Showing posts with label krantikari Rajguru. Show all posts
Showing posts with label krantikari Rajguru. Show all posts

क्रांतिकारी आज़ाद और उनका अचूक निशाना


                                                                                       -अनिल वर्मा
                                                                                

     



                                         



                     भारत माता की स्वाधीनता के लिए अटूट संघर्ष और बलिदान करने वालो में महान क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद का नाम सर्वोपरि है। क्रान्ति का यह आलौकिक मसीहा गुलाम देश में रहते हुए भी जीवनपर्यन्त आज़ाद रहा और अपना नाम अंत तक सार्थक किया।

                                     महान क्रांतिवीर आजाद का सम्पूर्ण जीवन साहस ,वीरता और राष्ट्रप्रेम की अनुपम मिसाल है। वह सशस्त्र क्रांति के महानायक थे , उनका यह मानना था कि जीवन के सुख ऐश्वर्य और क्रांतिपथ सर्वथा भिन्न है। वह दल के कमांडर-इन चीफ के रूप अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ एक फौजी की भाँति निशानेबाज़ी के  सतत अभ्यास  का प्रयास करते थे।  आज़ाद की सबसे बड़ी अभिरुचि थी निशानेबाज़ी , इसके वह दीवाने  थे , वह यह कहते थे कि  एक क्रान्तिकारी को योग्य सैनिक होना चाहिए ,अन्यथा संकट आने पर वह मात खा सकता है। आज़ाद  अपने बाल्यकाल में भीलों के साथ तीर कमान के सतत अभ्यास से निपुण  निशानेबाज़ हो गए थे , यह भी कहा जाता है कि उन्होंने किशोरावस्था में बांसों के झुरमुट में छुपकर शेरो का शिकार किया था। कालांतर में क्रान्तिकारी जीवन में तीर कमान की जगह पिस्तौल ने ले ली  , तब उनका निशाना इतना अचूक हो गया था कि वह दूर रखी एक लौंग को भी आसानी से गोली से उड़ा सकते  थे। यह रोचक कल्पना की जा सकती है कि यदि आज़ाद  उस दौर  के ओलिंपिक या राष्ट्रमंडल खेल में निशानेबाज़ी के मुकाबले में भाग ले रहे होते , तो निसंदेह  स्वर्णपदक उनके गले में ही सुशोभित होता।

                         आज़ाद की अचूक निशानेबाज़ी की  गाथाएँ किवदन्तियाँ बन चुकी है।  लाहौर में एडीशनल एस.पी. सांडर्स के वध के समय भगतसिंह और राजगुरु का तेजी से पीछा कर रहे हवलदार चननसिंह की गिरफ्त से उन्हें बचा लेना आज़ाद के प्रिय माउज़र पिस्तौल का ही कमाल था , जब एक साथ तीन व्यक्त्ति पास पास इतनी तेज़ी से भाग रहे हो , तब निशाने की अल्प चूक भी अपने ही साथी को ढेर कर सकती थी , परन्तु  तनाव की उस विकट परिस्थिति में भी एकग्रता कायम रखकर तत्परता पूर्वक निशाना साधते हुए वांछित व्यक्ति को मार गिराना आज़ाद के बलबूते की ही बात थी।

               प्रख्यात क्रान्तिकारी यशपाल ने  अपनी पुस्तक '' सिंहावलोकन ' में आज़ाद के इस शौक का उल्लेख करते हुए लिखा है कि आगरा में रहने के दौरान आज़ाद साथियों को   निशानाबाज़ी में पारंगत करने के लिए बुंदेलखंड के जंगलो में ले जाते थे ,इस काम में आज़ाद को जो अनुपम सुख मिलता था ,उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है , दूर किसी महीन चीज़ को सही निशाना लगाने से उन्हें काम से काम उतना संतोष होता था ,जितना कोई बहुत बड़ी उक्ति कह देने पर किसी कवि को हो सकता है या लाख दो लाख का सट्टा जीत लेने पर किसी मारवाड़ी को।

                               चन्द्रशेखर आज़ाद जब अज्ञातवास में साधुवेश में छिपकर झाँसी के निकट ओरछा ,ढ़ीमरपुरा और खलियाधाना में रहे थे , तब वहाँ  ठाकुरो के साथ उनकी कई बार तीखी नोकझोक हो जाती थी ,पर निशानेबाज़ी में उन्हें कभी लज्जित नहीं होना पड़ा।  एक बार ओरछा नरेश वीर सिंह जू देव अपने दीवान हरबल सिंह के साथ जंगली सूअर  के शिकार पर गए थे , इक तगड़े बनैल सूअर को मारने में दीवान साहब  और उनके सभी मशहूर शिकारी नाकाम हो गए ,तब लंगोटी बाँधे एक हष्ठ पृष्ठ साधू हरिशंकर ब्रह्मचारी ने  शिकारियों के हास परिहास के बीच उनसे बन्दूक लेकर पहली ही गोली से सटीक निशाना लगाकर उस जंगली पशु का काम तमाम कर दिया था , वो चंद्रशेखर आज़ाद ही थे।

