Revolutionary Seth Damodar Swaroop


        रेली की शान :क्रांतिकारी सेठ दामोदर स्वरूप 

                                                                                    -अनिल वर्मा 
                                          राम गंगा नदी के तट पर स्थित बरेली की विरासत काफी समृद्ध है.पहले महाभारत काल में पांचाल शासकों और फिर १८वीं सदी में रोहिल्ला नवाबों की राजधानी के रूप में प्रख्यात यह पावन धरा कभी भी वीरों से रिक्त नहीं हुई है।सन १८५७ के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में बरेली के नबाब खानबहादुर खान और उनके दीवान  मुंशी शोभा राम ने ३१ मई १८५७ को बरेली की आज़ादी का ऐलान कर दिया था और लगभग दो साल तक स्वाधीनता के साथ अग्रेजो को धूल  चटाई थी । अन्तः ब्रिटिश हूकूमत ने वीर खान बहादुर खान और उनके २५७ साथियों को गिरफ्तारर करके २४ फरवरी १८६० को पुरानी  कोतवाली में पेड़ो पर सरेआम फांसी  पर लटका दिया दिया था,आज भी नबाब खान बहादुर की जिला जेल स्थित कब्र और कमिश्नरी स्थित वह ऐतिहासिक पेड उनके अदम्य शौर्य की गाथा बखान कर रहे है,वास्तव में हमारे देश को ऐसे ही वीर शहीदों और क्रांतिकारियों के लहू से यह आज़ादी नसीब हुई है, बरेली के इन अमर शहीदों को नमन है.

                       सन १९२५ में काकोरी के निकट चंद क्रांतिकारियों ने रेल सेसरकारी खजाना लूटकर पूरे देश में ब्रिटिश हूकूमत को सामूल हिलाकर रख दिया था ,ताबड़तोड़ गिरफ्तारियों में ४० नौजवान क्रांतिकारियों को पकड़कर जेल में डाल दिया गया । इन्हीं में से चार ने बरेली सेंट्रल जेल का नाम स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में दर्ज कर दिया था ।हालाँकि इस कांड  में बरेली के किसी क्रांतिकारी की सीधी भागीदारी नहीं थी, पर २६सितंबर १९२५ को गिरफ्तारियां हुई ,तो बरेली  के दामोदर स्वरूप सेठ को भी पकड़ा गया। बाद में चार क्रांतिकारियों को सजा काटने के लिए बरेली सेंट्रल जेल में भेजा गया, जिनमें मन्मथनाथ गुप्त को १४  साल,राजकुमार सिन्हा को १० साल,मुकंदी लाल और शचीन्द्र नाथ बख्शी को आजीवन कारावास की सजा मिली थी ।


                   बरेली का केन्द्रीय कारागार स्वाधीनता आन्दोलन के महान  सेनानियों और शीर्षस्थ क्रान्तिकारियों का केन्द्र रहा।क्रांतिकारियों ने इसी जेल में रहकर अपनी मांगों के लिए ५० दिन लम्बी ऐतिहासिक भूख हडताल की थी,हड़ताल तोड़ने के कुत्सित प्रयास होने पर उन्होंने साफ कह दिया कि अब मांगों का नहीं हमारी लाशों का बंदोबस्त करना शुरू करो। उनके इस अदम्य साहस पर भगत सिंह ने भी संदेश भेजकर हौसला अफजाई की थी । इस हड़ताल को देश में प्रचारित होने का श्रेय दामोदर स्वरूप सेठ को जाता है, जिन्होंने जान पर खेलकर अंदर बाहर सूचनाओं का प्रसार किया, अन्तः हड़ताल सफल हुई काकोरी केस में वे और राजेन्द्र लाहिडी दो ही ऐसे क्रान्तिकारी थे, जो जेल से अदालत जाते समय ’भारतीय प्रजातंत्र की जय‘ के नारे लगाया करते थे, इस से सेठ जी की प्रगतिशीलता प्रगट होती है। उनकी अपार लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि १९३० में इस शहर की सडकों पर एक नारा गूंजता था-’’बांस बरेली का सरदार, सेठ दामोदर जिन्दाबाद ''। परन्तु जेल की नारकीय यातनाओ के कारण   सेठ दामोदर स्वरुप  बहुत बीमार हो गए थे , उनकी चिकित्सा की उचित व्यवस्था नहीं हुई , एक साल में जेल में दर्द से तड़फते रहने से उनके शरीर में केवल ढाचा मात्र  रह गया था , उनका वजन १०० पौंड से केवल ६६ पौंड रह गया था ,वह तिल तिल मौत की तरफ बढ़ रहे थे , अमरशहीद रामप्रसाद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा '' काकोरी षड़यंत्र '' में उनकी स्थिति का वर्णन किया था , सेठ जी की इस मरणासन्न स्थिति  से भयभीत होकर अंगेज सरकार ने पहले उन्हें जमानत पर छोड़ दिया , फिर मुकदमा सेशन में आने पर उनके खिलाफ मामला वापस ले लिया था।  

