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क्रांतिवीर यतीन्द्र नाथ दास


         यतीन्द्र नाथ दास  : भूख हड़ताल में शहीद 
                                                                                                             - विकास गोयल 

 
                 
                         हिंदुस्तान के क्रान्तिकारी इतिहास में क्रांतिकारी यतीन्द्र नाथ का नाम सदैव अमर रहेगा , वो एक ऐसा वीर था , जिसे समूची ब्रिटिश हूकूमत  भी न झुका सकी थी , उन्होंने  देश की  स्वाधीनता के संघर्ष में   भूख हड़ताल के माध्यम  से तिल तिल कर मौत की ओर  बढ़कर  आत्म बलिदान  की जो प्रखर जीवटता दिखायी थी , वह तो अहिंसा के महान अनुयायियों में भी नहीं थी .

                                         महान क्रांतिकारी यतीन्द्र नाथ का जन्म २७ अक्टूबर १९०४ को कलकत्ता में हुआ था , जब वह महज ९ वर्ष के थे , तब उनके पिता बंकिम बिहारी दास और माता सुहासिनी देवी का निधन हो गया था , सन १९२० में उन्होंने मैट्रिक  उत्तीर्ण की थी , उसी  समय देश में असहयोग आंदोलन का बिगुल बजने पर यतीन्द्र भी स्वाधीनता की लड़ाई में कूद गए , वह पहली बार में ४ दिन के लिए जेल गए , फिर वह १ माह और ३ माह जेल की  सजा काटे। इसके बाद वह प्रख्यात क्रांतिकारी शचीन्द्र नाथ सान्याल के संपर्क में आने के बाद क्रान्तिकारी पार्टी के सदस्य बन गए। सन १९२१ में दक्षिण कलकत्ता के नेशनल स्कूल में क्रान्तिकारी संगठनो की एक बैठक आयोजित की गयी , जिसमे शचीन्द्र नाथ सान्याल के प्रस्ताव पर सभी दलों और संगठनो को मिलाकर '' हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन '' नामक क्रांति दल गठित किया गया।  दल के लिए ' द  रेवोलूशनरी ' और 'पीला पर्चा '' छपवाकर देश भर में वितरण का अहम दायित्व यतीन्द्रबाबू को सौपा गया , जिसे उन्होंने बखूबी किया।  फिर उन्होंने दल के लिए पैसा जुटाने के लिए इंडो-बर्मा पेट्रोलियम के पेट्रोल पंप की डकैती के साहसिक कारनामे को बिना किसी बम पिस्तौल के किया था ।  उन्होंने बम निर्माण में  महारत हासिल कर ली।

                    इधर उत्तर भारत में चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और उनके साथी लगातार क्रान्तिकारी गतिविधियों को अंजाम दे रहे थे , १९२८ में भगत सिंह , राजगुरु और आज़ाद ने लाहौर में लाला लाजपत रॉय की हत्या का बदला एडीशनल  सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस सॉण्डर्स को गोली  मारकर लिया था , जब भगतसिंह छदम वेश में कलकत्ता पहुंचे ,तब यतीन्द्र नाथ से मिलने पर उन्होंने   साथियो को दल की आगरा  में बम निर्माण सीखने के लिए राजी कर लिया।  यतीन्द्र नाथ  दास ,भगत सिंह , राजगुरु , सुखदेव , आज़ाद , बटुकेश्वर दत्त आदि के साथ आगरा में बम फैक्ट्री स्थापित की ।  भगत सिंह और दत्त द्वारा दिल्ली में सेंट्रल असेंबली में बम विस्फोट के बाद गिरफ़्तारी दी गयी , फिर पुलिस की धर पकड़ तेज होने पर फणीश्वर नाथ घोष मुखबिर बन गए , उसकी शिनाख्त पर १४ जून १९२९ को कलकत्ता के शरद बोस रोड के चौक से यतीन्द्र नाथ को भी गिरफ्तार किया गया और लाहौर भेज दिया गया।

                         यतीन्द्र नाथ , भगत सिंह , बटुकेश्वर दत्त , सुखदेव ,डॉ. गयाप्रसाद और अन्य क्रान्तिकारी सेंट्रल जेल लाहौर में बंद थे , भगतसिंह के आव्हान पर १३ जुलाई १९२९ से जेल में क्रांतिकारियों के साथ दुर्व्यवहार को लेकर भूख हड़ताल आरम्भ कर दी , हालाँकि इसके पहले  यतीन्द्र नाथ ने अपने पूर्व अनुभव के आधार पर साथियो को यह सचेत किया था कि अनशन द्वारा तिल तिल कर अपने आप को इंच इंच मौत की और सरकते हुए देखने से पुलिस की गोली का शिकार हो जाना या फांसी पर झूल जाना अधिक आसान होता  है . एक बार अनशन शुरू होने के बाद वह पीछे नहीं हटे ,अंग्रेजों ने उनकी भूख हड़ताल तुड़वाने का काफी कोशिश की, लेकिन वे सफल नहीं हो सके। कुछ दिनों बाद जब उन्हें दबोचकर बलात दूध पिलाने की कोशिश की गयी ,तो डॉक्टर की लापरवाही से पेट की जगह उनके फेफड़ों में दूध चला गया ,  दिन पर दिन उनकी हालत बिगड़ती जा रही थी , फिर भी उन्होंने अनशन तोड़ने और दवा लेने से मना कर दिया , यहाँ तक कि उन्होंने जमानत पर छूटने से भी इंकार कर दिया।  उनके अंतिम समय में छोटे भाई किरन् दास  को बुलाया गया।

                उच्च आदर्श और राष्ट्रीय स्वाभिमान के धनी यतीन्द्र नाथ दास का  जीवन दीप बुझने की कगार पर था , अंततः भूख हड़ताल के ६३ वें दिन वह १३ सितम्बर १९२९ को जेल में  अपने सब साथियो से  अंतिम बार मिले  , फिर क़ाज़ी नजरुल इस्लाम का गाना ' बोलो वीर ,चिर उन्नम मम शीर ' तथा इसके बाद ' वन्दे मातरम'  सुना और फिर कुछ देर बाद हमेशा के लिए अपनी आखें  मूद ली , भारत माता का यह महान सपूत स्वाधीनता की बलिवेदी पर शहीद हो गया , सेंट्रल जेल के अंग्रेज जेलर ने फौजी सलाम से उन्हें सम्मान दिया था और लाहौर के डिप्टी कमिश्नर हैमिल्टन ने भी उनके सम्मान में अपना हैट उतार लिया था। दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में उनके निधन पर मोतीलाल नेहरू ने स्थगन प्रस्ताव रखा था ,नेता सुभाष चन्द्र बोस ने उनके पार्थिव शरीर लाहौर से कलकत्ता लाने के लिए रेल के विशेष कूपे की व्यवस्था की थी ,शव के साथ दुर्गा भाभी  गयी थी, कलकत्ता में उन्हें अद्वितीय सम्मान मिला ,  उनकी शव यात्रा में ५ लाख से अधिक लोगो का जन सैलाब उमड़ पड़ा था . ऐसे ही महान देशभक्तों  के त्याग और बलिदान से हम आज स्वाधीन भारत में सकून से है , क्रांतिवीर यतीन्द्र नाथ दास को बलिदान दिवस पर शत शत नमन।