                           इन पंक्तियों के लेखक को उनके बाबा और कटनी (म. प्र. ) के प्रख्यात स्वाधीनता संग्राम सेनानी स्व. श्री मोतीलाल वर्मा अपने जीवनकाल में यह गर्व से बताते थे कि  वह सन १९२७-२८ में संगठन के काम से इलाहाबाद गए थे।  तब उनके साथी जगन्नाथ गुप्ता उन्हें बिना कुछ बताये जंगल में गंगा नदी के एक सुनसान किनारे पर ले गए थे , वहां आर्कषक व्यक्तित्व  का सुगठित कसरती बदन का एक नौजवान बड़ी तल्लीनता से एक विशेष प्रकार की मछलियों को , जो  पानी से हवा में फुदककर  क्षण भर के लिए बाहर आती थी ,उन्हें अपनी पिस्तौल की गोलियों का सटीक निशाना बना रहा था , बाद में पता चला कि वे आज़ाद ही थे।

                              लक्ष्यभेद में चन्द्रशेखर आज़ाद को अनुपम दक्षता प्राप्त  थी। यशपाल के अनुसार आज़ाद की दृष्टि में निशाने बाज़ी  सैनिक शिक्षा का आवश्यक अंग ही नहीं थी ,बल्कि उनका निजी  शगल  भी था। वह अक्सर अपने साथियों से कहते थे कि 'अबे बगडूस पिटपिटिया को जेब में डालकर फिरते रहोगे , प्रैक्टिस नहीं होगी , तो वक्त  पर गोली दो हाथ दूर जाएगी और दाँत निपोरते रह जाओगे। ' एक माँ को जितना स्नेह अपनी संतान से होता है , उतना   ही  ममत्व आज़ाद को अपनी प्रिय माउज़र पिस्तौल से था।  वह झाँसी में अपने योग्य शिष्य क्रान्तिकारी सदाशिव मलकापुरकर को स्नेहवश डपटते हुए यह कहते थे कि ' देख तू पकड़ा जायेगा या मर जायेगा तो उतनी हानि नहीं होगी , जितनी इस पिस्तौल के जाने से होगी। ' उनका जीवटता यह भी कहते थे  कि जब तक यह बमतुल बुखारा (आज़ाद ने अपनी पिस्तौल का यही विचित्र नाम रखा था ) मेरे पास है , किसने माँ का दूध पिया है जो मुझे जीवित पकड़ सके। वह मस्ती में कहते थे कि -

                                 '' दुश्मनों की गोलियों का हम सामना करेंगे ,
                                       आज़ाद ही  रहे है  आज़ाद ही रहेंगे । ''

                     आज़ाद के निशाने की अंतिम परीक्षा २७ फरवरी १९३१ की सुबह इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में ब्रिटिश हूकूमत से आखिरी मोर्चे पर लड़ते समय हुई थी।  जब उन्होंने स्वयं गंभीर रूप से जख्मी होते हुए भी अपनी पिस्तौल के शब्दभेदी अचूक निशाने   से एस. एस. पी. सर नॉट  बाबर का हाथ और इंस्पेक्टर विश्वेश्वर सिंह का जबड़ा बेकार कर दिया था , यह करिश्मा देखकर वहां मौजूद सी. आय. डी. के अंग्रेज इंस्पेक्टर जनरल ओकार्नर ने अनजाने में उनके निशाने की दाद देते हुए यह कहा  था '' व्हॉट ए वंडरफुल शॉट ''। चन्द्रशेखर आज़ाद ने करीब २५ मिनिट तक बहादुरीपूर्वक अंग्रेज सरकार के सैकड़ो सिपाहियों का अकेला मुकाबला  करते हुए, आज़ाद रहने के अपने प्रण को भी बखूबी निभाया और जब उनकी गोलिया खत्म हो गयी , तब उन्होंने दुश्मनों के सामने समर्पण करने की जगह अपनी कोल्ट पिस्तौल को  अपनी कनपटी में लगाकर उसकी अंतिम गोली को चलाकर आत्मबलिदान कर लिया  , क्रांति का देवता सो गया , मातृभूमि पर निसार एक रोशन चिराग बुझ गया ,  पर वह आज भी हर देशभक्त हिंदुस्तानी के दिल में जीवित है और सदा अमर रहेगे।

