलम की ताकत से अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी थी। गणेशशंकर विद्यार्थी एक ऎसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जो कलम और वाणी के साथ-साथ महात्मा गांधी के अहिंसक समर्थकों और क्रांतिकारियों को समान रूप से देश की आजादी में सक्रिय सहयोग प्रदान करते रहे।
पत्रकारिता के महान पुरोधा थे गणेशशंकर विद्याथी
किशोर अवस्था में उन्होंने समाचार पत्रों के प्रति अपनी रूचि को जाहिर कर दिया था। वे उन दिनों प्रकाशित होने वाले भारत मित्र, बंगवासी जैसे अन्य समाचार पत्रों का गंभीरता पूर्वक अध्ययन करते थे। इसका असर यह हुआ कि पठन-पाठन के प्रति उनकी रूचि दिनों दिन बढ़ती गई। उन्होंने अपने समय के विख्यात विचारकों वाल्टेयर, थोरो, इमर्सन, जान स्टुअर्ट मिल, शेख सादी सहित अन्य रचनाकारों की कृतियों का अध्ययन किया। वे लोकमान्य तिलक के राष्ट्रीय दर्शन से बेहद प्रभावित थे।
महात्मा गांधी ने उन दिनों अंग्रेजों के खिलाफ अहिंसात्मक आंदोलन की शुरूआत की थी, जिससे विद्यार्थी जी सहमत नहीं थे, क्योंकि वे स्वभाव से उग्रवादी विचारों के थे। विद्यार्थी जी ने मात्र 16 वर्ष की अल्प आयु में "हमारी आत्मोसर्गता" नामक एक किताब लिख डाली थी। वर्ष 1911 में भारत के चर्चित समाचार पत्र सरस्वती में उनका पहला लेख आत्मोसर्ग शीर्षक से प्रकाशित हुआ था, जिसका संपादक हिन्दी के विद्धान आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा किया जाता था। वे द्विवेदी के व्यक्तित्व एवं विचारों से प्रभावित होकर पत्रकारिता के क्षेत्र में आये।
द्विवेदी के सानिध्य में सरस्वती में काम करते हुए उन्होंने साहित्यिक, सांस्कृतिक सरोकारों के प्रति अपना रूझान बढ़ाया। इसके साथ ही वे महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के पत्र "अभ्युदय" से भी जुड़ गये। इन समाचार पत्रों से जुड़े और स्वाधीनता के लिए समर्पित पंडित मदन मोहन मालवीय, जो कि राष्ट्रवाद की विचारधारा का जन जन में प्रसार कर सके। अपने सहयोगियों एवं वरिष्ठजनों से सहयोग मार्गदर्शन का आश्वासन पाकर अंतत: विद्यार्थी जी ने 9 नवम्बर 1913 से "प्रताप" नामक समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारंभ कर दिया।
पत्रकारिता के क्षेत्र में क्रांतिकारी कार्य करने के कारण उन्हें पांच बार सश्रम कारागार और अर्थदंड अंग्रेजी शासन ने दिया। विद्यार्थी जी के जेल जाने पर "प्रताप" का संपादन माखनलाल चतुर्वेदी व बालकृष्ण शर्मा नवीन करते थे। उनके समय में श्यामलाल गुप्त पार्षद ने राष्ट्र को एक ऎसा बलिदानी गीत दिया जो देश के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक छा गया। यह गीत "झण्डा ऊंचा रहे हमारा" है। इस गीत की रचना के प्रेरक थे अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी ने जालियावाला बाग के बलिदान दिवस 13 अप्रैल 1924 को कानपुर में इस झंडागीत के गाने का शुभारंभ हुआ था
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पत्रकारिता के महान पुरोधा थे गणेशशंकर विद्याथी,क्रांतिकारी कार्य करने केलिएपांच बार सश्रम कारागार अंग्रेजी शासन ने दिया
गणेशशंकर विद्यार्थी आज ही के दिन 25 मार्च सन 1931 को कानपुर के हिन्दू-मुस्लिम दंगे में निस्सहायों को बचाते हुए साम्प्रदायिकता की भेंट चढ़ गए थे। इसी दंगे में उनकी मौत हो गई। उनका शव अस्पताल में लाशों के ढेर में पड़ा मिला। वह इतना फूल गया था कि पहचानना तक मुश्किल था। नम आँखों से 29 मार्च को विद्यार्थी जी का अंतिम संस्कार कर दिया गया। गणेशशंकर विद्यार्थी एक ऎसे साहित्यकार रहे, जिन्होंने देश में अपनी कलम से सुधार की क्रांति उत्पन्न की।
जीवन-
गणेशशंकर विद्यार्थी का जन्म 26 अक्टूबर, 1890 में अपने ननिहाल इलाहाबाद में हुआ था। इनके पिता का नाम जयनारायण था। पिता एक स्कूल में अध्यापक थे और उर्दू तथा फ ारसी के अच्छे जानकार थे। गणेशशंकर विद्यार्थी की शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर के मुंगावली में हुई थी। पिता के समान ही इन्होंने भी उर्दू-फारसी का अध्ययन किया।