                                                                                              - विकास गोयल 
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क्रान्तिमूर्ति दुर्गाभाभी की जन्मस्थली शहजादपुर

                       

                                                                                           -अनिल वर्मा एवं हेत सिंह 

                                                            अपने जीवन को समिधा की भांति होम करके स्वाधीनता यज्ञ की पावन अग्नि को सदा प्रज्वलित करने वाली  क्रान्तिमूर्ति दुर्गा भाभी वास्तव में देश की आज़ादी की नींव के चन्द पत्थरों में से एक है .वह आज़ादी के लिए क्रांति के पथ पर चलने  वाली प्रथम भारतीय नारी थी,उन्होंने शौर्य और जीवटता के साथ क्रान्तिकारी आन्दोलन मे  सक्रिय योगदान दिया था .धन्य है,उत्तरप्रदेश के कौशाम्बी जिला के सिराथू तहसील के गाँव शहजादपुर की धरती,जिसने इस महान वीरांगना को जन्म दिया था . 

                            भगतसिंह, सुखदेव , आजाद आदि   प्रखर क्रांतिकारियों  की अनन्य साथी दुर्गा देवी बोहरा का जन्म ७ अक्टूबर १९०७ को शाहज़ादपुर में हुआ था , उनके पिता बांकेबिहारी भट्ट इलाहाबाद  कलेक्ट्रेट में  नाज़िर थे ,जब वह केवल १० माह की थी , तभी उनकी माता यमुना की मृत्यु हो गयी ,पिता ने दूसरा विवाह कर लिया , सौतेली माँ ने  प्रताड़ित करके कर तीसरी कक्षामें ही उनकी पदाई छुड़ा दी थी , पिता को भी वैराग्य की धुन लग गयी थी ,बुआ जी  की  सख्त संरक्षकता में शहजादपुर और गंगा नदी के किनारे  करेहटी की कुटी में उनका बचपन बीता था  ,महज 11 वर्ष की अल्पायु में ही सन १९१७-१८ में भगवती शरण बोहरा से उनका विवाह हो गया , वह  प्रखर  देशभक्त थे , उनके साथ ने दुर्गा देवी के मन में भी राष्ट्रप्रेम और  देश की आज़ादी के लिए संघर्ष करने की अलख  जगा दी थी .हालाँकि उनके ससुर अंग्रेजपरस्त थे , जब उन्हें ब्रिटिश हूकुमत रायबहादुर का ख़िताब से विभूषित करने  जा रही थी ,तब इसके विरोध में भगवतीचरण और दुर्गा देवी ने उनका घर त्याग  दिया ,फिर दुर्गा देवी ने पति की प्रेरणा से अपनी अधूरी  पढाई  पूरी की और  नेशनल कॉलेज लाहौर से प्रभाकर की उपाधि ली थी  .

                                                          ससुर की मौत के बाद अंग्रेज सरकार द्वारा प्रताड़ित करने पर दुर्गा देवी अपने पति सहित १७ अगस्त १९२० को शहजादपुर आ गयी थी  ,२ माह तक वह दोनों यहाँ चोरी छिपे क्रांतिकारियों की  मदद करते रहे ,   अपार धन दौलत , एश्वर्य और सुखों को त्याग कर क्रांति के कंटक  से भरे मार्ग पर चलना कठिन तपस्या की भांति था ,दुर्गा   देवी  को ससुर जी से ४० हज़ार रूपये मिले थे ,हालाँकि पिता उनकी क्रांति पथ  के पघधर  नहीं थे , फिर भी उन्होंने दुर्गा के लिए ५ हज़ार रूपये श्री बटुक नाथ अग्रवाल के पास रखवा दिए थे , बाद में यह सम्पूर्ण राशि क्रान्तिकारी गतिविधियों के संचालन में  काफी काम आयी थी  .  

                    दुर्गा भाभी ने अपने पति भगवतीचरण बोहरा  साथ मिलकर अंग्रेजो के खिलाफ  सशस्त्र  क्रान्तिकारी  गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लिया  , उन्होंने भगत सिंह , सुखदेव , राजगुरु , आजाद और यशपाल के साथ कन्धा से कन्धा  मिलाकर  आज़ादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी  , सभी क्रान्तिकारी साथी उन्हें आदर से ''भाभी ''  कहते थे , उनके पति भगवती शरण ने भगतसिंह के साथ मिलकर क्रान्तिकारी दल हिन्दुस्तानी रिपब्लिक आर्मी का गठन किया था , लाहौर में रावी के तट के किनारे बम विस्फोट में पति की शहादत के सदमे को भी उन्होंने अदम्य  धैर्य एवं हौसले  से झेला था और अपने वैधव्य के दर्द को भुला कर अपना जीवन दल और देश के लिए समर्पित कर दिया था . क्रान्तिकारी दल द्वारा अंग्रेज पुलिस कप्तान सांडर्स के वध उपरांत उन्होंने भगत सिंह और उनके साथियों को पुलिस लाहौर के चप्पे चप्पे में शिकारी कुत्तों की तरह तलाश कर रही थी , तब दुर्गा भाभी ने  अफसर के वेशधारी भगत सिंह की पत्नी बनकर   मेमसाहब के रूप धारण कर के  अपने छोटे से बच्चे शची का जीवन भी खतरे में डालकर उन्हें  ट्रेन से लाहौर से कलकत्ता पहुचने में असीम शौर्य  का परिचय दिया था .उनका दूसरा खास काम लैमिग्टन रोड गोलीकांड को अंजाम देना था ,  9 अक्टूबर १९३० को उन्होंने बम्बई  के गवर्नर हैली को मौत के घाट उतरने के लिए  उसी  बंगले में धुसकर  गोलिया चलायी थी , पर दुर्भाग्य से  हैली तो बच गया , परन्तु एक अग्रेज अफसर और  महिला को गोली लगी थी .