                                                                                                                         -अनिल वर्मा

         गुमनामी में रहे क्रांतिवीर सुखदेव राज 

                                                                                       -अनिल वर्मा 

                                   कुछ दिनों पूर्व मुझे   दुर्ग (छत्तीसगढ़) से  १४ कि.मी. दूर स्थित अंडा गावँ जाकर  प्रख्यात  क्रांतिकारी  सुखदेव राज के स्मारक के दर्शन करने का सौभाग्य मिला था , पर यह देखकर मन दुखित  हो गया कि वह क्रांतिवीर जो अमरशहीद चंद्रशेखर आज़ाद के अंतिम पलो का  साथी  था , जिसने  क्रांतिकारी भगत सिंह , आज़ाद , भगवतीचरण, दुर्गा भाभी आदि के  साथ मिलकर वतन की आज़ादी के लिए अपने प्राणो की बाज़ी लगा थी ,उसे आज  समाधिस्थल के आसपास रहने वाले लोग तक नहीं जानते है , उनकी श्वेतप्रतिमा पर सालो से जमी धूल मिट्टी  और मकड़ी के जाले  यह  बखूबी बयां  कर रहे थे कि स्वाधीन भारत में एक महान क्रांतिकारी के लिए लोगो के मन में  सम्मान की क्या भावनाएं बची है।

सुखदेव राज का अंडा स्थित स्मारक
वैशम्पायन के साथ सुखदेव राज
                                बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में उभरे क्रान्तिकारी  आंदोलन को जिन लोगो ने अपना सर्वस्व्  समर्पण कर पल्ल्वित किया , उनमें  सुखदेव राज का भी  प्रमुख स्थान है।  उनका जन्म ७ दिसम्बर १९०७ को पंजाब के गुरदासपुर जिला के एक  छोटे से गावं के धनाढ्य खत्री  परिवार  में हुआ था , माता ने  कठोर अनुशासन और ममता के साथ उनकी शिक्षा पर  काफी ध्यान  दिया , पर सन १९१९ में जलियाँवाला हत्या कांड में हज़ारो देशवासियों के बलिदान से प्रेरित होकर सुखदेव राज ने अपना जीवन भारत माता की आज़ादी के लिए समर्पित करने का संकल्प कर लिया।  लाहौर  से इण्टरमीडिएट प्रथम श्रेणी से पास करने के बाद पिता की जिद पर उन्होंने मजबूरन रेलवे के ऑडिट  ऑफिस में नौकरी कर ली , पर  लाहौर में  वह दौर क्रान्ति युग की शुरुवात का था , वह पहले क्रान्तिकारी भगवतीचरण वोहरा और उनकी पत्नी दुर्गा भाभी के संपर्क में आये , फिर भगत सिंह और धन्वन्तरी से उनकी मुलाकात हुई , सुखदेव ने फिर से कॉलेज में प्रवेश ले लिया ,वह स्टूडेंट फेडरेशन के सेक्रेटरी बन गए और सक्रिय  रूप से  क्रान्तिकारी दल से जुड़ गए.भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव द्वारा एडिशनल एस.पी.  साण्डर्स की हत्या करने की ऐतिहासिक घटना के लाहौर षड्यंत्र केस  में वह पृष्ठभूमि में थे भगवती चरण जी के कहने पर,सुखदेव राज दल के कार्य से कलकत्ता गए , पर वहां से रंगून चले गए ,वहां किसी तरह से सी. आय.डी.पुलिस से पीछा छुड़ाया , फिर वह कलकत्ता लौटकर कुछ दिनों तक शांतिनिकेतन में रहे।