गणेशशंकर विद्यार्थी एक निडर और निष्पक्ष पत्रकार तो थे ही, इसके साथ ही वे एक समाज-सेवी, स्वतंत्रता सेनानी और कुशल राजनीतिज्ञ भी थे। भारत के स्वाधीनता संग्राम में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा था। कलम की ताकत हमेशा से ही तलवार से अधिक रही है और ऎसे कई पत्रकार हैं, जिन्होंने अपनी कलम से सत्ता तक की राह बदल दी। गणेशशंकर विद्यार्थी भी ऎसे ही पत्रकार थे, जिन्होंने अपनी कलम की ताकत से अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी थी। गणेशशंकर विद्यार्थी एक ऎसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जो कलम और वाणी के साथ-साथ महात्मा गांधी के अहिंसक समर्थकों और क्रांतिकारियों को समान रूप से देश की आजादी में सक्रिय सहयोग प्रदान करते रहे।
पत्रकारिता के महान पुरोधा थे गणेशशंकर विद्याथी
किशोर अवस्था में उन्होंने समाचार पत्रों के प्रति अपनी रूचि को जाहिर कर दिया था। वे उन दिनों प्रकाशित होने वाले भारत मित्र, बंगवासी जैसे अन्य समाचार पत्रों का गंभीरता पूर्वक अध्ययन करते थे। इसका असर यह हुआ कि पठन-पाठन के प्रति उनकी रूचि दिनों दिन बढ़ती गई। उन्होंने अपने समय के विख्यात विचारकों वाल्टेयर, थोरो, इमर्सन, जान स्टुअर्ट मिल, शेख सादी सहित अन्य रचनाकारों की कृतियों का अध्ययन किया। वे लोकमान्य तिलक के राष्ट्रीय दर्शन से बेहद प्रभावित थे।
महात्मा गांधी ने उन दिनों अंग्रेजों के खिलाफ अहिंसात्मक आंदोलन की शुरूआत की थी, जिससे विद्यार्थी जी सहमत नहीं थे, क्योंकि वे स्वभाव से उग्रवादी विचारों के थे। विद्यार्थी जी ने मात्र 16 वर्ष की अल्प आयु में "हमारी आत्मोसर्गता" नामक एक किताब लिख डाली थी। वर्ष 1911 में भारत के चर्चित समाचार पत्र सरस्वती में उनका पहला लेख आत्मोसर्ग शीर्षक से प्रकाशित हुआ था, जिसका संपादक हिन्दी के विद्धान आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा किया जाता था। वे द्विवेदी के व्यक्तित्व एवं विचारों से प्रभावित होकर पत्रकारिता के क्षेत्र में आये।
द्विवेदी के सानिध्य में सरस्वती में काम करते हुए उन्होंने साहित्यिक, सांस्कृतिक सरोकारों के प्रति अपना रूझान बढ़ाया। इसके साथ ही वे महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के पत्र "अभ्युदय" से भी जुड़ गये। इन समाचार पत्रों से जुड़े और स्वाधीनता के लिए समर्पित पंडित मदन मोहन मालवीय, जो कि राष्ट्रवाद की विचारधारा का जन जन में प्रसार कर सके। अपने सहयोगियों एवं वरिष्ठजनों से सहयोग मार्गदर्शन का आश्वासन पाकर अंतत: विद्यार्थी जी ने 9 नवम्बर 1913 से "प्रताप" नामक समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारंभ कर दिया।
पत्रकारिता के क्षेत्र में क्रांतिकारी कार्य करने के कारण उन्हें पांच बार सश्रम कारागार और अर्थदंड अंग्रेजी शासन ने दिया। विद्यार्थी जी के जेल जाने पर "प्रताप" का संपादन माखनलाल चतुर्वेदी व बालकृष्ण शर्मा नवीन करते थे। उनके समय में श्यामलाल गुप्त पार्षद ने राष्ट्र को एक ऎसा बलिदानी गीत दिया जो देश के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक छा गया। यह गीत "झण्डा ऊंचा रहे हमारा" है। इस गीत की रचना के प्रेरक थे अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी ने जालियावाला बाग के बलिदान दिवस 13 अप्रैल 1924 को कानपुर में इस झंडागीत के गाने का शुभारंभ हुआ था।
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पत्रकारिता के महान पुरोधा थे गणेशशंकर विद्याथी,क्रांतिकारी कार्य करने केलिएपांच बार सश्रम कारागार अंग्रेजी शासन ने दिया
गणेशशंकर विद्यार्थी आज ही के दिन 25 मार्च सन 1931 को कानपुर के हिन्दू-मुस्लिम दंगे में निस्सहायों को बचाते हुए साम्प्रदायिकता की भेंट चढ़ गए थे। इसी दंगे में उनकी मौत हो गई। उनका शव अस्पताल में लाशों के ढेर में पड़ा मिला। वह इतना फूल गया था कि पहचानना तक मुश्किल था। नम आँखों से 29 मार्च को विद्यार्थी जी का अंतिम संस्कार कर दिया गया। गणेशशंकर विद्यार्थी एक ऎसे साहित्यकार रहे, जिन्होंने देश में अपनी कलम से सुधार की क्रांति उत्पन्न की।