                                           सन १९३१ में भगतसिंह , राजगुरु और सुखदेव फांसी पर चढकर शहीद हो गए , आजाद सहित सभी प्रमुख क्रान्तिकारी   शहीद हो गए थे अथवा पकड़ जा चुके  थे , क्रान्तिकारी दल छिन्नं भिन्न हो गया , गहन हताशा का दौर था फिर भी दुर्गा भाभी क्रान्तिकारी  बुलंद हौसले के साथ आन्दोलन को आगे बढ़ने में जुटी रही , अंततः वह भी पकड़ी गयी और जेल  गयी , जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने कुछ दिनों तक दिल्ली में कांग्रेस के साथ काम किया , फिर उन्होंने सन १९३९ में लखनऊ के पुराना किला इलाके में एक मांटेसरी स्कूल की स्थापना की और इसके बाद उन्होंने  अपना संपूर्ण जीवन  बच्चो की  शिक्षा और समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया , बाद में उन्होंने यही पर क्रान्तिकारी शिव वर्मा के साथ मिलकर शहीद स्मारक और स्वतंत्रता संग्राम शोध संस्थान की स्थापना की थी और बाद में अपनी पूरी सम्पति संस्थान को समर्पित करके उनके इकलौते बेटे शचि के पास गाज़ियाबाद चली गयी , वही पर १४  अक्टूबर  १९९९ को दुर्गा भाभी ने दुनिया को अलविदा कर दिया था .

                                 दुर्गा भाभी का शादी के बाद शहजादपुर आना जाना लगा रहता था , वह सन १९४२ में पिता की मृत्यु के बाद यहाँ आई थी , फिर उनका शहजादपुर आना संभव न हो सका , मेरे आदरणीय बुजुर्ग शुभचिंतक   श्री हेतसिंह जी  के भीतर ८० वर्ष की आयु  में  आज भी राष्ट्रप्रेम का  वही अनूठा जज्बा है , जो स्वाधीनता के पूर्व युवावस्था में था , देशभक्तों  और क्रांतिकारियों की  उपेक्षा से उनका मन  बहुत व्यथित रहता है . वह स्वयं गत १ अप्रैल २०१४  को शहजादपुर गए थे और दुर्गा भाभी के चचेरे भतीजे श्री उदयशंकर भट्ट से मिले थे , उदय जी ने उन्हें यह  बताया कि उनके पूर्वज करीब ३५० वर्ष पूर्व गुजरात से यहाँ आकर बस गए  थे , कालांतर में यहाँ उनके पूर्वजो की जमींदारी कायम हो गयी थी ,  दुर्गा भाभी और भगवती शरण जी के क्रान्तिकारी हो जाने से अंग्रेजो ने उनके परिवार की  सारी संपत्ति कुर्क कर हडप ली थी , पर उन्हें अपने परिवार के इस महान वीरांगना पर गर्व है . 

                                      स्वाधीनता उपरांत  महान क्रान्तिकारी दुर्गा भाभी ने देश के लिए  अपनी महान सेवाओं के लिए कोई प्रतिफल नहीं चाहा , उनसे कम उपलब्धि हासिल करने वाली एक महिला क्रान्तिकारी   सरकार  ने भारत रत्न से नवाजा , जबकि भाभी  पूर्णता गुमनामी के अँधेरे में खोयी रही  . यह विडम्बना है कि अपनी ही सरजमीं  पर भी  दुर्गा भाभी आज तक यथोचित सम्मान से वंचित है ,  राजनेताओं द्वारा अनेक बार घोषणायें करने के बावजूद शाहजादपुर में दुर्गा  भाभी का आज तक कोई राष्ट्रीय स्मारक नहीं बन सका  है,  शहजादपुर में जिस ऐतिहासिक घर में दुर्गा भाभी का जन्म हुआ था ,उसकी  पावंन भूमि हर देशभक्त के लिए एक तीर्थ की भांति नमन किये जाने योग्य  पवित्र स्थल   है , पर आज भी वह मकान  जीर्णशीर्ण हालत में  पड़ा हुआ है , दुर्गा भाभी के  नाम का सहारा लेकर राजनीति की वैतरणी पार करने वाले नेताओ द्वारा  उनकी  कोई सुध न लिया बेहद शर्मनाक है ,आज यह स्थिति शहजादपुर की ही नहीं वरन पूरे देश की है , क्रांतिकारियों और स्वाधीनता संग्राम सेनानियों से जुड़े अधिकांश  ऐतिहासिक स्थल उपेक्षा के शिकार हो रहे  है . उनका अस्तित्व ही मिटने की कगार पर है , आगामी   पीढ़ियों के लिए  देश की आज़ादी के इतिहास की इस बेशकीमती विरासत को  संजोने की किसी को कोई फिक्र नहीं है .निसंदेह स्वाधीनता के उपरांत हम आर्थिक और भौतिक रूप से विकास  की बुलंदियों तक पहुँच रहे है, पर यह भी कटुसत्य  है कि स्वाधीन भारत के वाशिंदों  ने अपनी नीवं के उन पत्थरों को भुला दिया है , जिन पर तरक्की की यह बुलंद इमारते खड़ी  है .

                                   '' जिनकी लाशो पर चलकर यह आज़ादी आई है 
                                       उनकी याद बहुत ही गहरी लोगो ने दफनाई है .''

                                                                                                - अनिल वर्मा (मो. न. 09425181793   )
                                                                                                - हेत सिंह    (मो. न. 07275020220 )  
  
( निवेदन -  कृपया पाठक गण लेख पर टीप लिखकर अपने विचारों से अवगत करने का कष्ट करे )

    

                                                          
                           
दुर्गा भाभी का जन्मस्थल 

दुर्गा भाभी का मकान







Revolutionary Batukeshwar Dutt's daughther Dr. Bharti Bagchi

   क्रान्तिकारी बटुकेश्वर दत्त की  बेटी डॉ. भारती बागची 


भगत सिंह के परिवार के साथ 
माता पिता और माता विद्यावती के साथ 


भारतीजी,प्रो. जगमोहन, तिवारीजी और अनिल वर्मा 

डॉ. भारती बागची दत्त 


                   







                                                                                              महान क्रान्तिकारी बटुकेश्वर दत्त ने भगत सिंह के साथ ८ अप्रैल १९२९ को नईं दिल्ली की सेंट्रल अस्सेम्बली में बम विस्फोट करके ब्रिटिश साम्राज्य को समूल हिला दिया था . उनके साथी भगत सिंह , सुखदेव, राजगुरु ,चन्द्रशेखर आज़ाद आदि एक-एक करके वतन के लिए शहीद होते चले गए . दत्त बाबू  को असेंबली केस में कालापानी की सजा हुए थी. उन्होंने  १० वर्ष तक अंदमान की नारकीय जेल में कालापानी  की सजा भोगी थी  और फिर देश के आजाद होने तक भी काल कोठरियों  में बंद रहे . परन्तु यह विडम्बना है कि स्वाधीन भारत में उन्हें असहाय, निर्धनता, गुमनामी और जिल्लद भरी जिन्दगी ही नसीब हुई थी . वह महान क्रांतिवीर जिसके भगत सिंह के साथ  फोटो असेम्बली बम कांड के बाद देश के हर घर ,चाय  पान  की दुकानों तक में शीशे से मढे होते थे , वही स्वाधीनता के उपरांत सिगरेट कम्पनी में मामूली एजेंट के रूप में दर-दर की ठोकर खाने के लिए मजबूर हो गया था .उन्होंने उपेझा  का हर दंश सहन किया , पर स्वाभिमान से तना उनका शीश कभी नहीं झुका . 