                                   सुखदेव राज को २४ दिसम्बर सन १९२९ को वाइसराय की ट्रैन के नीचे बम रखने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया , तब लाहौर की बोस्टल जेल में निरूद्र रखा गया था , बाद में उन्हें जमानत पर छोड़ दिया गया . असेम्बली बम विस्फोट की ऐतिहासिक घटना में भगतसिंह  और बटुकेश्वर दत्त गिरफ्तार किये जा चुके थे , उन्हें छुड़ाने के लिए लाहौर  की बहावलपुर कोठी में  क्रान्तिकारी दल एकत्र था , सुखदेव राज भगवतीचरण के साथ रावी नदी के किनारे बम को परखने के लिए गए थे , तब अचानक हाथ   में बम फट जाने से भगवती भाई शहीद हो गए , इसके बाद पुलिस की सक्रियता बढ़ जाने से सुखदेव राज आज़ाद के आदेश पर बम्बई चले गए , वहां पर उन्होंने दुर्गा भाभी और पृथ्वीसिंह आज़ाद के साथ मिलकर लेमिंगटन रोड पर बम्बई के पुलिस कमिश्नर को शूट करने की साहसिक घटना में भाग लिया था , उसमे एक यूरोपियन अफसर मारा गया हुआ था , पुलिस ने दुर्गा भाभी और सुखदेव राज को घेर लिया , पर वो अंतिम समय पर पुलिस को चकमा देकर भाग निकले थे , वह द्वितीय लाहौर षड़यंत्र केस में फरार अभियुकत धोषित किया जा चुके  थे। भगत सिंह , सुखदेव , राजगुरु , यतीन्द्रनाथ दास , बटुकेश्वर दत्त ,सदाशिव मलकापुरकर , भगवानदास माहौर आदि की गिरफ्तारी से दल   छिन्न  भिन्न हो चूका था , पर तब भी सुखदेव राज दल के सेनापति चंद्रशेखर आज़ाद के साथ दल का पुनः संयोजन का प्रयास कर रहे थे ,२७ फरवरी सन  १९३१ को सुबह ८ बजे वह आज़ाद के साथ अल्फ्रेड पार्क इलहाबाद  में थे , तभी अचानक पुलिस ने उन्हें घेर लिया , आज़ाद  जीवटता से अंतिम समय तक पुलिस का डटकर मुकाबला करते हुए देश के लिए शहीद हो गए , पर उनके  आदेश पर सुखदेव राज उन्हें छोड़कर वहां से फरार  होना पड़ा , सुखदेव राज को आज़ाद को शहादत के समय छोड़कर जाने का दुःख सदैव सालता रहा , बाद में लाहौर में शालीमार पार्क में सुखदेव राज भी गिरफ्तार किये गए , उन्हें इस बार लाहौर जेल में कैद रखकर भीषण नारकीय यातनाये दी गयी ,उन्हें आर्म्स एक्ट में तीन साल की कठोर कारावास की सजा दी गयी ,, लाहौर में स्पेशल ट्रिब्यूनल के सामने उन पर द्वितीय लाहौर षड़यंत्र केस का मुकदमा चला और इस मामले में  उन्हें  तीन साल की सजा दी गयी , पर जेल के भीतर भी उनकी जीवटता और जिंदादिली में रंच मात्र भी कमी नहीं आई , वह वहाँ  भी अंग्रेजों  अफसरों के अन्याय पूर्ण दुर्व्यवहार के खिलाफ जमकर मुकाबला करते थे , वह करीब १५०० दिन लाहौर और मियांवाली जेल में सजा भोगे थे।
                                 आज़ादी को लेकर क्रांतिकारियों के मन में एक सपना था , जिसे जीवित क्रांतिकारियों ने आज़ादी के बाद ढहते देखा , इसी अपूर्णता को लेकर सुखदेव राज के भीतर बैचेनी बढ़ गयी और उन्होंने सदा के लिए घर छोड़ दिया , उन्होंने बौद्ध धर्म  अपना लिया , वह कई वर्षो तक गया में रहे , सन ५० के दशक में जब वो आचार्य विनोबा भावे से मिले , विनोबा जी उनसे कहा कि  क्रान्तिकारी को ऐसा जीवन शोभा नहीं देता है , फिर वह विनोबा जी की प्रेरणा से कुष्ठ रोगियों की सेवा में जुट गए। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री कैलाश नाथ काटजू के कहने पर वह दुर्ग जिले के अंडा गावं में आ गए और फिर उन्होंने कर्मठतापूर्वक यहाँ अपना बचा हुआ सम्पूर्ण जीवन कुष्ठ रोगियों की सेवा के मिशन के लिए समर्पित कर दिया , बाहरी दुनिया से उनका संपर्क कट गया ,काफी दिनों बाद उनके क्रन्तिकारी साथी वैशम्पायन ने जो रायपुर में महाकौशल पत्रिका के संपादक थे , उन्हें दुर्ग रेलवे स्टेशन पर देखकर पहचाना , फिर वैशम्पायन जी की प्रेरणा और सरोजिनी नायकर के सहयोग से उन्होंने एक पुस्तक '' जब जागी ज्योति '' लिखी थी।

                                             गुमनामी के अंधेरों में रहते हुए ही सुखदेव राज  ५ जुलाई १९७३ को दुनिया से अलविदा हो गए , उनकी मौत के बाद अंडा गावं में सन १९७६ में उनकी स्मृति में स्मारक बनाया गया , जिसका अनावरण म. प्र. के मुख्यमंत्री श्री श्यामाचरण शुक्ल ने किया था , पर स्मारक की वह जगह अब वो किसी गणपति प्रोडक्ट इंडस्ट्रीज को बेची जा चुकी है , उनका समाधि स्थल अब परिसर में बंद  है , बाहर कोई सूचना पटल तक नहीं है ,अब  यहाँ सुखदेव राज का स्मारक होने के बारे किसी को पता नहीं लगता है, छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार से यह  उम्म्मीद है कि वह इस महान क्रांतिवीर को सम्मान प्रदान करने के लिए उनके स्मारक को विकसित करेगी, ताकि उनसे युवा पीढ़ी को देशप्रेम और बलिदान की प्रेरणा मिल सके ।

कुष्ठरोग आश्रम का भवन
स्मारक पर अनिल वर्मा, अजीत बक्शी
उनके स्मारक पर अंकित उद्गार
सुखदेव राज द्वारा लिखित पुस्तक

क्रान्तिमूर्ति दुर्गाभाभी की जन्मस्थली शहजादपुर

                       

                                                                                           -अनिल वर्मा एवं हेत सिंह 

                                                            अपने जीवन को समिधा की भांति होम करके स्वाधीनता यज्ञ की पावन अग्नि को सदा प्रज्वलित करने वाली  क्रान्तिमूर्ति दुर्गा भाभी वास्तव में देश की आज़ादी की नींव के चन्द पत्थरों में से एक है .वह आज़ादी के लिए क्रांति के पथ पर चलने  वाली प्रथम भारतीय नारी थी,उन्होंने शौर्य और जीवटता के साथ क्रान्तिकारी आन्दोलन मे  सक्रिय योगदान दिया था .धन्य है,उत्तरप्रदेश के कौशाम्बी जिला के सिराथू तहसील के गाँव शहजादपुर की धरती,जिसने इस महान वीरांगना को जन्म दिया था . 