                                                  सेठ दामोदर स्वरुप ने बरेली जेल से रिहा होने के बाद सन  १९२७ में देहरादून के निकट राजपुर में डा. केशव चंद शास्त्री से इलाज कराया , तब सेठ जी के दुर्बल शरीर में केवल चमड़ी और हड्डी ही रह गयी थी , वह बिना सहारा दिए करवट भी नहीं बदल पाते थे , एक दयालु अमेरिकन महिला फ्रेडा दास की अनथक सेवा से देश के काम आने के लिए उनकी जिंदगी बच गयी। इसके बाद वह फिर से  देश की आज़ादी की लडाई में सक्रिय  हो गए ,सन १९३० में कानपुर  में आयोजित क्रान्तिकारी दल की गोपनीय बैठक में चन्द्रशेखर आज़ाद ने उन्हें हिसप्रस के संगठन विभाग का नेतृत्व सौपा  था।


                                   ११  फरवरी १९०१ को बरेली में जन्मे सेठ दामोदर स्वरुप मूलतः बिहारीपुर के रहने वाले थे,उन्हें अधययन के लिए इलहाबाद भेजा गया था , जहाँ वह क्रांतिकारियों के संपर्क में आ गए ,फिर उन्होंने आजन्म अविवाहित रहकर देशसेवा का व्रत लिया था , वह असहयोग आंदोलन के दौरान जेल गए , उन्होंने लाला लाजपत रॉय की 'लोक सेवक समिति ' की  सदस्यता ली थी ,  वह समर्पित क्रान्तिकारी  थे , उन्हें सन १९२२  में हुए चर्चित बनारस कांड में सात साल की सजा हुई थी। उन्हें बरेली छावनी में विद्रोह कराने की बडी जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। काशी विद्यापीठ में वह अवैतनिक शिक्षक भी रहे। उन्होंने पहले अपना एक अलग क्रान्तिकारी दल  बनाया था , बाद में उस दल का विलय शचीन्द्रनाथ सान्याल और आज़ाद के हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ में कर लिया था। जब अमरशहीद  आज़ाद , भगत सिंह और अन्य प्रमुख क्रांतिकारियों की शहादत के बाद क्रान्तिकारी  दल लगभग समाप्तप्राय: हो गया , तब सेठ जी ने समाजवादी पार्टियो के साथ मिलकर काम करके  स्वाधीनता के लिये संघर्ष को सतत जारी रखा। वह कांग्रेस समाजवादी पार्टी के प्रमुख सदस्य थे,बाद में उन्होने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के साथ फारवर्ड ब्लाक में भी काम किया।

                  सेठ जी  सन १९३७ एवं १९४६ में संयुक्त प्रान्त की विधान सभा के सदस्य रहे , वह द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नज़रबंद रखे गए ,जेल से रिहा होने के बाद सन १९४५ उन्हें संविधान सभा का सदस्य भी बनाया गया , लेकिन  संविधान का जो प्रारूप तैयार हुआ, उस पर उन्होंने  विरोध करते हुए यह कहकर दस्तखत करने से मना कर दिया कि वे उसे समाज के अनुरूप उचित नहीं मानते है . उन्होने आरक्षण का बहुत विरोध किया था ,उनका यह कहना था कि किसी वर्ग विशेष के लिए सेवाओं में आरक्षण का अर्थ दक्षता और अच्छी सरकार को नकारना है । अपने अंतिम दिनों में  सेठ जी ने अपनी आत्मकथा भी लिखी थी ,पर दुर्भाग्यवश लखनऊ की गोमती नदी में आई बाढ में जब मोती महल जलमग्न होने पर
वह नष्ट हो गयी। पूर्व प्रधानमंत्री  चन्द्रशेखर ने अपनी आपातकाल की जेल डायरी में  सेठ जी की चर्चा की है। कहा जाता है कि एक बार सेठ दामोदर स्वरूप ने चंद्रशेखर को बर्तन साफ करते हुए देख लिया, तब उन्होंने उल्टे पांव आचार्य नरेंद्र देव के पास जाकर आग बबूला होकर कहा कि आप राजनीति के नाम पर युवकों का शोषण कर रहे हैं। पं. कमलापति त्रिपाठी ने भी अपनी आत्मकथा में  उनके संस्मरणों का उल्लेख किया है।सन १९६५ में सेठ दामोदर जी का निधन हुआ था।  