जीवन-
गणेशशंकर विद्यार्थी का जन्म 26 अक्टूबर, 1890 में अपने ननिहाल इलाहाबाद में हुआ था। इनके पिता का नाम जयनारायण था। पिता एक स्कूल में अध्यापक थे और उर्दू तथा फ ारसी के अच्छे जानकार थे। गणेशशंकर विद्यार्थी की शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर के मुंगावली में हुई थी। पिता के समान ही इन्होंने भी उर्दू-फारसी का अध्ययन किया।
गणेशशंकर विद्यार्थी एक निडर और निष्पक्ष पत्रकार तो थे ही, इसके साथ ही वे एक समाज-सेवी, स्वतंत्रता सेनानी और कुशल राजनीतिज्ञ भी थे। भारत के स्वाधीनता संग्राम में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा था। कलम की ताकत हमेशा से ही तलवार से अधिक रही है और ऎसे कई पत्रकार हैं, जिन्होंने अपनी कलम से सत्ता तक की राह बदल दी। गणेशशंकर विद्यार्थी भी ऎसे ही पत्रकार थे, जिन्होंने अपनी कलम की ताकत से अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी थी। गणेशशंकर विद्यार्थी एक ऎसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जो कलम और वाणी के साथ-साथ महात्मा गांधी के अहिंसक समर्थकों और क्रांतिकारियों को समान रूप से देश की आजादी में सक्रिय सहयोग प्रदान करते रहे।
पत्रकारिता के महान पुरोधा थे गणेशशंकर विद्याथी
किशोर अवस्था में उन्होंने समाचार पत्रों के प्रति अपनी रूचि को जाहिर कर दिया था। वे उन दिनों प्रकाशित होने वाले भारत मित्र, बंगवासी जैसे अन्य समाचार पत्रों का गंभीरता पूर्वक अध्ययन करते थे। इसका असर यह हुआ कि पठन-पाठन के प्रति उनकी रूचि दिनों दिन बढ़ती गई। उन्होंने अपने समय के विख्यात विचारकों वाल्टेयर, थोरो, इमर्सन, जान स्टुअर्ट मिल, शेख सादी सहित अन्य रचनाकारों की कृतियों का अध्ययन किया। वे लोकमान्य तिलक के राष्ट्रीय दर्शन से बेहद प्रभावित थे।
महात्मा गांधी ने उन दिनों अंग्रेजों के खिलाफ अहिंसात्मक आंदोलन की शुरूआत की थी, जिससे विद्यार्थी जी सहमत नहीं थे, क्योंकि वे स्वभाव से उग्रवादी विचारों के थे। विद्यार्थी जी ने मात्र 16 वर्ष की अल्प आयु में "हमारी आत्मोसर्गता" नामक एक किताब लिख डाली थी। वर्ष 1911 में भारत के चर्चित समाचार पत्र सरस्वती में उनका पहला लेख आत्मोसर्ग शीर्षक से प्रकाशित हुआ था, जिसका संपादक हिन्दी के विद्धान आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा किया जाता था। वे द्विवेदी के व्यक्तित्व एवं विचारों से प्रभावित होकर पत्रकारिता के क्षेत्र में आये।
द्विवेदी के सानिध्य में सरस्वती में काम करते हुए उन्होंने साहित्यिक, सांस्कृतिक सरोकारों के प्रति अपना रूझान बढ़ाया। इसके साथ ही वे महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के पत्र "अभ्युदय" से भी जुड़ गये। इन समाचार पत्रों से जुड़े और स्वाधीनता के लिए समर्पित पंडित मदन मोहन मालवीय, जो कि राष्ट्रवाद की विचारधारा का जन जन में प्रसार कर सके। अपने सहयोगियों एवं वरिष्ठजनों से सहयोग मार्गदर्शन का आश्वासन पाकर अंतत: विद्यार्थी जी ने 9 नवम्बर 1913 से "प्रताप" नामक समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारंभ कर दिया।
पत्रकारिता के क्षेत्र में क्रांतिकारी कार्य करने के कारण उन्हें पांच बार सश्रम कारागार और अर्थदंड अंग्रेजी शासन ने दिया। विद्यार्थी जी के जेल जाने पर "प्रताप" का संपादन माखनलाल चतुर्वेदी व बालकृष्ण शर्मा नवीन करते थे। उनके समय में श्यामलाल गुप्त पार्षद ने राष्ट्र को एक ऎसा बलिदानी गीत दिया जो देश के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक छा गया। यह गीत "झण्डा ऊंचा रहे हमारा" है। इस गीत की रचना के प्रेरक थे अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी ने जालियावाला बाग के बलिदान दिवस 13 अप्रैल 1924 को कानपुर में इस झंडागीत के गाने का शुभारंभ हुआ था।
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क्रांतिकारी आज़ाद और उनका अचूक निशाना