                      बटुकेश्वर दत्त का विवाह उनके जन्मदिन १८ नवम्बर१९४७ को अंजलि देवी से हुआ था . अंजलि देवी का बचपन अपार वैभव और एश्वर्य में गुजरा था , पर दत्त बाबू के साथ उन्होंने नितांत निर्धनता और तंगहाली  को झेलते हुए भी एक आदर्श भारतीय नारी की भांति अपने पति का साथ खूब निभाया . दत्त बाबू की एकलौती बेटी भारती  का जन्म ८ जून १९४९ को पटना में हुआ था , उन्होंने बेटी को विरासत में अनमोल संस्कार दिए थे .  भारतीजी यह बताती है कि उन्होंने अपने महान पिता से बहुत कुछ सीखा था , कभी झूठ न बोलना , सबकी मदद करना और अनुशासन में रहकर देश और समाज के कल्याण के लिए कार्य करना , ये सब गुण पिता से ही प्राप्त हुए थे .दत्त बाबू की जन्म शताब्दी पर सन २०१० में नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित मेरी पुस्तक '' बटुकेश्वर दत्त : भगत सिंह के सहयोगी '' की रचना यात्रा के दौरान मुझे अक्टूबर २००९ में पटना में डॉ. भारती बागची  दत्त से अनेक बार वार्तालाप करके इतिहास को खखालनें का सौभाग्य मिला था , तब भारती जी ने यादों के बवंडर में डूबता-उतरते रुंधे कंठ से यह भी बताया था कि उनके पिता उनके लिए बहुत भावुक थे , जब वह सन १९६५ में दिल्ली के अस्पताल में मृत्यु  शैय्या पर थे , तब उन्होंने उनका हाथ पकड़ कर यह  कहा था कि '' बेटा भावुकता को जीवन में अधिक स्थान न देना , इसका कोई मोल ना  होगा और  मन को कष्ट ही होगा ''. भारती जी  ने  अपने पिता का अंतिम संस्कार करके बेटी के साथ बेटे का भी दायित्व निर्वाह किया था .

                              सन १९६५ में दत्त बाबू की मृत्यु के समय भारती ने कालेज में प्रवेश लिया ही था, माँ अंजलि देवी ने स्कूल की छोटी सी नौकरी उनका पालन पोषण किया , भारतीजी ने अर्थशास्त्र में पी. एच. डी. की है और वर्तमान में वह पटना के मगध कालेज में अर्थशास्त्र की रीडर है . सन १९६९ में भारती का विवाह होने पर अमरशहीद  भगत सिंह की माता विद्यावती देवी ने उन्हें घर की बेटी मानते हुए शादी का जोड़ा, गहने और अन्य भेंट भेजी थी . उनके पति भी मगध कालेज में प्रोफ़ेसर थे , उनकी सन २००६ में  मृत्यु हो चुकी है , उनके ३ बेटे है . भारती जी अपने पिता की भांति ही मृदु भाषी ,अत्यंत्र शांत और सरल स्वभाव की है . इस लेखक को उनसे मौसीजी के रूप में  माता के समान  स्नेह प्राप्त होता है . 

                     यह नैराश्य पूर्ण बात है कि पटना में न्यू जक्कनपुर स्थित जिस मकान में बटुकेश्वर दत्त अपने अंतिम दिनों में रहते थे , उसे आज तक  राष्ट्रीय धरोहर धोषित नहीं किया जा सका  है , दत्त बाबू को उनके जीवनकाल में स्वाधीनता सेनानी का दर्ज़ा तक न मिल सका था , उनकी मृत्यु के ४८ साल बाद भी अब तक उन पर कोई डाक टिकट जारी  नहीं किया गया ,जबकि  एक एक रन के लिए लाखो करोडो रूपये कमाने वाले पेशेवर  क्रिकेटर सचिन तेदुलकर पर कई  डाक टिकट जारी हो रहे है , पटना सहित पूरे देश में उनकी एक भी मूर्ति नहीं है , सन १९६५ में उनके घर को जाने वाली जिस गली का नाम ' बी. के . दत्त लेन ' रखा गया था , उसी नाम पट्टिका के बोर्ड के नीचे मोहल्ले भर का  कचडा  फेका जाता है .  यह विडम्बना है कि इस देश में जहाँ क्रिकेटर्स , फ़िल्मी कलाकारों और नेताओ और पूंजीपतियों को तो भगवान की तरह पूजा जा रहा है , पर देश को आजाद कराने वाले महान स्वाधीनता सेनानियों और क्रांतिकारियों को भुला दिया जाता  है  , बटुकेश्वर  दत्त ने अपना पूरा जीवन देश के  लिए कुर्बान कर दिया, पर इसी देश ने   उन्हें और उनके परिवारजनों को विस्मृत  कर दिया . दत्त बाबू की पत्नी और बेटी भारती को मेरी पुस्तक प्रकाशित होने के पहले तक बिहार सरकार  से कभी कोई मदद नहीं मिली , यहाँ तक कि उन्हें किसी कार्यक्रम में  आमन्त्रित भी  नहीं किया जाता था , हालाकि अब इस हालत में कुछ मामूली सुधार आया है ,  यह हम भारतवासियों का दुर्भाग्य है कि हम ना तो इस महान क्रान्तिकारी की स्मृतियों को उचित रूप से संजो पाए है और न ही उनके वंशजो को यथोचित सम्मान दे सके है .

                                   '' जालिम फलक ने लाख मिटने की फिक्र की ,
                                      हर दिल में अक्स रह गया , तस्वीर रह गई.''

                                                                                                                - अनिल वर्मा 

Bhagat Singh's Great Sister Bibi Amar Kaur

                   भगत सिंह की क्रान्तिकारी बहन  बीबी अमर कौर


                    अमरशहीद भगत सिंह के महान व्यक्तित्व और उनके द्वारा जागृत देशप्रेम की अलख से उस दौर में नौजवानों की समूची पीढ़ी प्रेरित हुई थी,  परिवार में  उनकी क्रान्तिकारी विचारधारा का सबसे गहरा प्रभाव 
छोटी बहन बीबी अमर कौर पर  पड़ा था . वह  भगत सिंह से ३ वर्ष छोटी थीं , पर उनका बचपन एक साथ खेलते कूदते बीता था , सभी ६ भाई ३ बहिनों में से  उन दोनों में ही आपस में सबसे ज्यादा स्नेह था , भगत सिंह उन्हें  प्यार से 'अमरो'  कहते थे और अपने बालमन में उमड़ती देशप्रेम की बाते  उनसे ही करते थे.  भगत सिंह की लाडली बहन अमर कौर का जन्म १ जुलाई १९१० को हुआ था , इसके कुछ दिन बाद ही २० जुलाई को उनके चाचा स्वर्ण सिंह की मृत्यु हो  गयी थी , फिर भी पिता सरदार किशन सिंह और माता विद्यावती ने बहुत उत्साह से उनका नाम अमर रखा था जिसे उन्होंनें बखूबी सार्थक किया . 

