मीरपुर  पुलिस चौकी से जुडी भगत सिंह एवं बी.के. दत्त की यादें 
                                                                            
                                                                                                                           -अनिल वर्मा 


                                                                                                                   
 




                                              वतन की आज़ादी के लिए आन बान और शान से अपनी जिंदगी कुर्बान करने वाले अमरशहीद भगत सिंह की स्मृतिया इतिहास की अनुपम धरोहर है। इस महान युगपुरुष की यादों से जुड़ा हर स्थल स्वाधीनता का पावन एवं वंदनीय तीर्थ  है ,जिस धरा पर उनके चरण पडे  ,उसकी पवित्र माटी मस्तक पर तिलक कर नमन किये जाने योग्य  है।

                                  भगत सिंह और उनके साथी क्रान्तिकारी बटुकेश्वर दत्त ने सुसुप्त भारतीय जनमानस को जाग्रत करने के लिए दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम विस्फोट किया था , उस मामले में दिल्ली की सेशंस कोर्ट ने दिनाक १२ जून १९२९ को पारित निर्णय अनुसार उन्हें आजीवन निर्वासन की सजा से दण्डित किया था। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त पर लाहौर षड़यंत्र प्रकरण में अन्य क्रांतिकारियों के साथ लाहौर में फ़ौज़दारी मुकदमा की सुनवायी होना थी ,इसके लिए भगत सिंह  को पंजाब की जिला जेल मियांवाली  और दत्त को सेंट्रल जेल  लाहौर भेजने का आदेश दिया गया था। उस मामले के विचारण में भाग  लेने के लिए और असेंबली बम केस में सजा भुगतने के लिए उन्हें दिल्ली से एक ही ट्रैन में अलग अलग डिब्बो में भेजा गया था. उस दौरान १४ जून १९२९ को उन्हें कुछ घंटे के लिए रात में डेराबस्सा के पिंड मीरपुर की एक पुलिस चौकी की हवालात में निरुद्ध रखा गया था . सन १८८१ की बनी यह प्राचीन पुलिस चौकी घग्घर रेलवे स्टेशन से महज़ २०० मीटर दूरी पर आज भी जर्जर हालत में मौजूद  है ।

                               शहीद भगतसिंह जागृति मंच पंचकुला के प्रधान जगदीश भगतसिंह एवं प्रख्यात इतिहासविद प्रो. एम. एम.जुनेजा की अगुवाई में हाल में एक प्रतिनिधि मंडल ने इस पुलिस चौकी का अवलोकन कर यहाँ परिचय पट्टिका लगाये जाने की मांग की है ,इस ऐतिहासिक तथ्य की जानकारी से मुझे हिसार के क्रान्तिकारी उपासक श्री विकास गोयल अवगत कराया है । यह संस्था और अन्य सम्बद्ध व्यक्ति इस शोधकार्य के लिए साधुवाद के पात्र  है।  वास्तव में सरकार को अमरशहीद भगत सिंह और क्रांतिवीर बटुकेश्वर दत्त की स्मृतियों से जुड़े इस ऐतिहासिक स्थल के निकट एक भव्य शहीद स्मारक बनाकर इसका समुचित प्रचार भी करना चाहिये ,ताकि हमारी भावी पीढ़िया इन महान क्रांतिकारियों के देशप्रेम और बलिदान की अनुपम गाथाओं से प्रेरणा अर्जित कर सके।
                                                                                                                           - अनिल वर्मा

क्रांतिकारी आज़ाद और उनका अचूक निशाना


                                                                                       -अनिल वर्मा
                                                                                

     



                                         



                     भारत माता की स्वाधीनता के लिए अटूट संघर्ष और बलिदान करने वालो में महान क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद का नाम सर्वोपरि है। क्रान्ति का यह आलौकिक मसीहा गुलाम देश में रहते हुए भी जीवनपर्यन्त आज़ाद रहा और अपना नाम अंत तक सार्थक किया।