                            भगतसिंह, सुखदेव , आजाद आदि   प्रखर क्रांतिकारियों  की अनन्य साथी दुर्गा देवी बोहरा का जन्म ७ अक्टूबर १९०७ को शाहज़ादपुर में हुआ था , उनके पिता बांकेबिहारी भट्ट इलाहाबाद  कलेक्ट्रेट में  नाज़िर थे ,जब वह केवल १० माह की थी , तभी उनकी माता यमुना की मृत्यु हो गयी ,पिता ने दूसरा विवाह कर लिया , सौतेली माँ ने  प्रताड़ित करके कर तीसरी कक्षामें ही उनकी पदाई छुड़ा दी थी , पिता को भी वैराग्य की धुन लग गयी थी ,बुआ जी  की  सख्त संरक्षकता में शहजादपुर और गंगा नदी के किनारे  करेहटी की कुटी में उनका बचपन बीता था  ,महज 11 वर्ष की अल्पायु में ही सन १९१७-१८ में भगवती शरण बोहरा से उनका विवाह हो गया , वह  प्रखर  देशभक्त थे , उनके साथ ने दुर्गा देवी के मन में भी राष्ट्रप्रेम और  देश की आज़ादी के लिए संघर्ष करने की अलख  जगा दी थी .हालाँकि उनके ससुर अंग्रेजपरस्त थे , जब उन्हें ब्रिटिश हूकुमत रायबहादुर का ख़िताब से विभूषित करने  जा रही थी ,तब इसके विरोध में भगवतीचरण और दुर्गा देवी ने उनका घर त्याग  दिया ,फिर दुर्गा देवी ने पति की प्रेरणा से अपनी अधूरी  पढाई  पूरी की और  नेशनल कॉलेज लाहौर से प्रभाकर की उपाधि ली थी  .

                                                          ससुर की मौत के बाद अंग्रेज सरकार द्वारा प्रताड़ित करने पर दुर्गा देवी अपने पति सहित १७ अगस्त १९२० को शहजादपुर आ गयी थी  ,२ माह तक वह दोनों यहाँ चोरी छिपे क्रांतिकारियों की  मदद करते रहे ,   अपार धन दौलत , एश्वर्य और सुखों को त्याग कर क्रांति के कंटक  से भरे मार्ग पर चलना कठिन तपस्या की भांति था ,दुर्गा   देवी  को ससुर जी से ४० हज़ार रूपये मिले थे ,हालाँकि पिता उनकी क्रांति पथ  के पघधर  नहीं थे , फिर भी उन्होंने दुर्गा के लिए ५ हज़ार रूपये श्री बटुक नाथ अग्रवाल के पास रखवा दिए थे , बाद में यह सम्पूर्ण राशि क्रान्तिकारी गतिविधियों के संचालन में  काफी काम आयी थी  .  

                    दुर्गा भाभी ने अपने पति भगवतीचरण बोहरा  साथ मिलकर अंग्रेजो के खिलाफ  सशस्त्र  क्रान्तिकारी  गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लिया  , उन्होंने भगत सिंह , सुखदेव , राजगुरु , आजाद और यशपाल के साथ कन्धा से कन्धा  मिलाकर  आज़ादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी  , सभी क्रान्तिकारी साथी उन्हें आदर से ''भाभी ''  कहते थे , उनके पति भगवती शरण ने भगतसिंह के साथ मिलकर क्रान्तिकारी दल हिन्दुस्तानी रिपब्लिक आर्मी का गठन किया था , लाहौर में रावी के तट के किनारे बम विस्फोट में पति की शहादत के सदमे को भी उन्होंने अदम्य  धैर्य एवं हौसले  से झेला था और अपने वैधव्य के दर्द को भुला कर अपना जीवन दल और देश के लिए समर्पित कर दिया था . क्रान्तिकारी दल द्वारा अंग्रेज पुलिस कप्तान सांडर्स के वध उपरांत उन्होंने भगत सिंह और उनके साथियों को पुलिस लाहौर के चप्पे चप्पे में शिकारी कुत्तों की तरह तलाश कर रही थी , तब दुर्गा भाभी ने  अफसर के वेशधारी भगत सिंह की पत्नी बनकर   मेमसाहब के रूप धारण कर के  अपने छोटे से बच्चे शची का जीवन भी खतरे में डालकर उन्हें  ट्रेन से लाहौर से कलकत्ता पहुचने में असीम शौर्य  का परिचय दिया था .उनका दूसरा खास काम लैमिग्टन रोड गोलीकांड को अंजाम देना था ,  9 अक्टूबर १९३० को उन्होंने बम्बई  के गवर्नर हैली को मौत के घाट उतरने के लिए  उसी  बंगले में धुसकर  गोलिया चलायी थी , पर दुर्भाग्य से  हैली तो बच गया , परन्तु एक अग्रेज अफसर और  महिला को गोली लगी थी .