                  अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद के क्रांतिकारी साथी  सेठ दामोदर स्वरूप एक 
सच्चे देशभक्त , निर्भीक, जुझारू और लगनशील  स्वाधीनता सेनानी थे ,वह बरेली की शान थे , पर इस महान शहर ने उनके नाम पर चौकी चौराहे पर महज एक पार्क बनाकर उनको भुला दिया गया।  १३ अप्रैल १९९० को जंक्शन रोड पर तत्कालीन मेयर राजकुमार अग्रवाल ने दामोदर स्वरूप सेठ की प्रतिमा स्थापित कर कर इस पार्क का निर्माण कराया था। परन्तु अब  इस पार्क की देखभाल की भी जरूरत नहीं समझी जाती है ,इस की हालत बेहद दयनीय है। पार्क में स्थापित सेठ जी की प्रतिमा आसपास के पेड़ों से घिर गई है।  पार्क नशेड़ियों का अड्डा बन गया है . प्रतिमा के कान, नाक और टोपी को भी शरारती तत्वों ने खंडित कर दिया है। भीषण दुर्दशा का आलम यह है कि सरेआम नशेड़ी प्रतिमा के पास ही बैठकर नशे के इंजेक्शन लगाते हैं और शराब पीते हैं,लेकिन कोई उन्हें रोकने वाला नहीं है।  


                 यह विडम्बना है कि इस देश में स्वाधीनता के उपरांत क्रांतिकारियों  को कभी भी यथोचित सम्मान नहीं मिल सका है , सेठ दामोदर स्वरूप सेठ की स्थिति भी उनसे भिन्न नहीं है ,वास्तव स्वाधीन भारत के वाशिंदों ने नीवं में गड़े उन पत्थरों को ही भुला दिया है , जिन पर स्वाधीनता की बुलंद इमारत खड़ी है , पर यह याद रखे कि इतिहास इसके लिए हमे कभी माफ़ न कर सकेगा ।

                        '' प्रेरणा शहीदों से अगर हम नहीं लेगे , आज़ादी ढलती हुई साँझ हो जाएगी।
                         यदि वीरों की पूजा हम नहीं करेंगे तो,यह सच मानों वीरता बाँझ हो जाएगी। '' 

                                                                                                                          
बरेली उ. प्र. स्थित सेठ दामोदर की प्रतिमा ( फोटो बरेली की श्रीमती मधुलिका शर्मा से साभार प्राप्त )
 
                                                                                                                            - अनिल वर्मा
                                                                                                                          

         गुमनामी में रहे क्रांतिवीर सुखदेव राज 

                                                                                       -अनिल वर्मा 

                                   कुछ दिनों पूर्व मुझे   दुर्ग (छत्तीसगढ़) से  १४ कि.मी. दूर स्थित अंडा गावँ जाकर  प्रख्यात  क्रांतिकारी  सुखदेव राज के स्मारक के दर्शन करने का सौभाग्य मिला था , पर यह देखकर मन दुखित  हो गया कि वह क्रांतिवीर जो अमरशहीद चंद्रशेखर आज़ाद के अंतिम पलो का  साथी  था , जिसने  क्रांतिकारी भगत सिंह , आज़ाद , भगवतीचरण, दुर्गा भाभी आदि के  साथ मिलकर वतन की आज़ादी के लिए अपने प्राणो की बाज़ी लगा थी ,उसे आज  समाधिस्थल के आसपास रहने वाले लोग तक नहीं जानते है , उनकी श्वेतप्रतिमा पर सालो से जमी धूल मिट्टी  और मकड़ी के जाले  यह  बखूबी बयां  कर रहे थे कि स्वाधीन भारत में एक महान क्रांतिकारी के लिए लोगो के मन में  सम्मान की क्या भावनाएं बची है।