                                                                                       -अनिल वर्मा
                                                                                

     



                                         



                     भारत माता की स्वाधीनता के लिए अटूट संघर्ष और बलिदान करने वालो में महान क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद का नाम सर्वोपरि है। क्रान्ति का यह आलौकिक मसीहा गुलाम देश में रहते हुए भी जीवनपर्यन्त आज़ाद रहा और अपना नाम अंत तक सार्थक किया।

                                     महान क्रांतिवीर आजाद का सम्पूर्ण जीवन साहस ,वीरता और राष्ट्रप्रेम की अनुपम मिसाल है। वह सशस्त्र क्रांति के महानायक थे , उनका यह मानना था कि जीवन के सुख ऐश्वर्य और क्रांतिपथ सर्वथा भिन्न है। वह दल के कमांडर-इन चीफ के रूप अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ एक फौजी की भाँति निशानेबाज़ी के  सतत अभ्यास  का प्रयास करते थे।  आज़ाद की सबसे बड़ी अभिरुचि थी निशानेबाज़ी , इसके वह दीवाने  थे , वह यह कहते थे कि  एक क्रान्तिकारी को योग्य सैनिक होना चाहिए ,अन्यथा संकट आने पर वह मात खा सकता है। आज़ाद  अपने बाल्यकाल में भीलों के साथ तीर कमान के सतत अभ्यास से निपुण  निशानेबाज़ हो गए थे , यह भी कहा जाता है कि उन्होंने किशोरावस्था में बांसों के झुरमुट में छुपकर शेरो का शिकार किया था। कालांतर में क्रान्तिकारी जीवन में तीर कमान की जगह पिस्तौल ने ले ली  , तब उनका निशाना इतना अचूक हो गया था कि वह दूर रखी एक लौंग को भी आसानी से गोली से उड़ा सकते  थे। यह रोचक कल्पना की जा सकती है कि यदि आज़ाद  उस दौर  के ओलिंपिक या राष्ट्रमंडल खेल में निशानेबाज़ी के मुकाबले में भाग ले रहे होते , तो निसंदेह  स्वर्णपदक उनके गले में ही सुशोभित होता।

                         आज़ाद की अचूक निशानेबाज़ी की  गाथाएँ किवदन्तियाँ बन चुकी है।  लाहौर में एडीशनल एस.पी. सांडर्स के वध के समय भगतसिंह और राजगुरु का तेजी से पीछा कर रहे हवलदार चननसिंह की गिरफ्त से उन्हें बचा लेना आज़ाद के प्रिय माउज़र पिस्तौल का ही कमाल था , जब एक साथ तीन व्यक्त्ति पास पास इतनी तेज़ी से भाग रहे हो , तब निशाने की अल्प चूक भी अपने ही साथी को ढेर कर सकती थी , परन्तु  तनाव की उस विकट परिस्थिति में भी एकग्रता कायम रखकर तत्परता पूर्वक निशाना साधते हुए वांछित व्यक्ति को मार गिराना आज़ाद के बलबूते की ही बात थी।

               प्रख्यात क्रान्तिकारी यशपाल ने  अपनी पुस्तक '' सिंहावलोकन ' में आज़ाद के इस शौक का उल्लेख करते हुए लिखा है कि आगरा में रहने के दौरान आज़ाद साथियों को   निशानाबाज़ी में पारंगत करने के लिए बुंदेलखंड के जंगलो में ले जाते थे ,इस काम में आज़ाद को जो अनुपम सुख मिलता था ,उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है , दूर किसी महीन चीज़ को सही निशाना लगाने से उन्हें काम से काम उतना संतोष होता था ,जितना कोई बहुत बड़ी उक्ति कह देने पर किसी कवि को हो सकता है या लाख दो लाख का सट्टा जीत लेने पर किसी मारवाड़ी को।

                               चन्द्रशेखर आज़ाद जब अज्ञातवास में साधुवेश में छिपकर झाँसी के निकट ओरछा ,ढ़ीमरपुरा और खलियाधाना में रहे थे , तब वहाँ  ठाकुरो के साथ उनकी कई बार तीखी नोकझोक हो जाती थी ,पर निशानेबाज़ी में उन्हें कभी लज्जित नहीं होना पड़ा।  एक बार ओरछा नरेश वीर सिंह जू देव अपने दीवान हरबल सिंह के साथ जंगली सूअर  के शिकार पर गए थे , इक तगड़े बनैल सूअर को मारने में दीवान साहब  और उनके सभी मशहूर शिकारी नाकाम हो गए ,तब लंगोटी बाँधे एक हष्ठ पृष्ठ साधू हरिशंकर ब्रह्मचारी ने  शिकारियों के हास परिहास के बीच उनसे बन्दूक लेकर पहली ही गोली से सटीक निशाना लगाकर उस जंगली पशु का काम तमाम कर दिया था , वो चंद्रशेखर आज़ाद ही थे।