                                     महान क्रांतिवीर आजाद का सम्पूर्ण जीवन साहस ,वीरता और राष्ट्रप्रेम की अनुपम मिसाल है। वह सशस्त्र क्रांति के महानायक थे , उनका यह मानना था कि जीवन के सुख ऐश्वर्य और क्रांतिपथ सर्वथा भिन्न है। वह दल के कमांडर-इन चीफ के रूप अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ एक फौजी की भाँति निशानेबाज़ी के  सतत अभ्यास  का प्रयास करते थे।  आज़ाद की सबसे बड़ी अभिरुचि थी निशानेबाज़ी , इसके वह दीवाने  थे , वह यह कहते थे कि  एक क्रान्तिकारी को योग्य सैनिक होना चाहिए ,अन्यथा संकट आने पर वह मात खा सकता है। आज़ाद  अपने बाल्यकाल में भीलों के साथ तीर कमान के सतत अभ्यास से निपुण  निशानेबाज़ हो गए थे , यह भी कहा जाता है कि उन्होंने किशोरावस्था में बांसों के झुरमुट में छुपकर शेरो का शिकार किया था। कालांतर में क्रान्तिकारी जीवन में तीर कमान की जगह पिस्तौल ने ले ली  , तब उनका निशाना इतना अचूक हो गया था कि वह दूर रखी एक लौंग को भी आसानी से गोली से उड़ा सकते  थे। यह रोचक कल्पना की जा सकती है कि यदि आज़ाद  उस दौर  के ओलिंपिक या राष्ट्रमंडल खेल में निशानेबाज़ी के मुकाबले में भाग ले रहे होते , तो निसंदेह  स्वर्णपदक उनके गले में ही सुशोभित होता।

                         आज़ाद की अचूक निशानेबाज़ी की  गाथाएँ किवदन्तियाँ बन चुकी है।  लाहौर में एडीशनल एस.पी. सांडर्स के वध के समय भगतसिंह और राजगुरु का तेजी से पीछा कर रहे हवलदार चननसिंह की गिरफ्त से उन्हें बचा लेना आज़ाद के प्रिय माउज़र पिस्तौल का ही कमाल था , जब एक साथ तीन व्यक्त्ति पास पास इतनी तेज़ी से भाग रहे हो , तब निशाने की अल्प चूक भी अपने ही साथी को ढेर कर सकती थी , परन्तु  तनाव की उस विकट परिस्थिति में भी एकग्रता कायम रखकर तत्परता पूर्वक निशाना साधते हुए वांछित व्यक्ति को मार गिराना आज़ाद के बलबूते की ही बात थी।

               प्रख्यात क्रान्तिकारी यशपाल ने  अपनी पुस्तक '' सिंहावलोकन ' में आज़ाद के इस शौक का उल्लेख करते हुए लिखा है कि आगरा में रहने के दौरान आज़ाद साथियों को   निशानाबाज़ी में पारंगत करने के लिए बुंदेलखंड के जंगलो में ले जाते थे ,इस काम में आज़ाद को जो अनुपम सुख मिलता था ,उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है , दूर किसी महीन चीज़ को सही निशाना लगाने से उन्हें काम से काम उतना संतोष होता था ,जितना कोई बहुत बड़ी उक्ति कह देने पर किसी कवि को हो सकता है या लाख दो लाख का सट्टा जीत लेने पर किसी मारवाड़ी को।

                               चन्द्रशेखर आज़ाद जब अज्ञातवास में साधुवेश में छिपकर झाँसी के निकट ओरछा ,ढ़ीमरपुरा और खलियाधाना में रहे थे , तब वहाँ  ठाकुरो के साथ उनकी कई बार तीखी नोकझोक हो जाती थी ,पर निशानेबाज़ी में उन्हें कभी लज्जित नहीं होना पड़ा।  एक बार ओरछा नरेश वीर सिंह जू देव अपने दीवान हरबल सिंह के साथ जंगली सूअर  के शिकार पर गए थे , इक तगड़े बनैल सूअर को मारने में दीवान साहब  और उनके सभी मशहूर शिकारी नाकाम हो गए ,तब लंगोटी बाँधे एक हष्ठ पृष्ठ साधू हरिशंकर ब्रह्मचारी ने  शिकारियों के हास परिहास के बीच उनसे बन्दूक लेकर पहली ही गोली से सटीक निशाना लगाकर उस जंगली पशु का काम तमाम कर दिया था , वो चंद्रशेखर आज़ाद ही थे।