               भगतसिंह के अमर कौर के साथ बचपन के संस्मरणों में से  सबसे यादगार वह घटना  है, जब सन १९१९ में  ब्रिटिश हूकुमत द्वारा जलियांवाला बाग में भीषण नरसंहार होने पर दूसरे दिन सुबह भगतसिंह स्कूल से बिना किसी को बताये अमृतसर चले गए थे और खून से लथपत मिट्टी एक छोटी  शीशी में भर कर देर रात घर लौटे  थे,जब अमर कौर  अपने स्वभाव के अनुरूप उछलते कूदते उनके पास पहुच कर बोलीं कि" वीरा आज इतनी देर कर दी, मैंने आपके हिस्से के फल रखे हैं चलो खा लो'' , तो भगत सिंह ने बड़ी  उदासी के साथ खाने से इंकार करते हुए  खून से रंगी वह शीशी दिखाकर यह कहा था कि 'अंग्रेजों ने हमारे बहुत आदमी मार दिए हैं', फिर वह कुछ फूल तोड़कर लाये और शीशी के चारों ओर रख दिए ,कई दिनों तक भाई बहन का फूल चढ़ाने का क्रम जारी रहा . यह बलिदान की वंदना थी, भगत सिंह उन्हें सदैव निर्भीक, बहादुर और देशभक्त बनाने हेतु  प्रयासरत रहते थे.

                 जब लाहौर षड़यंत्र केस में  भगत सिंह और उनके साथी लाहौर की जेल में बंद थे , तब अमर कौर अक्सर उनसे मिलने आती थीं , २३ मार्च १९३१ को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव  की फांसी के बाद  वह हुसैनीवाला में उस ओर दौड़ पड़ीं, जहां ब्रिटिश सरकार ने उनके  तीनो भाइयों  के शवों के टुकड़ों को मिट्टी तेल से जलाने की कुचेष्टा की थी  . वह अपने शहीद भाईयों  के शवों के चंद टुकड़े  स्मृति के बतौर  लायी थीं  और उन्होंने अपने तीनों वीरभाइयों  की  राह  पर आजीवन  चलने की कसम खायी  थी ,

                           एक बार जब उनके भाई क्रान्तिकारी सरदार कुलतार सिंह को जेल में  डाल दिया गया था , बीमार होने से जब उन्हें लाहौर के एक अस्पताल में भर्ती रखा गया था , तब  अमर कौर साहसपूर्वक  उन्हें भगाने का प्रयास कर रही थीं , इस योजना  की खबर मिलने पर उनके बहादुर पिता किशन सिंह ने  उन्हें यह जोखिम का कार्य से रोकने के विपरीत , यह कहा था कि' मैं अब फालिज़ गिरने से कमजोर हो गया हूँ , कहीं मेरे मुँह से कुछ निकल ना जाये , इसलिए मुझे कुछ नहीं  बताओ , मेरे पास ५०० रुपये हैं , यह रख लो और जो करना है वह करो.  '
        
                                                    बीबी अमर कौर ने ९ अक्टूबर १९४२ को लाहौर में जेल गेट पर सफलता पूर्वक तिरंगे झंडे का धव्जारोहण किया था , तब उन्हें  गिरफ्तार कर जेल भेजा दिया गया था,सन १९४५ में ब्रिटिश सरकार के विरोध में भाषण देने और  आन्दोलन करने के अपराध   में उन्हें  १ वर्ष ६ माह के कैद की सजा दी गयी थी , उस समय उनके पुत्र जगमोहन केवल १ माह के थे , वह भी अपनी माँ के साथ अम्बाला जेल में रखे गए थे . तब उसी जेल में आज़ाद हिन्द फौज  के काफी सैनिक  भी निरुद्ध थे  , शिशु जगमोहन उन सब की गोद में खेलते रहते थे, आखिर उन्हें ९ माह की यातना भुगतने के  बाद जेल से रिहा कर दिया गया.   

                        अमर कौर का विवाह पंजाब के एक किसान श्री मक्खनसिंह से हुआ था, वह बहुत ही सरल, सहज और नेक दिल इन्सान थे , उन्होंने अपनी पत्नी के द्वारा किये जा रहे  देशहित के राजनीतिक कार्यों में कभी  बाधा नहीं डाली , अमर कौर के ४ पुत्र और २ पुत्रियाँ हुए , उन्होंने एक पुत्र सरदार अजीत सिंह की निस्संतान  पत्नी को और एक पुत्र तन्हां रह रहे अपने सास ससुर को देकर काफी उदारता का परिचय दिया था , उनके यशस्वी पुत्र प्रो. जगमोहन यह बताते हैं कि  माता जी बचपन में उन सब भाई-बहिनों को पड़ोस के एक कश्मीरी परिवार की देख रेख में छोड़कर आज़ादी के कार्यो में हिस्सा लेने चली जाती थीं , पर उन्हें बड़े प्यार से देशप्रेम की बातें बताती थीं , उन्होंने परिवार  के साथ देश के प्रति अपने कर्त्तव्य पालन में कभी कोई कोताही नहीं की.

                          सन १९४७   में  देश की  आजादी और बटवारे  के  बाद वे  शरणार्थियों और  विस्थापित स्त्रियों के पुनर्वास के कार्यों में जुट गयी थीं ।  १९५६ में मजदूर-किसानों की माँगों के साथ उन्होंने ४५ दिन की भूख हड़ताल की थी । सन  १९७८ में   पंजाब में ‘जम्हूरी अधिकार सभा’ की ओर से  पुलिस दमन के विरोध में वे उग्र होकर संघर्ष करने में अग्रणी रहीं । बीबी अमर कौर जीवन संध्या में भी राष्ट्र  के प्रति अपने दायित्वों के निर्वाह में सजग रहीं , जब ८ अप्रैल  १९८१ को  भगत सिंह की शहादत की  ५० वीं वर्षगाँठ मनाई जा रही थी , तब बीबी अमर कौर ने लोक सभा में' इन्कलाब जिंदाबाद' के नारे लगाते हुए उसी दर्शक दीर्घा से सरकारी नीतियों के विरोध में पर्चे फेंके थे , जहाँ से ५२ साल पहले भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने सुसुप्त जनता को जगाने हेतु  धमाका करने के लिए बम और पर्चे फेंके थे , अमर कौर के उन पर्चों में लिखा था कि क्या  इसी आज़ादी के लिए मेरे भाइयों  ने अपनी जिन्दगी कुर्बान की थी ?