                                           सन १९३१ में भगतसिंह , राजगुरु और सुखदेव फांसी पर चढकर शहीद हो गए , आजाद सहित सभी प्रमुख क्रान्तिकारी   शहीद हो गए थे अथवा पकड़ जा चुके  थे , क्रान्तिकारी दल छिन्नं भिन्न हो गया , गहन हताशा का दौर था फिर भी दुर्गा भाभी क्रान्तिकारी  बुलंद हौसले के साथ आन्दोलन को आगे बढ़ने में जुटी रही , अंततः वह भी पकड़ी गयी और जेल  गयी , जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने कुछ दिनों तक दिल्ली में कांग्रेस के साथ काम किया , फिर उन्होंने सन १९३९ में लखनऊ के पुराना किला इलाके में एक मांटेसरी स्कूल की स्थापना की और इसके बाद उन्होंने  अपना संपूर्ण जीवन  बच्चो की  शिक्षा और समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया , बाद में उन्होंने यही पर क्रान्तिकारी शिव वर्मा के साथ मिलकर शहीद स्मारक और स्वतंत्रता संग्राम शोध संस्थान की स्थापना की थी और बाद में अपनी पूरी सम्पति संस्थान को समर्पित करके उनके इकलौते बेटे शचि के पास गाज़ियाबाद चली गयी , वही पर १४  अक्टूबर  १९९९ को दुर्गा भाभी ने दुनिया को अलविदा कर दिया था .

                                 दुर्गा भाभी का शादी के बाद शहजादपुर आना जाना लगा रहता था , वह सन १९४२ में पिता की मृत्यु के बाद यहाँ आई थी , फिर उनका शहजादपुर आना संभव न हो सका , मेरे आदरणीय बुजुर्ग शुभचिंतक   श्री हेतसिंह जी  के भीतर ८० वर्ष की आयु  में  आज भी राष्ट्रप्रेम का  वही अनूठा जज्बा है , जो स्वाधीनता के पूर्व युवावस्था में था , देशभक्तों  और क्रांतिकारियों की  उपेक्षा से उनका मन  बहुत व्यथित रहता है . वह स्वयं गत १ अप्रैल २०१४  को शहजादपुर गए थे और दुर्गा भाभी के चचेरे भतीजे श्री उदयशंकर भट्ट से मिले थे , उदय जी ने उन्हें यह  बताया कि उनके पूर्वज करीब ३५० वर्ष पूर्व गुजरात से यहाँ आकर बस गए  थे , कालांतर में यहाँ उनके पूर्वजो की जमींदारी कायम हो गयी थी ,  दुर्गा भाभी और भगवती शरण जी के क्रान्तिकारी हो जाने से अंग्रेजो ने उनके परिवार की  सारी संपत्ति कुर्क कर हडप ली थी , पर उन्हें अपने परिवार के इस महान वीरांगना पर गर्व है . 

                                      स्वाधीनता उपरांत  महान क्रान्तिकारी दुर्गा भाभी ने देश के लिए  अपनी महान सेवाओं के लिए कोई प्रतिफल नहीं चाहा , उनसे कम उपलब्धि हासिल करने वाली एक महिला क्रान्तिकारी   सरकार  ने भारत रत्न से नवाजा , जबकि भाभी  पूर्णता गुमनामी के अँधेरे में खोयी रही  . यह विडम्बना है कि अपनी ही सरजमीं  पर भी  दुर्गा भाभी आज तक यथोचित सम्मान से वंचित है ,  राजनेताओं द्वारा अनेक बार घोषणायें करने के बावजूद शाहजादपुर में दुर्गा  भाभी का आज तक कोई राष्ट्रीय स्मारक नहीं बन सका  है,  शहजादपुर में जिस ऐतिहासिक घर में दुर्गा भाभी का जन्म हुआ था ,उसकी  पावंन भूमि हर देशभक्त के लिए एक तीर्थ की भांति नमन किये जाने योग्य  पवित्र स्थल   है , पर आज भी वह मकान  जीर्णशीर्ण हालत में  पड़ा हुआ है , दुर्गा भाभी के  नाम का सहारा लेकर राजनीति की वैतरणी पार करने वाले नेताओ द्वारा  उनकी  कोई सुध न लिया बेहद शर्मनाक है ,आज यह स्थिति शहजादपुर की ही नहीं वरन पूरे देश की है , क्रांतिकारियों और स्वाधीनता संग्राम सेनानियों से जुड़े अधिकांश  ऐतिहासिक स्थल उपेक्षा के शिकार हो रहे  है . उनका अस्तित्व ही मिटने की कगार पर है , आगामी   पीढ़ियों के लिए  देश की आज़ादी के इतिहास की इस बेशकीमती विरासत को  संजोने की किसी को कोई फिक्र नहीं है .निसंदेह स्वाधीनता के उपरांत हम आर्थिक और भौतिक रूप से विकास  की बुलंदियों तक पहुँच रहे है, पर यह भी कटुसत्य  है कि स्वाधीन भारत के वाशिंदों  ने अपनी नीवं के उन पत्थरों को भुला दिया है , जिन पर तरक्की की यह बुलंद इमारते खड़ी  है .