                           इन पंक्तियों के लेखक को उनके बाबा और कटनी (म. प्र. ) के प्रख्यात स्वाधीनता संग्राम सेनानी स्व. श्री मोतीलाल वर्मा अपने जीवनकाल में यह गर्व से बताते थे कि  वह सन १९२७-२८ में संगठन के काम से इलाहाबाद गए थे।  तब उनके साथी जगन्नाथ गुप्ता उन्हें बिना कुछ बताये जंगल में गंगा नदी के एक सुनसान किनारे पर ले गए थे , वहां आर्कषक व्यक्तित्व  का सुगठित कसरती बदन का एक नौजवान बड़ी तल्लीनता से एक विशेष प्रकार की मछलियों को , जो  पानी से हवा में फुदककर  क्षण भर के लिए बाहर आती थी ,उन्हें अपनी पिस्तौल की गोलियों का सटीक निशाना बना रहा था , बाद में पता चला कि वे आज़ाद ही थे।

                              लक्ष्यभेद में चन्द्रशेखर आज़ाद को अनुपम दक्षता प्राप्त  थी। यशपाल के अनुसार आज़ाद की दृष्टि में निशाने बाज़ी  सैनिक शिक्षा का आवश्यक अंग ही नहीं थी ,बल्कि उनका निजी  शगल  भी था। वह अक्सर अपने साथियों से कहते थे कि 'अबे बगडूस पिटपिटिया को जेब में डालकर फिरते रहोगे , प्रैक्टिस नहीं होगी , तो वक्त  पर गोली दो हाथ दूर जाएगी और दाँत निपोरते रह जाओगे। ' एक माँ को जितना स्नेह अपनी संतान से होता है , उतना   ही  ममत्व आज़ाद को अपनी प्रिय माउज़र पिस्तौल से था।  वह झाँसी में अपने योग्य शिष्य क्रान्तिकारी सदाशिव मलकापुरकर को स्नेहवश डपटते हुए यह कहते थे कि ' देख तू पकड़ा जायेगा या मर जायेगा तो उतनी हानि नहीं होगी , जितनी इस पिस्तौल के जाने से होगी। ' उनका जीवटता यह भी कहते थे  कि जब तक यह बमतुल बुखारा (आज़ाद ने अपनी पिस्तौल का यही विचित्र नाम रखा था ) मेरे पास है , किसने माँ का दूध पिया है जो मुझे जीवित पकड़ सके। वह मस्ती में कहते थे कि -

                                 '' दुश्मनों की गोलियों का हम सामना करेंगे ,
                                       आज़ाद ही  रहे है  आज़ाद ही रहेंगे । ''