                           इन पंक्तियों के लेखक को उनके बाबा और कटनी (म. प्र. ) के प्रख्यात स्वाधीनता संग्राम सेनानी स्व. श्री मोतीलाल वर्मा अपने जीवनकाल में यह गर्व से बताते थे कि  वह सन १९२७-२८ में संगठन के काम से इलाहाबाद गए थे।  तब उनके साथी जगन्नाथ गुप्ता उन्हें बिना कुछ बताये जंगल में गंगा नदी के एक सुनसान किनारे पर ले गए थे , वहां आर्कषक व्यक्तित्व  का सुगठित कसरती बदन का एक नौजवान बड़ी तल्लीनता से एक विशेष प्रकार की मछलियों को , जो  पानी से हवा में फुदककर  क्षण भर के लिए बाहर आती थी ,उन्हें अपनी पिस्तौल की गोलियों का सटीक निशाना बना रहा था , बाद में पता चला कि वे आज़ाद ही थे।

                              लक्ष्यभेद में चन्द्रशेखर आज़ाद को अनुपम दक्षता प्राप्त  थी। यशपाल के अनुसार आज़ाद की दृष्टि में निशाने बाज़ी  सैनिक शिक्षा का आवश्यक अंग ही नहीं थी ,बल्कि उनका निजी  शगल  भी था। वह अक्सर अपने साथियों से कहते थे कि 'अबे बगडूस पिटपिटिया को जेब में डालकर फिरते रहोगे , प्रैक्टिस नहीं होगी , तो वक्त  पर गोली दो हाथ दूर जाएगी और दाँत निपोरते रह जाओगे। ' एक माँ को जितना स्नेह अपनी संतान से होता है , उतना   ही  ममत्व आज़ाद को अपनी प्रिय माउज़र पिस्तौल से था।  वह झाँसी में अपने योग्य शिष्य क्रान्तिकारी सदाशिव मलकापुरकर को स्नेहवश डपटते हुए यह कहते थे कि ' देख तू पकड़ा जायेगा या मर जायेगा तो उतनी हानि नहीं होगी , जितनी इस पिस्तौल के जाने से होगी। ' उनका जीवटता यह भी कहते थे  कि जब तक यह बमतुल बुखारा (आज़ाद ने अपनी पिस्तौल का यही विचित्र नाम रखा था ) मेरे पास है , किसने माँ का दूध पिया है जो मुझे जीवित पकड़ सके। वह मस्ती में कहते थे कि -

                                 '' दुश्मनों की गोलियों का हम सामना करेंगे ,
                                       आज़ाद ही  रहे है  आज़ाद ही रहेंगे । ''

                     आज़ाद के निशाने की अंतिम परीक्षा २७ फरवरी १९३१ की सुबह इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में ब्रिटिश हूकूमत से आखिरी मोर्चे पर लड़ते समय हुई थी।  जब उन्होंने स्वयं गंभीर रूप से जख्मी होते हुए भी अपनी पिस्तौल के शब्दभेदी अचूक निशाने   से एस. एस. पी. सर नॉट  बाबर का हाथ और इंस्पेक्टर विश्वेश्वर सिंह का जबड़ा बेकार कर दिया था , यह करिश्मा देखकर वहां मौजूद सी. आय. डी. के अंग्रेज इंस्पेक्टर जनरल ओकार्नर ने अनजाने में उनके निशाने की दाद देते हुए यह कहा  था '' व्हॉट ए वंडरफुल शॉट ''। चन्द्रशेखर आज़ाद ने करीब २५ मिनिट तक बहादुरीपूर्वक अंग्रेज सरकार के सैकड़ो सिपाहियों का अकेला मुकाबला  करते हुए, आज़ाद रहने के अपने प्रण को भी बखूबी निभाया और जब उनकी गोलिया खत्म हो गयी , तब उन्होंने दुश्मनों के सामने समर्पण करने की जगह अपनी कोल्ट पिस्तौल को  अपनी कनपटी में लगाकर उसकी अंतिम गोली को चलाकर आत्मबलिदान कर लिया  , क्रांति का देवता सो गया , मातृभूमि पर निसार एक रोशन चिराग बुझ गया ,  पर वह आज भी हर देशभक्त हिंदुस्तानी के दिल में जीवित है और सदा अमर रहेगे।

                                                                                                                         -अनिल वर्मा

अमरशहीद चंद्रशेखर आजाद की यादें और पांडव प्रपात पन्ना


 
                                                                                                          - अनिल वर्मा 

                  '' यादें नक्श हो जाये किसी पत्थर पर तो ,वे पत्थर दिल को पिघला सकती है।
                      यादें होती है , होते उनके पैर नहीं , पर पीढ़ियों तलक वे जा सकती है । ''


  
  
                                     अमरशहीद चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत को अब  ८४ वर्ष गुजर चुके है ,यह तो ज़माने का दस्तूर है कि वक्त और शासन की फ़िज़ा में बदलाव के साथ लोगो के आदर्श बदल जाते है, पर आज़ भी  युवा पीढ़ी गर्व के साथ आज़ाद को अपना महानायक मानती  है और  वतन से मोहब्बत करने वाले हर हिंदुस्तानी के दिल में आज़ाद अब भी जीवित है.  यूँ तो आज़ादी के मतवाले क्रांतिवीर चन्द्रशेखर आज़ाद की कर्मस्थली झाँसी थी , पर वह लम्बे अर्से तक अज्ञातवास के दौरान ओरछा और उसके समीपवर्ती स्थानो पर बेखौफ आज़ाद रहकर समूचे देश में क्रान्तिकारी आंदोलन का कुशल संचालन करते रहे . जब ब्रिटिश हूकूमत उन्हें शिकारी कुत्तो की तरह देश भर में हर तरफ तलाश कर रही थी , तब निर्भीक आज़ाद बुंदेलखण्ड की पावन धरा पर स्वाधीनता की अलख जगाते घूम रहे थे .