                 सन १९८३  में समूचे पंजाब की धरती  खालिस्तान के आतंकवाद के विभीषिका से थरथरा रही थी ,अक्टूबर १९८३ में बीबी अमर कौर बहुत ज्यादा बीमार हो चुकी थीं और वह कोमा में चली गयी थीं , पर  तब  यह देखकर सभी  दंग रह गए थे , जब वह ४ दिसम्बर १९८३ को  अचानक बिस्तर से उठ गयीं और यह बोलीं  कि 'मेरा भाई कह रहा है, मेरा देश मेरा पंजाब जल रहा है और तुम आराम से सोयी हुई हो' , इसके बाद वह आतंकवाद के खिलाफ हिंदू-सिक्ख सदभाव की सांझी विरासत का झंडा लेकर आगे बढ़ीं . उन्होंने  आतकंवाद के विरोध में  १ लाख पर्चे छपवा कर पूरे पंजाब में  बंटवाये .वह अपनी जिन्दगी के अंतिम समय तक  पंजाब के गाँव-गाँव में जाकर लोगों को शहीद  भगत सिंह के विचारों से प्रेरणा लेकर उन्हें आतकंवाद से दूर रहने के लिए जागृत करने की   मुहिम में जुटी  रहीं.  उन्होंने १२ मई  १९८४ को देश सेवा करते हुए ही ,गुमनामी के अन्धेरें में ही अंतिम साँसे ली थीं और  फिर सदा के लिए अपने भाई के पास चली गयीं .


              उन्होंने अपने अंतिम दिनों में देश के नौजवानों के नाम  पर  जो वसीयत लिपिबद्ध की थी, उसका एक-एक शब्द देशप्रेम के सुनहरे हर्फों से मढ़ा हुआ है , इस ऐतिहासिक दस्तावेज में प्रचलित अर्थ में किसी संपत्ति के स्वामित्व की घोषणा नहीं है, बल्कि इसमें  देश और समाज की चिंता के साथ शहीदों के आदर्शों और भविष्य के क्रांतिकारी संघर्ष की एक संक्षिप्त और  विचारोत्तेजक अनुगूँज है जहाँ एक स्त्री जमीन-जायदाद और घर परिवार के सीमितदायरे से  मुक्त होकर  सिर्फ देश और समाज के नवनिर्माण के लिए क्रांतिकारियों के सपनों का ताना-बाना बुनती है और नई पीढ़ी के हाथों में इंकलाब की मशाल थमाना चाहती है। अपनी वसीयत में उन्होंने दर्ज किया है- ‘१९२९ में मजदूरों और किसानों को कुचलने के लिए अंग्रेज जिन कानूनों को लोगों पर थोपना चाहते थे, जिसके खिलाफ भगत सिंह और दत्त ने असेंबली में बम फेंका था, वही कानून आज श्रमिक और ईमानदार वर्गों पर थोपे जा रहे हैं. वास्तव में वह देश के हालत से बहुत दुखी थीं, फिर भी उनके भीतर यह उम्मीदें जिंदा थीं कि चारों ओर फैला अंधेरा  कितना भी गहरा हो जाये , लेकिन कुछ दृढ़ कोशिशों से उजियारा लाया जा सकता है । इस ऐतिहासिक वसीयतनामे के अंतिम शब्द इस महान  क्रांतिकारी महिला की विचारधारा और उनकी विराट दृष्टि के परिचायक  हैं कि ‘मेरे मरने के बाद कोई धार्मिक रस्म न की जाए। प्रचलित धारणा है कि गांवों में मेहनतकश दलित लोगों को मुर्दा शरीर को छूने नहीं दिया जाता, क्योंकि इससे स्वर्ग में जगह नहीं मिलती! इसलिए मेरी यह इच्छा है कि मेरी अर्थी उठाने वाले चार आदमियों में से दो मेरे इन भाइयों में से हों, जिनके साथ आज भी सामाजिक अत्याचार हो रहा है।  मरने के बाद मेरी आत्मा की शांति के लिए अपील न की जाए, क्योंकि जब तक लोग दुखी हैं और उन्हें शांति नहीं मिलती, मुझे शांति कैसे मिलेगी!  मेरी राख हुसैनीवाला और सतलज नदी में डाली जाए। १९४७ में अंग्रेज जाते समय हमें दो फाड़ कर खूनोखून कर गए थे। मैं सदा सीमापार के भाइयों से मिलने को तड़पती रही हूं, लेकिन कोई जरिया नहीं बन पाया। पार जा रहे नदी के पानी के साथ मेरी यादें उस ओर के भाई-बहनों तक भी पहुँचे।’

                  क्या आज नई पीढ़ी  बीबी अमर कौर की इस वसीयत के  मर्म को आत्मसात कर सकेगीं ? यह विडंबना ही है कि हम आज भी शहीद भगत सिंह के सपनों के भारत का निर्माण नहीं कर सके हैं,  बीबी अमर कौर ने आजीवन अपने वीर जी के क्रान्तिकारी विचारों की विरासत को आगे बढाया है , देश और समाज के लिए उनका योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता है .
                                                                                                              


                                   
                    
with B K Dutt
with Rajguru's Sister & Mother
with BK Dutt's siter Pramila
                   


Bhagat Singh ka Shahadat isthal : Central Jail Lahore

भगत सिंह  का शहादत स्थल : सेंट्रल जेल लाहौर 
                              



फांसी का फन्दा

शैडमैन चौक

                      












                                                                 २३ मार्च सन १९३१ शाम करीब  ७ बजे सेंट्रल जेल लाहौर में भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव ने काल  कोठरियों से बाहर आकर एक दूसरे के हाथ थाम लिए 
थे,  तभी भगतसिंह के कंठ से मार्मिक गीत फूट पड़ा और तीनो झूमकर गा रहे थे -

                                             '' दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फत ,
                                                    मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी .''