                     आज़ाद के निशाने की अंतिम परीक्षा २७ फरवरी १९३१ की सुबह इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में ब्रिटिश हूकूमत से आखिरी मोर्चे पर लड़ते समय हुई थी।  जब उन्होंने स्वयं गंभीर रूप से जख्मी होते हुए भी अपनी पिस्तौल के शब्दभेदी अचूक निशाने   से एस. एस. पी. सर नॉट  बाबर का हाथ और इंस्पेक्टर विश्वेश्वर सिंह का जबड़ा बेकार कर दिया था , यह करिश्मा देखकर वहां मौजूद सी. आय. डी. के अंग्रेज इंस्पेक्टर जनरल ओकार्नर ने अनजाने में उनके निशाने की दाद देते हुए यह कहा  था '' व्हॉट ए वंडरफुल शॉट ''। चन्द्रशेखर आज़ाद ने करीब २५ मिनिट तक बहादुरीपूर्वक अंग्रेज सरकार के सैकड़ो सिपाहियों का अकेला मुकाबला  करते हुए, आज़ाद रहने के अपने प्रण को भी बखूबी निभाया और जब उनकी गोलिया खत्म हो गयी , तब उन्होंने दुश्मनों के सामने समर्पण करने की जगह अपनी कोल्ट पिस्तौल को  अपनी कनपटी में लगाकर उसकी अंतिम गोली को चलाकर आत्मबलिदान कर लिया  , क्रांति का देवता सो गया , मातृभूमि पर निसार एक रोशन चिराग बुझ गया ,  पर वह आज भी हर देशभक्त हिंदुस्तानी के दिल में जीवित है और सदा अमर रहेगे।

                                                                                                                         -अनिल वर्मा

अमरशहीद चंद्रशेखर आजाद की यादें और पांडव प्रपात पन्ना


 
                                                                                                          - अनिल वर्मा 

                  '' यादें नक्श हो जाये किसी पत्थर पर तो ,वे पत्थर दिल को पिघला सकती है।
                      यादें होती है , होते उनके पैर नहीं , पर पीढ़ियों तलक वे जा सकती है । ''


  
  
                                     अमरशहीद चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत को अब  ८४ वर्ष गुजर चुके है ,यह तो ज़माने का दस्तूर है कि वक्त और शासन की फ़िज़ा में बदलाव के साथ लोगो के आदर्श बदल जाते है, पर आज़ भी  युवा पीढ़ी गर्व के साथ आज़ाद को अपना महानायक मानती  है और  वतन से मोहब्बत करने वाले हर हिंदुस्तानी के दिल में आज़ाद अब भी जीवित है.  यूँ तो आज़ादी के मतवाले क्रांतिवीर चन्द्रशेखर आज़ाद की कर्मस्थली झाँसी थी , पर वह लम्बे अर्से तक अज्ञातवास के दौरान ओरछा और उसके समीपवर्ती स्थानो पर बेखौफ आज़ाद रहकर समूचे देश में क्रान्तिकारी आंदोलन का कुशल संचालन करते रहे . जब ब्रिटिश हूकूमत उन्हें शिकारी कुत्तो की तरह देश भर में हर तरफ तलाश कर रही थी , तब निर्भीक आज़ाद बुंदेलखण्ड की पावन धरा पर स्वाधीनता की अलख जगाते घूम रहे थे .

                                                    देश की इकलौती हीरा नगरी पन्ना के निकट स्थित पन्ना नेशनल पार्क बाघों के लिए प्रख्यात है , इसी पार्क में सुन्दर वन और जलप्रपात के प्राकृतिक सौंदर्य से आच्छादित  ' पांडव प्रपात '  नामक एक  मनोरम और रमणीक पर्यटनस्थल है। इस गौरवशाली इतिहास से बहुत कम ही लोग अवगत है कि यह  ऐतिहासिक स्थल अमरशहीद चंद्रशेखर आज़ाद की दुर्लभ स्मृतिया संजोये हुए है . ४ सितम्बर १९२९ को इसी स्थान पर आज़ाद ने स्थानीय क्रांतिकारियों के साथ एक बैठक की थी , जिसमे प. रामसहाय तिवारी ,नारायण दास खरे , प्रेम नारायण , बिहारीलाल , जयनारायण एवं झाँसी के अन्य क्रान्तिकारी उपस्थित थे।  इस बैठक में ब्रिटिश हूकूमत के खिलाफ संघर्ष का आव्हान किया गया था और देश को आज़ाद कराने  का संकल्प लिया गया था।  यह संस्मरण सन १९७८ में लेखक श्री दशरथ एवं अन्य द्वारा प्रकाशित पुस्तक ''उत्कर्ष '' में छपा था , जो शब्दशः इस प्रकार था -