                                   '' जिनकी लाशो पर चलकर यह आज़ादी आई है 
                                       उनकी याद बहुत ही गहरी लोगो ने दफनाई है .''

                                                                                                - अनिल वर्मा (मो. न. 09425181793   )
                                                                                                - हेत सिंह    (मो. न. 07275020220 )  
  
( निवेदन -  कृपया पाठक गण लेख पर टीप लिखकर अपने विचारों से अवगत करने का कष्ट करे )

    

                                                          
                           
दुर्गा भाभी का जन्मस्थल 

दुर्गा भाभी का मकान







Bhagat Singh ka Shahadat isthal : Central Jail Lahore

भगत सिंह  का शहादत स्थल : सेंट्रल जेल लाहौर 
                              



फांसी का फन्दा

शैडमैन चौक

                      












                                                                 २३ मार्च सन १९३१ शाम करीब  ७ बजे सेंट्रल जेल लाहौर में भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव ने काल  कोठरियों से बाहर आकर एक दूसरे के हाथ थाम लिए 
थे,  तभी भगतसिंह के कंठ से मार्मिक गीत फूट पड़ा और तीनो झूमकर गा रहे थे -

                                             '' दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फत ,
                                                    मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी .''

                          भारत माता के ये महान सपूत झूमते गाते फांसी घर की ओंर चले, उनके पीछे पूरा काफिला चला , आगे पीछे जेल के वार्डन , अगल बगल सरकारी अफसर और बीच में गूँज रहा था   आज़ादी के मतवालों का तराना , फिर फांसीघर आ गया , सामने मंच पर तीन फंदे झूल रहे थे , अंदर लाहौर  का अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर तीनो को खुला देखकर कुछ परेशांन  सा खड़ा था ,तभी भगत सिंह उसकी ओर मुखातिब हुए , वह बोले   '' Well Mr. Magistrate,you are fortunate to be able today to see how Indian revolutionries can embress death with pleasure for the sake of their supream ideal''

                                    भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव सीना ताने हुए जोश के साथ फांसी के मंच की सीढियों पर चढ़ें,भगत सिंह ने अपने साथियों से अलविदा कहा , इसके जबाब में उनके साथियों ने ''भगतसिंह जिंदाबाद''  के नारे लगाये , फिर तीनो के   '' इन्कलाब जिंदाबाद,   डाउन विथ इम्प्रिलिज्म,  डाउन विथ यूनियन जैक ''के नारों से पूरा आकाश गुंजायमान हो गया , जेल के बैरिको में निरुद्ध सभी बंदियों  के नारों के  स्वर भी जेल की दीवारो को भेदकर बाहर तक पहुच रहे थे.  भगत सिंह , राजगुरु  और सुखदेव ने फांसी के  फंदों को चूमा और अपने ही हाथो अपने गले में डाल लिया , तीनो वीरों के नारे आसमान की बुलंदियों को छू रहे थे, तीनो मित्रो के पहले पैर , फिर हाथ बांध दिए गए , चेहरे पर काली टोपी चढ़ा दी गयी ,   मजिस्ट्रेट ने घड़ी देखी  ७ बजकर ३३ मिनट , जल्लादों  ने मंच के नीचे आकर कांपते हाथो से चरखी घूमा  दी, तख्ता गिरा और फिर यह तीनो वीर एक साथ शहीद हो गए अपने  वतन के लिए .

                         इस ऐतिहासिक घटना के आज  ८२ वर्ष बाद इतिहास का पुनराविलोकन से यह ज्ञात  होता  है  कि लाहौर की वह सेंट्रल जेल, जहाँ भगत सिंह और उनके साथी शहीद हुए थे , अब  लगभग नस्त्नाबूत हो चुकी है , जिन कालकोठरियों में इन शहीदों को रखा गया था , वह खाक में मिल चुकी है . लाहौर में टेम्पल रोड के निकट जेल रोड आज भी बहुत शांत स्थान है , जिसके दोनों और शानदार लम्बे  वृछो की अनवरत श्रंखला है , यदि गुलमर्ग की ओंर जाये,  तो अभी भी दाँयी ओर सेंट्रल जेल की मिट्टी की एक दीवार के भग्नावशेष नज़र आते है. जेल की ऊँची दीवारों के पास जहाँ शहीदों की फांसी  का तख्ता था , अब वह ऐतिहासिक स्थल ट्राफिक सिग्नल का चबूतरा में तब्दील हो चूका  है , जिसके चारो ओर हर दिन हजारों  गाड़ियाँ गुजरती है, धूल और धुए के गुबार उभरते है और उनमें विलीन हो जाती है , इन शहीदों से जुडी अतीत की सुनहरी यादें .