                          भारत माता के ये महान सपूत झूमते गाते फांसी घर की ओंर चले, उनके पीछे पूरा काफिला चला , आगे पीछे जेल के वार्डन , अगल बगल सरकारी अफसर और बीच में गूँज रहा था   आज़ादी के मतवालों का तराना , फिर फांसीघर आ गया , सामने मंच पर तीन फंदे झूल रहे थे , अंदर लाहौर  का अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर तीनो को खुला देखकर कुछ परेशांन  सा खड़ा था ,तभी भगत सिंह उसकी ओर मुखातिब हुए , वह बोले   '' Well Mr. Magistrate,you are fortunate to be able today to see how Indian revolutionries can embress death with pleasure for the sake of their supream ideal''

                                    भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव सीना ताने हुए जोश के साथ फांसी के मंच की सीढियों पर चढ़ें,भगत सिंह ने अपने साथियों से अलविदा कहा , इसके जबाब में उनके साथियों ने ''भगतसिंह जिंदाबाद''  के नारे लगाये , फिर तीनो के   '' इन्कलाब जिंदाबाद,   डाउन विथ इम्प्रिलिज्म,  डाउन विथ यूनियन जैक ''के नारों से पूरा आकाश गुंजायमान हो गया , जेल के बैरिको में निरुद्ध सभी बंदियों  के नारों के  स्वर भी जेल की दीवारो को भेदकर बाहर तक पहुच रहे थे.  भगत सिंह , राजगुरु  और सुखदेव ने फांसी के  फंदों को चूमा और अपने ही हाथो अपने गले में डाल लिया , तीनो वीरों के नारे आसमान की बुलंदियों को छू रहे थे, तीनो मित्रो के पहले पैर , फिर हाथ बांध दिए गए , चेहरे पर काली टोपी चढ़ा दी गयी ,   मजिस्ट्रेट ने घड़ी देखी  ७ बजकर ३३ मिनट , जल्लादों  ने मंच के नीचे आकर कांपते हाथो से चरखी घूमा  दी, तख्ता गिरा और फिर यह तीनो वीर एक साथ शहीद हो गए अपने  वतन के लिए .

                         इस ऐतिहासिक घटना के आज  ८२ वर्ष बाद इतिहास का पुनराविलोकन से यह ज्ञात  होता  है  कि लाहौर की वह सेंट्रल जेल, जहाँ भगत सिंह और उनके साथी शहीद हुए थे , अब  लगभग नस्त्नाबूत हो चुकी है , जिन कालकोठरियों में इन शहीदों को रखा गया था , वह खाक में मिल चुकी है . लाहौर में टेम्पल रोड के निकट जेल रोड आज भी बहुत शांत स्थान है , जिसके दोनों और शानदार लम्बे  वृछो की अनवरत श्रंखला है , यदि गुलमर्ग की ओंर जाये,  तो अभी भी दाँयी ओर सेंट्रल जेल की मिट्टी की एक दीवार के भग्नावशेष नज़र आते है. जेल की ऊँची दीवारों के पास जहाँ शहीदों की फांसी  का तख्ता था , अब वह ऐतिहासिक स्थल ट्राफिक सिग्नल का चबूतरा में तब्दील हो चूका  है , जिसके चारो ओर हर दिन हजारों  गाड़ियाँ गुजरती है, धूल और धुए के गुबार उभरते है और उनमें विलीन हो जाती है , इन शहीदों से जुडी अतीत की सुनहरी यादें .

                                       किसी ज़माने में सेंट्रल जेल लाहौर ( जिसे कोट लखपत जेल भी कहा जाता था )  इतने बड़े परिसर में फैली हुई थी कि जेलर  जेल के एक से दूसरे बैरक में जाने के लिए बग्घी का उपयोग करते थे, पर वहां अब एक टूटी फूटी दीवार के अवशेष के सिवा कुछ नहीं बचा है,  जेल के अधिकांश हिस्से को तोड़कर यहाँ एक शानदार' शैडमैन कालोनी ' बनायीं जा चुकी है, अब तो इस कालोनी का शुमार लाहौर के सबसे महंगे  और पाश  इलाके में होता  है, पर यह कहा जाता है कि फांसी के तख्ते वाली  भूमि के टुकड़े को खरीदने का  साहस काफी दिनों  तक कोई नहीं जुटा पा रहा था ,तो  पाकिस्तानी हूकुमत ने ठीक उसी जगह पर  ट्राफिक पॉइंट बनवा  दिया था , इस गोलचक्कर के   बारे में एक ओर दिलचस्प कहानी है ,यह कहा जाता है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिखार अली भुट्टो के आदेश पर  नेशनल असेंबली के सदस्य नवाज़ मोहम्मद खान की हत्या के लिए इसी चौक पर उस पर गोलिया चलायी गयी थी , जो उसके पिता अहमद रजा कसूरी  को लगी थी और वह बुरी तरह घायल हुए थे , कसूरी के दादा उन लोगो में से थे , जिन्होंने भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के खिलाफ गवाही दी थी और उनके शवो की शिनाख्त की थी, पुराने लोगो की  यह धारणा थी  कि  'नैमोसिस ' (बदले की देवी ) ने कसूरी परिवार को इस गोलचक्कर पर धर दबोचा था .

                              अखंड भारत के जिस लाहौर शहर में  क्रांतिकारी भगत सिंह और सुखदेव नॅशनल  कालेज में पढ़े बड़े थे ,  उन्होने आजाद के साथ मिलकर लाला लाजपत रॉय की हत्या का बदला लेने के लिए एडीशिनल  एस. पी. सांडर्स का यही वध करके राष्ट्रीय स्वाभिमान को जाग्रत किया था , भूख हड़ताले  की ,  जेल में जुल्म सहे  और   इस धरती को अपने पवान लहू से सीचा था  ,यह विडम्बना है  उसी लाहौर में यह  अमरशहीद आज़ादी के बाद बेगाने हो गए है , उन्हें पूरी तरह से भुला दिया गया  है , यूँ भी शहीदों का देशभक्ति के अलावा कोई मज़हब  नहीं होता है , फिर भी  न जाने क्यों पाकिस्तानी हूकुमत उन्हे अपना नहीं सकी है  और  आज तक  वहां  भगत सिंह और बाकी शहीदों का कोई स्मारक नहीं बन सका है , यद्दपि हाल  के कुछ वर्षो में  लाहौर की  फिजां  में कुछ बदलाव नज़र  आया  है ,अब यहाँ की  नयी पीढ़ी  भी भगत सिंह की दीवानी हो रही है ,  उनके दबाब के कारण हालाकिं प्रशासन ने  यहाँ भगत सिंह और उनके साथियों की  स्म्रातियों को संजोने के लिए एक भव्य स्मारक बनाने की  धोषणा की है और शैडमेन चौक का नाम भी  भगत सिंह चौक किया जाना प्रस्तावित  है , इस बारे में लाहौर हाईकोर्ट में एक रिट भी लंबित है   ,परन्तु  जब तक इस धोषणा  का क्रियान्वयन न हो जाये , तब तक पाकिस्तानी  हुकुमरानों  पर  यकीन   करना कठिन ही है .