 '' नौगाव स्थित एजेंसी की एक सी.आय. डी. रिपोर्ट के अनुसार ४ सितम्बर १९२९ को छतरपुर से पन्ना जाने वाले मार्ग पर केन नदी के उस पार पाण्डव प्रपात नामक वनाच्छादित स्थल पर श्री चंद्रशेखर आज़ाद की अध्यक्षता में क्रांतिकारियों की बैठक हुई थी , जिसका आयोजन पंडित रामसहाय तिवारी ने किया था और जिसमे टीकमगढ़ निवासी नारायण दास  खरे व् प्रेम नारायण ,सरीला निवासी बिहारीलाल , महोबा निवासी जय नारायण ,आज़ाद तथा झाँसी के चार (एकत्र १३ ) लोगो ने भाग लिया था।  इस सभा का उद्देश्य उक्त प्रतिवेदन अनुसार ' शासन को उखाड़ फेंकना तथा शासन के शीर्षस्थ अधिकारीयों की हत्या कर देना था। ' इस सभा की सूचना प्रभुदयाल  नामक चरवाहे द्वारा दी गई थी। ''

                                       इस घटनाचक्र  का आंशिक उल्लेख लेखक श्री ए. यू. सिद्दीकी द्वारा अंग्रेजी में लिखित पुस्तक ''Indian Freedom Movement in Princely States of Vindhya Pradesh '' में भी किया गया है। परन्तु यह  ऐतिहासिक तथ्य आज़ाद की शहादत के ८० वर्ष उपरांत  भी शासन और आमजन की जानकारी में नहीं आया था , पहली बार इन पक्तियों के लेखक  द्वारा  यह तथ्य पन्ना टाईगर रिज़र्व के फील्ड डायरेक्टर श्री आर. श्रीनिवास मूर्ति को लिखित पत्र दिनांक १-१-२०१० अनुसार  शासन के संज्ञान में लाया गया था , तब अपने कर्तव्य के प्रति सजग, ईमानदार और निष्ठावान I. F.S. अधिकारी श्री मूर्ति के सद्प्रयासों के परिणामस्वरूप २६जनवरी २०१० को पाण्डव प्रपात  पर आयोजित  एक गरिमामयी समारोह में कुछ फ्लैक्सो  पर आज़ाद के दुर्लभ चित्रों की  स्मारिका लगायी गयी थी , इसके उपरांत १५ अगस्त २०१० को उसी स्थान पर शासन द्वारा आज़ाद की  एक भव्य प्रतिमा स्थापित करायी  गयी और पाण्डव प्रपात  से जुड़े उनके संस्मरण को भी शिलालेख पर अंकित किया गया था , इसका अनावरण मध्यप्रदेश शासन के तात्कालीन राज्य मंत्री श्री ब्रजेंद्र प्रताप सिंह द्वारा किया गया था।  यह आशा है कि पांडव प्रपात पन्ना (म. प्र. ) में स्थित यह पाषाण प्रतिमा  अमरशहीद चन्द्रशेखर आज़ाद के महान त्याग और बलिदान की अनुपम गाथाओं से देशवासियों को युग युग तक प्रेरणा प्रदान करती रहेगी ।

                                                                              -  अनिल वर्मा


                        गुरु दत्त की ५० वीं पुण्यतिथि 
                                                                        - अनिल वर्मा

              


 


                 आज से ठीक ५० साल पहले वह रहस्यमय बदनसीब रात थी , जिसने गुरु दत्त को सदैव के लिए हमसे छीन लिया . उनकी मौत महज एक हादसा थी या ख़ुदकुशी ,यह रहस्य १९६४ में जहाँ था  , आज भी वही है , उनकी मौत की अबूझ पहेली शायद कभी सुलझ न सकेगी। 