                                                    देश की इकलौती हीरा नगरी पन्ना के निकट स्थित पन्ना नेशनल पार्क बाघों के लिए प्रख्यात है , इसी पार्क में सुन्दर वन और जलप्रपात के प्राकृतिक सौंदर्य से आच्छादित  ' पांडव प्रपात '  नामक एक  मनोरम और रमणीक पर्यटनस्थल है। इस गौरवशाली इतिहास से बहुत कम ही लोग अवगत है कि यह  ऐतिहासिक स्थल अमरशहीद चंद्रशेखर आज़ाद की दुर्लभ स्मृतिया संजोये हुए है . ४ सितम्बर १९२९ को इसी स्थान पर आज़ाद ने स्थानीय क्रांतिकारियों के साथ एक बैठक की थी , जिसमे प. रामसहाय तिवारी ,नारायण दास खरे , प्रेम नारायण , बिहारीलाल , जयनारायण एवं झाँसी के अन्य क्रान्तिकारी उपस्थित थे।  इस बैठक में ब्रिटिश हूकूमत के खिलाफ संघर्ष का आव्हान किया गया था और देश को आज़ाद कराने  का संकल्प लिया गया था।  यह संस्मरण सन १९७८ में लेखक श्री दशरथ एवं अन्य द्वारा प्रकाशित पुस्तक ''उत्कर्ष '' में छपा था , जो शब्दशः इस प्रकार था -

 '' नौगाव स्थित एजेंसी की एक सी.आय. डी. रिपोर्ट के अनुसार ४ सितम्बर १९२९ को छतरपुर से पन्ना जाने वाले मार्ग पर केन नदी के उस पार पाण्डव प्रपात नामक वनाच्छादित स्थल पर श्री चंद्रशेखर आज़ाद की अध्यक्षता में क्रांतिकारियों की बैठक हुई थी , जिसका आयोजन पंडित रामसहाय तिवारी ने किया था और जिसमे टीकमगढ़ निवासी नारायण दास  खरे व् प्रेम नारायण ,सरीला निवासी बिहारीलाल , महोबा निवासी जय नारायण ,आज़ाद तथा झाँसी के चार (एकत्र १३ ) लोगो ने भाग लिया था।  इस सभा का उद्देश्य उक्त प्रतिवेदन अनुसार ' शासन को उखाड़ फेंकना तथा शासन के शीर्षस्थ अधिकारीयों की हत्या कर देना था। ' इस सभा की सूचना प्रभुदयाल  नामक चरवाहे द्वारा दी गई थी। ''

                                       इस घटनाचक्र  का आंशिक उल्लेख लेखक श्री ए. यू. सिद्दीकी द्वारा अंग्रेजी में लिखित पुस्तक ''Indian Freedom Movement in Princely States of Vindhya Pradesh '' में भी किया गया है। परन्तु यह  ऐतिहासिक तथ्य आज़ाद की शहादत के ८० वर्ष उपरांत  भी शासन और आमजन की जानकारी में नहीं आया था , पहली बार इन पक्तियों के लेखक  द्वारा  यह तथ्य पन्ना टाईगर रिज़र्व के फील्ड डायरेक्टर श्री आर. श्रीनिवास मूर्ति को लिखित पत्र दिनांक १-१-२०१० अनुसार  शासन के संज्ञान में लाया गया था , तब अपने कर्तव्य के प्रति सजग, ईमानदार और निष्ठावान I. F.S. अधिकारी श्री मूर्ति के सद्प्रयासों के परिणामस्वरूप २६जनवरी २०१० को पाण्डव प्रपात  पर आयोजित  एक गरिमामयी समारोह में कुछ फ्लैक्सो  पर आज़ाद के दुर्लभ चित्रों की  स्मारिका लगायी गयी थी , इसके उपरांत १५ अगस्त २०१० को उसी स्थान पर शासन द्वारा आज़ाद की  एक भव्य प्रतिमा स्थापित करायी  गयी और पाण्डव प्रपात  से जुड़े उनके संस्मरण को भी शिलालेख पर अंकित किया गया था , इसका अनावरण मध्यप्रदेश शासन के तात्कालीन राज्य मंत्री श्री ब्रजेंद्र प्रताप सिंह द्वारा किया गया था।  यह आशा है कि पांडव प्रपात पन्ना (म. प्र. ) में स्थित यह पाषाण प्रतिमा  अमरशहीद चन्द्रशेखर आज़ाद के महान त्याग और बलिदान की अनुपम गाथाओं से देशवासियों को युग युग तक प्रेरणा प्रदान करती रहेगी ।