                                                                                                             -   अनिल वर्मा
                                                                                          anilverma55555@gmail.com










Pilgrim of Immortal Martyrs : Hussainiwala

                                    अमर शहीदों का पावन तीर्थ : हुसैनीवाला


शहीदों के जीवान्त स्मारक
शहीदों की प्रतिमाएं
दत्त जी की समाधि
माता विद्यावती की समाधि
प्राचीन बुर्ज
शहीदों की समाधि

                 
 भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव ऐसे महान वीर थे, जिनके गर्व से तने शीश को ब्रिटिश साम्राज्य की अपार शक्ति भी झुका नहीं सकी  थी  . फांसी के बाद भी उनके पार्थिव शरीर अंगेजो पर इतने भारी पड़े थे  कि  गोरो को उनके शरीर के टुकड़े टुकडे  करके  मिटटी तेल से जलाने पर   भी  सकून हासिल  नहीं हो  सका था . पर इन शहीदों की नश्वर देह का एक कतरा भी जहाँ गिरा , वह धरा पावन हो गयी . २३ मार्च १९३१ की मध्यरात्रि में फिरोजपुर के पास सतलुज नदी के किनारे शहीदों के पार्थिव अंश अंग्रेजी हूकुमत के फौजी  दस्तें द्वारा आग के हवाले कर दिए थे ., परन्तु आग की रोशनी देखकर वहां  पर लोगो के आ जाने  पर फौजी उनके अधजले शव के टुकडे वही फेककर भाग गए थे .
                   
                    इसके बाद  दिन ,माह, साल गुजरते चले गए . आखिर शहीदों का खून रंग लाया और १५अगस्त १९४७ को हमारा देश आजाद हो गया. पर इसके साथ  बटवारे की गहरा  दर्द भी झेलना पड़ा , यह बलिदानी धरा  उस त्रासदी की मूक गवाह बनी , बटवारे के दौरान   लाखों  बच्चों , युवतियों एवं जवानो की खून से लथपथ लाशे और भीषण अनाचार देखकर यह धरा कराह उठी थी कि क्या इसी आज़ादी के लिए शहीदों ने  अपनी जिन्दगी कुर्बान की  थी. सतुलज की गोद रक्तरंजित हो गयी थी. यह  विडम्बना थी कि  जिस जगह इन शहीदों के शव के अधजलें  अंश हुए मिले  थे , उसी जगह से देश दो टुकड़ों में विभक्त हो  गया और  दुर्भाग्यवश शहीदों के रक्त से सिंचित यह भू-भाग पाकिस्तान की सीमा में चला गया. जनवरी १९६१ में जब दोनों मुल्को के बीच जमीन का समायोजन हुआ, तो शहीदों की पवित्र भूमि का यह हिस्सा भारत सरकार के कब्जे में आ गया  और  तब से हुसैनीवाला हैडवर्क्स के पास स्थित यह उजाड़ भूमि  राष्ट्र की  अमूल्य सम्पति और शहीदों का पावन तीर्थ बन गयी है  .
                                                                                   यहाँ सर्वप्रथम  शहीदों की स्मृति में स्मारक के रूप में ईटों का एक मंच बनाया गया था  ,जिसमें एक सीधी शिला थी , सन १९६१ में यहाँ पहली बार शहीदी मेले का आयोजन किया किया गया, जो अब भी प्रतिवर्ष अनवरत आयोजित किया जाता  है. सितम्बर १९६४ में जब यहाँ पंजाब के मुख्यमंत्री पधारे और  उनके प्रयासों से यहाँ ६५ हज़ार रुपये की लागत से एक भव्य स्मारक बनाया गया, जिनका शिलान्यास २३ मार्च १९६४ को  केन्द्रीय रक्षा मंत्री श्री  यशवंतराव चव्हाण ने किया था , १८ जुलाई १९६५ को क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त का निधन होने पर उनकी अंतिम इच्छा अनुसार  उनके  साथियों की समाधि के पास ही  उनकी  समाधि बनायीं गयी . फरवरी १९६८ के मध्य तक पंजाब सरकार ने नए सिरे से शानदार काले पत्थरों से समाधिस्थल बनवाया ,  २३ मार्च १९६८ को भगत  सिंह की ८६ वर्षीय वीर माता विद्यावती देवी ने अपने  तीनो सपूतो  की  प्रतिमाओं के सामने शीश झुकाकर उनकी शहादत को नमन किया था  तथा पंजाब के मुख्यमन्त्री लक्ष्मण सिंह  ने यह स्मारक राष्ट्र को समर्पित किया था .

                               सन १९७१ में भारत पाकिस्तान के मध्य युद्ध के बादल मंडराने  लगे , २ दिसम्बर १९७१ को पाकिस्तानी सेना के चार ब्रिगेड ने भारतीय सीमा पर भीषण हमला किया , जिसमे ५००० पाक सैनिक  एवं १५ टैंक  थे, भारत की १५ वी पंजाब रेजिमेंट ने मेजर ऍम . पी. एल.वरिय्या तथा मेजरसिंह के नेतृत्व में अत्यंत कम सैनिको के साथ  बहादुरी से लड़ते हुए पाकिस्तानियों को  आगे बढने से रोका, पर  एक बार फिर फिर यह समाधिस्थल युद्ध की विभीषिका  का गवाह रहा  और भारी गोलाबारी से स्मारक पूरी तरह तबाह हो गया, पास में स्थित प्राचीन बुर्ज की दीवारों पर तो भीषण गोलाबारी के निशाँ आज भी मौजूद है. पाकिस्तानी सैनिक  घोर नीचता दिखाते हुए स्मारक के पत्थर उठा कर ले गए थे . फिर  सन १९७३ में भारत सरकार ने तीनो शहीदों की जीवान्त कांस्य प्रतिमा के साथ भव्य स्मारक पुनः निर्मित कराया था  , १ जून १९७५ को माता विद्यावती भी अपने वीर पुत्रों के पास सदा  के लिए  आ गयी थी , यहीं उनका अंतिम संस्कार हुआ था .

                       हुसैनीवाला में भारत पाकिस्तान  सीमा पर बी. एस.एफ. का मुख्यालय है,यहाँ भी वाघा बॉर्डर की तरह  प्रतिदिन शाम को सूर्यास्त के समय दोनों देशो की सेनाओ द्वारा सीमा पर संयुक्त रूप से अपने अपने  ध्वज उतारने की रस्म बड़े ही जोश खरोश से  की जाती है. सन २००३ में जब मै  शहीदों को   श्रद्धांजलि अर्पित करने हुसैनीवाला  गया था , तब मेरा मन यह देखकर भावुक हो गया था कि इस  स्मारक से चंद कदमो की दूरी पर पाकिस्तान का चाँद सितारा वाला हरा झंडा फहरा रहा था और दूसरी तरफ था हमारा प्यारा   तिरंगा झंडा . परन्तु  जिस अखंड भारत की आज़ादी के लिये इन शहीदों ने लहू बहाया था , क्या उनकी कुर्बानियां व्यर्थ चली गयी है ? जिस तरह से जर्मनी के दो टुकड़े मिलकर फिर से एक राष्ट्र  हो गए है, क्या एक दिन वो भी वक्त आएगा,  जब भारत और पाकिस्तान फिर से  एक हो सकेगे.

                                                                                                        - अनिल वर्मा