                             यह कहा जाता है कि  गुरु दत्त ने वहीदा रहमान की बेवफाई के कारण उनका दिल टूट गया था , और वह गहन हताशा में डूब गए थे , पत्नी गीता को वो कभी वापस नहीं पा सकते थे। इसलिए उन्होंने मौत को ही गले लगाना बेहतर था। गुरदत्त के निधन के बाद वहीदा ने एक बयान जारी किया था। जिसमें उन्होंने कहा था  “ऊपरवाले ने उन्हें सबकुछ दिया था लेकिन उन्हें संतोष नहीं था , वह कभी संतुष्ट नहीं होते थे।  शायद इसीलिए जो चीज उन्हें जिंदगी नहीं दे पा रही थी, उसे उन्होंने मौत में तलाशा।  उन्हें पूर्ण संतुष्टी की तलाश थी। कोई तृप्ति, कोई मौत, कोई अंत, कोई पूर्णता वह चाहते थे। मुझे नहीं पता उनकी मौत दुर्घटना थी या घटना, लेकिन इतना जानती हूं, उन्हें कोई नहीं बचा सकता था। उनमें बचने की चाह ही नहीं थी। मैंने उन्हें कई बार समझाने की कोशिश की कि जिंदगी में सब कुछ नहीं मिल सकता और मौत हर सवाल का जवाब नहीं है। मगर वे नहीं माने। मैं जानती हूं वो मौत से मोहब्बत करते थे, बेपनाह मोहब्बत, इसलिए उन्होंने इसे गले लगा लिया।”

                      इस दुनिया से जाने वाले कभी लौट कर वापस नहीं आते ,बस उनकी यादें शेष रह जाती है। गुरुदत्त जी सिनेमा के रुपहले परदे पर और हम सब प्रशंसकों के दिलो में हमेशा अमर रहेंगे .हम सब की ओर से महानायक गुरु दत्त को आँसूओं से धुँधली हो रही नज़रों और भरे हुई  कंठ के साथ उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित है।
                                                                                                                            - अनिल वर्मा

क्रांतिकारी साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"




 क्रांतिकारी साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"
                                                                            -    अनिल वर्मा
  
 
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                                      अमरशहीद भगतसिंह और आज़ाद के साथी रहे सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" जीवन के प्रथम  सौपान में  देश की आज़ादी की संघर्षगाथा में भाग लेने वाले एक महान क्रांतिकारी थे , बाद में वह सैनिक बने और फिर  उन्हें  हिंदी साहित्य जगत में प्रतिभासम्पन्न कवि, शैलीकार, कथा-साहित्य को एक महत्त्वपूर्ण मोड़ देने वाले कथाकार, ललित-निबन्धकार, सम्पादक और सफल अध्यापक के रूप में जाना गया।  अज्ञेय प्रयोगवाद एवं नई कविता को साहित्य जगत में प्रतिष्ठित करने वाले कवि हैं।     
  
                           अज्ञेय का जन्म ७ मार्च १९११ को  उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कुशीनगर नामक ऐतिहासिक स्थान में हुआ था । उनके पिता पण्डित हीरानंद शास्त्री प्राचीन लिपियों के विशेषज्ञ थे। इनका बचपन इनके पिता की नौकरी के साथ लखनऊ, कश्मीर, बिहार और मद्रास आदि कई स्थानों की परिक्रमा करते हुए बीता। अज्ञेय ने घर पर ही भाषा, साहित्य, इतिहास और विज्ञान की प्रारंभिक शिक्षा आरंभ की। 1925 में अज्ञेय ने मैट्रिक की प्राइवेट परीक्षा पंजाब से उत्तीर्ण की इसके बाद दो वर्ष मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में एवं तीन वर्ष फ़ॉर्मन कॉलेज, लाहौर में संस्थागत शिक्षा पाई। वहीं बी.एस.सी.और अंग्रेज़ी में एम.ए.पूर्वार्द्ध पूरा किया। 