                                                                              -  अनिल वर्मा


क्रांतिकारी साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"




 क्रांतिकारी साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"
                                                                            -    अनिल वर्मा
  
 
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                                      अमरशहीद भगतसिंह और आज़ाद के साथी रहे सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" जीवन के प्रथम  सौपान में  देश की आज़ादी की संघर्षगाथा में भाग लेने वाले एक महान क्रांतिकारी थे , बाद में वह सैनिक बने और फिर  उन्हें  हिंदी साहित्य जगत में प्रतिभासम्पन्न कवि, शैलीकार, कथा-साहित्य को एक महत्त्वपूर्ण मोड़ देने वाले कथाकार, ललित-निबन्धकार, सम्पादक और सफल अध्यापक के रूप में जाना गया।  अज्ञेय प्रयोगवाद एवं नई कविता को साहित्य जगत में प्रतिष्ठित करने वाले कवि हैं।     
  
                           अज्ञेय का जन्म ७ मार्च १९११ को  उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कुशीनगर नामक ऐतिहासिक स्थान में हुआ था । उनके पिता पण्डित हीरानंद शास्त्री प्राचीन लिपियों के विशेषज्ञ थे। इनका बचपन इनके पिता की नौकरी के साथ लखनऊ, कश्मीर, बिहार और मद्रास आदि कई स्थानों की परिक्रमा करते हुए बीता। अज्ञेय ने घर पर ही भाषा, साहित्य, इतिहास और विज्ञान की प्रारंभिक शिक्षा आरंभ की। 1925 में अज्ञेय ने मैट्रिक की प्राइवेट परीक्षा पंजाब से उत्तीर्ण की इसके बाद दो वर्ष मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में एवं तीन वर्ष फ़ॉर्मन कॉलेज, लाहौर में संस्थागत शिक्षा पाई। वहीं बी.एस.सी.और अंग्रेज़ी में एम.ए.पूर्वार्द्ध पूरा किया। 

                                                       लाहौर में आने के बाद अज्ञेय का झुकाव राष्ट्रीय  आंदोलन की ओर होने लगा था।  वह  १९२९ में पं. मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में अज्ञेय एक स्वयंसेवक अधिकारी के तौर पर मौजूद थे। इन्हीं के स्वयंसेवक दल ने उन लोगो  को अपने कैंप में  बंद कर के रखा था जो गांधी जी के खिलाफ नारे लगाने वाले थे। फिर लाहौर में पढ़ने के दौरान वह क्रांतिकारी भगत सिंह , सुखदेव , धन्वन्तरि एवं  यशपाल के संपर्क में आकर क्रांतिकारी संस्था नौजवान भारत सभा और  हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के सदस्य बन गए  और  वह क्रांतिकारी आन्दोलन में सक्रिय रूप से जुड़कर फरार  हो गए , जिससे उनकी पढ़ाई पूरी न हो सकी।  वह   विज्ञान के छात्र थे और मिस्त्री के काम में भी माहिर थे, अतः दल ने उन्हें अमृतसर में हथियारों की मरम्मत के कारखाने का दायित्व सौप दिया।  वह छदम  मुस्लिम नाम से बिजली के काम की दुकान के बहाने  पिस्तौल सुधारने और खाली कारतूस भरने का कार्य सफलता पूर्वक करने लगे। इसके बाद दल के सेनापति चंद्रशेखर आज़ाद के कहने पर दिल्ली की क़ुतुब रोड पर ऊपर की मंज़िल का एक मकान किराये पर लेकर उस पर '' हिमालयन टॉयलेट फैक्ट्री '' का बोर्ड टांग दिया गया,पर  वास्तव में यह गुप्त बम फैक्ट्री थी ,यहाँ पर अज्ञेय  के साथ क्रांतिकारी यशपाल , प्रकाशवती , विमल कुमार जैन , कैलाशपति भवानी  सहाय भी काम करते थे , कभी कभी वहां दुर्गा भाभी और सुशीला दीदी भी आती थी। अमृतसर की फैक्ट्री में  अज्ञेय की जरुरत होने पर उन्हें दुबारा वहां भेजा गया , पुलिस की भारी धरपकड़  बावजूद एक सहपाठी सबइंस्पेक्टर के सहयोग से वह लाहौर स्टेशन पर तो किसी तरह   बच गए , पर फिर १९३० में वह फैक्ट्री में कई पिस्तौलों के साथ  गिरफ़्तार कर लिया गया । उन पर मुक़दमा चला और ५ साल की सजा दी गयी, जिसे  उन्होंने १९३० से १९३६ तक विभिन्न जेलों मे भोगा, पर उन्होंने जेल जीवन का वृहद उपयोग अध्ययन और लेखन में पारंगत होने में किया  और  वह कालांतर में हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार बन गए ।