                                       किसी ज़माने में सेंट्रल जेल लाहौर ( जिसे कोट लखपत जेल भी कहा जाता था )  इतने बड़े परिसर में फैली हुई थी कि जेलर  जेल के एक से दूसरे बैरक में जाने के लिए बग्घी का उपयोग करते थे, पर वहां अब एक टूटी फूटी दीवार के अवशेष के सिवा कुछ नहीं बचा है,  जेल के अधिकांश हिस्से को तोड़कर यहाँ एक शानदार' शैडमैन कालोनी ' बनायीं जा चुकी है, अब तो इस कालोनी का शुमार लाहौर के सबसे महंगे  और पाश  इलाके में होता  है, पर यह कहा जाता है कि फांसी के तख्ते वाली  भूमि के टुकड़े को खरीदने का  साहस काफी दिनों  तक कोई नहीं जुटा पा रहा था ,तो  पाकिस्तानी हूकुमत ने ठीक उसी जगह पर  ट्राफिक पॉइंट बनवा  दिया था , इस गोलचक्कर के   बारे में एक ओर दिलचस्प कहानी है ,यह कहा जाता है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिखार अली भुट्टो के आदेश पर  नेशनल असेंबली के सदस्य नवाज़ मोहम्मद खान की हत्या के लिए इसी चौक पर उस पर गोलिया चलायी गयी थी , जो उसके पिता अहमद रजा कसूरी  को लगी थी और वह बुरी तरह घायल हुए थे , कसूरी के दादा उन लोगो में से थे , जिन्होंने भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के खिलाफ गवाही दी थी और उनके शवो की शिनाख्त की थी, पुराने लोगो की  यह धारणा थी  कि  'नैमोसिस ' (बदले की देवी ) ने कसूरी परिवार को इस गोलचक्कर पर धर दबोचा था .

                              अखंड भारत के जिस लाहौर शहर में  क्रांतिकारी भगत सिंह और सुखदेव नॅशनल  कालेज में पढ़े बड़े थे ,  उन्होने आजाद के साथ मिलकर लाला लाजपत रॉय की हत्या का बदला लेने के लिए एडीशिनल  एस. पी. सांडर्स का यही वध करके राष्ट्रीय स्वाभिमान को जाग्रत किया था , भूख हड़ताले  की ,  जेल में जुल्म सहे  और   इस धरती को अपने पवान लहू से सीचा था  ,यह विडम्बना है  उसी लाहौर में यह  अमरशहीद आज़ादी के बाद बेगाने हो गए है , उन्हें पूरी तरह से भुला दिया गया  है , यूँ भी शहीदों का देशभक्ति के अलावा कोई मज़हब  नहीं होता है , फिर भी  न जाने क्यों पाकिस्तानी हूकुमत उन्हे अपना नहीं सकी है  और  आज तक  वहां  भगत सिंह और बाकी शहीदों का कोई स्मारक नहीं बन सका है , यद्दपि हाल  के कुछ वर्षो में  लाहौर की  फिजां  में कुछ बदलाव नज़र  आया  है ,अब यहाँ की  नयी पीढ़ी  भी भगत सिंह की दीवानी हो रही है ,  उनके दबाब के कारण हालाकिं प्रशासन ने  यहाँ भगत सिंह और उनके साथियों की  स्म्रातियों को संजोने के लिए एक भव्य स्मारक बनाने की  धोषणा की है और शैडमेन चौक का नाम भी  भगत सिंह चौक किया जाना प्रस्तावित  है , इस बारे में लाहौर हाईकोर्ट में एक रिट भी लंबित है   ,परन्तु  जब तक इस धोषणा  का क्रियान्वयन न हो जाये , तब तक पाकिस्तानी  हुकुमरानों  पर  यकीन   करना कठिन ही है .


                                                                                                             -   अनिल वर्मा
                                                                                          anilverma55555@gmail.com










Ajeya Krantikari-Rajguru

                                      My book titled ''Ajeya Krantikari:Rajguru '' (in Hindi) has been  released by Union Minister Priyaranjan Dasmunsi on 25 August 2008  to commemorate the  birth centenary of the Great Revolutionary  Rajguru.
       This is the first book published in hindi or english on Rajguru , keeping in mind the fact that not much has been written about him except for a few scattered articles with repetitive material.
                                                       Shrivram Hari Rajguru was born in Khed village (now named as Rajguru Nagar) near Pune in Maharashtra on August 24, 1908. While in Varanasi to study Sanskrit and Hindu scriptures, he came in contact with revolutionaries and became active member of Hindustan Socialist Republican Army, coordinated by Chandrashekhar Azad. In the famous Lahore conspiracy case, he was executed on March 23, 1931 along with Bhagat Singh and Sukhdev.
This  book endeavours  to present authentic information that has been painstakingly gathered from various sources.
                    Anil Verma, author of the book on Rajguru is a Judge and a prolific sports writer. He belongs to a family of an illustrious freedom fighter.