                                                       लाहौर में आने के बाद अज्ञेय का झुकाव राष्ट्रीय  आंदोलन की ओर होने लगा था।  वह  १९२९ में पं. मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में अज्ञेय एक स्वयंसेवक अधिकारी के तौर पर मौजूद थे। इन्हीं के स्वयंसेवक दल ने उन लोगो  को अपने कैंप में  बंद कर के रखा था जो गांधी जी के खिलाफ नारे लगाने वाले थे। फिर लाहौर में पढ़ने के दौरान वह क्रांतिकारी भगत सिंह , सुखदेव , धन्वन्तरि एवं  यशपाल के संपर्क में आकर क्रांतिकारी संस्था नौजवान भारत सभा और  हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के सदस्य बन गए  और  वह क्रांतिकारी आन्दोलन में सक्रिय रूप से जुड़कर फरार  हो गए , जिससे उनकी पढ़ाई पूरी न हो सकी।  वह   विज्ञान के छात्र थे और मिस्त्री के काम में भी माहिर थे, अतः दल ने उन्हें अमृतसर में हथियारों की मरम्मत के कारखाने का दायित्व सौप दिया।  वह छदम  मुस्लिम नाम से बिजली के काम की दुकान के बहाने  पिस्तौल सुधारने और खाली कारतूस भरने का कार्य सफलता पूर्वक करने लगे। इसके बाद दल के सेनापति चंद्रशेखर आज़ाद के कहने पर दिल्ली की क़ुतुब रोड पर ऊपर की मंज़िल का एक मकान किराये पर लेकर उस पर '' हिमालयन टॉयलेट फैक्ट्री '' का बोर्ड टांग दिया गया,पर  वास्तव में यह गुप्त बम फैक्ट्री थी ,यहाँ पर अज्ञेय  के साथ क्रांतिकारी यशपाल , प्रकाशवती , विमल कुमार जैन , कैलाशपति भवानी  सहाय भी काम करते थे , कभी कभी वहां दुर्गा भाभी और सुशीला दीदी भी आती थी। अमृतसर की फैक्ट्री में  अज्ञेय की जरुरत होने पर उन्हें दुबारा वहां भेजा गया , पुलिस की भारी धरपकड़  बावजूद एक सहपाठी सबइंस्पेक्टर के सहयोग से वह लाहौर स्टेशन पर तो किसी तरह   बच गए , पर फिर १९३० में वह फैक्ट्री में कई पिस्तौलों के साथ  गिरफ़्तार कर लिया गया । उन पर मुक़दमा चला और ५ साल की सजा दी गयी, जिसे  उन्होंने १९३० से १९३६ तक विभिन्न जेलों मे भोगा, पर उन्होंने जेल जीवन का वृहद उपयोग अध्ययन और लेखन में पारंगत होने में किया  और  वह कालांतर में हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार बन गए ।

                                                         जेल जीवन का प्रभाव अज्ञेय के लेखन पर खूब पड़ा है। उनकी कहानी ' कोठरी की बात ' पढ़कर यह पता लगता है कि  आंदोलनकारी कैसे मजबूत बनते होगे। जब अज्ञेय जी जेल में थे, तभी उनका काव्य-संग्रह 'भग्नदूत' और 'इत्यलम्' प्रकाशित हुआ। इस संग्रह की कविताओं में क्रांति का स्वर प्रधान था।  सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन को 'अज्ञेय' नाम मुंशी प्रेमचंद से मिला। इसका जिक्र स्वयं अज्ञेय जी ने अपने एक साक्षात्कार में किया था। इस साक्षात्कार के अनुसार, अज्ञेय ने जैनेंद्र कुमार के पास अपनी रचनाएं प्रकाशन के लिए भेजीं। जैनेंद्र जी ने वह रचनाएं प्रेमचंद जी को दीं। रचना पर लेखक का नाम नहीं था। प्रेमचंद ने उनसे रचनाओं के लेखक का नाम पूछा। इस पर जैनेंद्र जी ने कहा लेखक का नाम तो नहीं बताया जा सकता, वह तो 'अज्ञेय' है।' इस पर प्रेमचंद जी ने कहा, 'तब मैं 'अज्ञेय' नाम से ही कहानी छाप दूंगा।' बस उसी दिन से 'अज्ञेय' नाम से रचनाएं प्रकाशित होने लगीं।  