                                                         जेल जीवन का प्रभाव अज्ञेय के लेखन पर खूब पड़ा है। उनकी कहानी ' कोठरी की बात ' पढ़कर यह पता लगता है कि  आंदोलनकारी कैसे मजबूत बनते होगे। जब अज्ञेय जी जेल में थे, तभी उनका काव्य-संग्रह 'भग्नदूत' और 'इत्यलम्' प्रकाशित हुआ। इस संग्रह की कविताओं में क्रांति का स्वर प्रधान था।  सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन को 'अज्ञेय' नाम मुंशी प्रेमचंद से मिला। इसका जिक्र स्वयं अज्ञेय जी ने अपने एक साक्षात्कार में किया था। इस साक्षात्कार के अनुसार, अज्ञेय ने जैनेंद्र कुमार के पास अपनी रचनाएं प्रकाशन के लिए भेजीं। जैनेंद्र जी ने वह रचनाएं प्रेमचंद जी को दीं। रचना पर लेखक का नाम नहीं था। प्रेमचंद ने उनसे रचनाओं के लेखक का नाम पूछा। इस पर जैनेंद्र जी ने कहा लेखक का नाम तो नहीं बताया जा सकता, वह तो 'अज्ञेय' है।' इस पर प्रेमचंद जी ने कहा, 'तब मैं 'अज्ञेय' नाम से ही कहानी छाप दूंगा।' बस उसी दिन से 'अज्ञेय' नाम से रचनाएं प्रकाशित होने लगीं।  

                            अज्ञेय ने जेल से रिहाई के बाद १९३६-३७ में सैनिक और विशाल भारत नामक पत्रिकाओं का संपादन किया।  वह १९४३ से १९४६ तक ब्रिटिश सेना में रहे ,  इसके बाद इलाहाबाद से प्रतीक नामक पत्रिका निकाली और ऑल इंडिया रेडियो की नौकरी स्वीकार की। उन्होंने देश-विदेश की अनेक यात्राएं कीं। जिसमें उन्होंने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से लेकर जोधपुर विश्वविद्यालय तक में अध्यापन का काम किया। फिर वह वापस दिल्ली लौटे और दिनमान साप्ताहिक, नवभारत टाइम्स, अंग्रेजी पत्र वाक् और एवरीमैंस जैसी प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया। १९८० में उन्होंने वत्सलनिधि नामक एक न्यास की स्थापना की ,जिसका उद्देश्य साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में कार्य करना था।  अज्ञेय प्रयोगवाद एवं नई कविता को साहित्य जगत में प्रतिष्ठित करने वाले कवि हैं। अनेक जापानी हाइकु कविताओं को अज्ञेय ने अनूदित किया। बहुआयामी व्यक्तित्व के एकान्तमुखी प्रखर कवि होने के साथ-साथ वे एक अच्छे फोटोग्राफर और सत्यान्वेषी पर्यटक भी थे।

                                               सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय का कृतित्व बहुमुखी है और वह उनके समृद्ध अनुभव की सहज परिणति है। अज्ञेय की प्रारंभ की रचनाएँ अध्ययन की गहरी छाप अंकित करती हैं या प्रेरक व्यक्तियों से दीक्षा की गरमाई का स्पर्श देती हैं, बाद की रचनाएँ निजी अनुभव की परिपक्वता की खनक देती हैं। अज्ञेय स्वाधीनता को महत्त्वपूर्ण मानवीय मूल्य मानते थे, परंतु स्वाधीनता उनके लिए एक सतत जागरुक प्रक्रिया रही। अज्ञेय ने अभिव्यक्ति के लिए कई विधाओं, कई कलाओं और भाषाओं का प्रयोग किया, जैसे कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, यात्रा वृत्तांत, वैयक्तिक निबंध, वैचारिक निबंध, आत्मचिंतन, अनुवाद, समीक्षा, संपादन। उपन्यास के क्षेत्र में 'शेखर' एक जीवनी हिन्दी उपन्यास का एक कीर्तिस्तंभ बना। नाट्य-विधान के प्रयोग के लिए 'उत्तर प्रियदर्शी' लिखा, तो आंगन के पार द्वार संग्रह में वह अपने को विशाल के साथ एकाकार करने लगते हैं। निस्संदेह वे आधुनिक साहित्य के एक शलाका-पुरूष थे ,जिसने हिंदी साहित्य में भारतेंदु के बाद एक दूसरे आधुनिक युग का प्रवर्तन किया।

                                                           अज्ञेय अन्तमुर्खी थे , उन्हें अपने निजी जीवन के बारे में बाते करना अच्छा नहीं लगता था , फिर भी अज्ञेय ने अपनी चिन्तन-प्रकिया , अपनी रचना प्रकिया और अपने व्यक्त्तिगत जीवन के अनुभवों के बारे में बहुत कुछ लिखा है। १९६४ में 'आँगन के पार द्वार ' कृति पर उन्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार प्रदान किया गया था  और १९७९ में 'कितनी नावों में कितनी बार 'पर उन्हें  भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया था। सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" ने भले ही इस दुनिया से ४ अप्रैल १९८७ को विदा ले ली हो, लेकिन उनका काम, उनकी कृतियां नए रचनाकारों को आज भी प्रेरित करती हैं।

                                                                                                                       -  अनिल वर्मा