                            अज्ञेय ने जेल से रिहाई के बाद १९३६-३७ में सैनिक और विशाल भारत नामक पत्रिकाओं का संपादन किया।  वह १९४३ से १९४६ तक ब्रिटिश सेना में रहे ,  इसके बाद इलाहाबाद से प्रतीक नामक पत्रिका निकाली और ऑल इंडिया रेडियो की नौकरी स्वीकार की। उन्होंने देश-विदेश की अनेक यात्राएं कीं। जिसमें उन्होंने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से लेकर जोधपुर विश्वविद्यालय तक में अध्यापन का काम किया। फिर वह वापस दिल्ली लौटे और दिनमान साप्ताहिक, नवभारत टाइम्स, अंग्रेजी पत्र वाक् और एवरीमैंस जैसी प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया। १९८० में उन्होंने वत्सलनिधि नामक एक न्यास की स्थापना की ,जिसका उद्देश्य साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में कार्य करना था।  अज्ञेय प्रयोगवाद एवं नई कविता को साहित्य जगत में प्रतिष्ठित करने वाले कवि हैं। अनेक जापानी हाइकु कविताओं को अज्ञेय ने अनूदित किया। बहुआयामी व्यक्तित्व के एकान्तमुखी प्रखर कवि होने के साथ-साथ वे एक अच्छे फोटोग्राफर और सत्यान्वेषी पर्यटक भी थे।

                                               सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय का कृतित्व बहुमुखी है और वह उनके समृद्ध अनुभव की सहज परिणति है। अज्ञेय की प्रारंभ की रचनाएँ अध्ययन की गहरी छाप अंकित करती हैं या प्रेरक व्यक्तियों से दीक्षा की गरमाई का स्पर्श देती हैं, बाद की रचनाएँ निजी अनुभव की परिपक्वता की खनक देती हैं। अज्ञेय स्वाधीनता को महत्त्वपूर्ण मानवीय मूल्य मानते थे, परंतु स्वाधीनता उनके लिए एक सतत जागरुक प्रक्रिया रही। अज्ञेय ने अभिव्यक्ति के लिए कई विधाओं, कई कलाओं और भाषाओं का प्रयोग किया, जैसे कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, यात्रा वृत्तांत, वैयक्तिक निबंध, वैचारिक निबंध, आत्मचिंतन, अनुवाद, समीक्षा, संपादन। उपन्यास के क्षेत्र में 'शेखर' एक जीवनी हिन्दी उपन्यास का एक कीर्तिस्तंभ बना। नाट्य-विधान के प्रयोग के लिए 'उत्तर प्रियदर्शी' लिखा, तो आंगन के पार द्वार संग्रह में वह अपने को विशाल के साथ एकाकार करने लगते हैं। निस्संदेह वे आधुनिक साहित्य के एक शलाका-पुरूष थे ,जिसने हिंदी साहित्य में भारतेंदु के बाद एक दूसरे आधुनिक युग का प्रवर्तन किया।

                                                           अज्ञेय अन्तमुर्खी थे , उन्हें अपने निजी जीवन के बारे में बाते करना अच्छा नहीं लगता था , फिर भी अज्ञेय ने अपनी चिन्तन-प्रकिया , अपनी रचना प्रकिया और अपने व्यक्त्तिगत जीवन के अनुभवों के बारे में बहुत कुछ लिखा है। १९६४ में 'आँगन के पार द्वार ' कृति पर उन्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार प्रदान किया गया था  और १९७९ में 'कितनी नावों में कितनी बार 'पर उन्हें  भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया था। सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" ने भले ही इस दुनिया से ४ अप्रैल १९८७ को विदा ले ली हो, लेकिन उनका काम, उनकी कृतियां नए रचनाकारों को आज भी प्रेरित करती हैं।

                                                                                                                       -  अनिल वर्मा