सुखदेव राज का अंडा स्थित स्मारक
वैशम्पायन के साथ सुखदेव राज
                                बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में उभरे क्रान्तिकारी  आंदोलन को जिन लोगो ने अपना सर्वस्व्  समर्पण कर पल्ल्वित किया , उनमें  सुखदेव राज का भी  प्रमुख स्थान है।  उनका जन्म ७ दिसम्बर १९०७ को पंजाब के गुरदासपुर जिला के एक  छोटे से गावं के धनाढ्य खत्री  परिवार  में हुआ था , माता ने  कठोर अनुशासन और ममता के साथ उनकी शिक्षा पर  काफी ध्यान  दिया , पर सन १९१९ में जलियाँवाला हत्या कांड में हज़ारो देशवासियों के बलिदान से प्रेरित होकर सुखदेव राज ने अपना जीवन भारत माता की आज़ादी के लिए समर्पित करने का संकल्प कर लिया।  लाहौर  से इण्टरमीडिएट प्रथम श्रेणी से पास करने के बाद पिता की जिद पर उन्होंने मजबूरन रेलवे के ऑडिट  ऑफिस में नौकरी कर ली , पर  लाहौर में  वह दौर क्रान्ति युग की शुरुवात का था , वह पहले क्रान्तिकारी भगवतीचरण वोहरा और उनकी पत्नी दुर्गा भाभी के संपर्क में आये , फिर भगत सिंह और धन्वन्तरी से उनकी मुलाकात हुई , सुखदेव ने फिर से कॉलेज में प्रवेश ले लिया ,वह स्टूडेंट फेडरेशन के सेक्रेटरी बन गए और सक्रिय  रूप से  क्रान्तिकारी दल से जुड़ गए.भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव द्वारा एडिशनल एस.पी.  साण्डर्स की हत्या करने की ऐतिहासिक घटना के लाहौर षड्यंत्र केस  में वह पृष्ठभूमि में थे भगवती चरण जी के कहने पर,सुखदेव राज दल के कार्य से कलकत्ता गए , पर वहां से रंगून चले गए ,वहां किसी तरह से सी. आय.डी.पुलिस से पीछा छुड़ाया , फिर वह कलकत्ता लौटकर कुछ दिनों तक शांतिनिकेतन में रहे।

                                   सुखदेव राज को २४ दिसम्बर सन १९२९ को वाइसराय की ट्रैन के नीचे बम रखने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया , तब लाहौर की बोस्टल जेल में निरूद्र रखा गया था , बाद में उन्हें जमानत पर छोड़ दिया गया . असेम्बली बम विस्फोट की ऐतिहासिक घटना में भगतसिंह  और बटुकेश्वर दत्त गिरफ्तार किये जा चुके थे , उन्हें छुड़ाने के लिए लाहौर  की बहावलपुर कोठी में  क्रान्तिकारी दल एकत्र था , सुखदेव राज भगवतीचरण के साथ रावी नदी के किनारे बम को परखने के लिए गए थे , तब अचानक हाथ   में बम फट जाने से भगवती भाई शहीद हो गए , इसके बाद पुलिस की सक्रियता बढ़ जाने से सुखदेव राज आज़ाद के आदेश पर बम्बई चले गए , वहां पर उन्होंने दुर्गा भाभी और पृथ्वीसिंह आज़ाद के साथ मिलकर लेमिंगटन रोड पर बम्बई के पुलिस कमिश्नर को शूट करने की साहसिक घटना में भाग लिया था , उसमे एक यूरोपियन अफसर मारा गया हुआ था , पुलिस ने दुर्गा भाभी और सुखदेव राज को घेर लिया , पर वो अंतिम समय पर पुलिस को चकमा देकर भाग निकले थे , वह द्वितीय लाहौर षड़यंत्र केस में फरार अभियुकत धोषित किया जा चुके  थे। भगत सिंह , सुखदेव , राजगुरु , यतीन्द्रनाथ दास , बटुकेश्वर दत्त ,सदाशिव मलकापुरकर , भगवानदास माहौर आदि की गिरफ्तारी से दल   छिन्न  भिन्न हो चूका था , पर तब भी सुखदेव राज दल के सेनापति चंद्रशेखर आज़ाद के साथ दल का पुनः संयोजन का प्रयास कर रहे थे ,२७ फरवरी सन  १९३१ को सुबह ८ बजे वह आज़ाद के साथ अल्फ्रेड पार्क इलहाबाद  में थे , तभी अचानक पुलिस ने उन्हें घेर लिया , आज़ाद  जीवटता से अंतिम समय तक पुलिस का डटकर मुकाबला करते हुए देश के लिए शहीद हो गए , पर उनके  आदेश पर सुखदेव राज उन्हें छोड़कर वहां से फरार  होना पड़ा , सुखदेव राज को आज़ाद को शहादत के समय छोड़कर जाने का दुःख सदैव सालता रहा , बाद में लाहौर में शालीमार पार्क में सुखदेव राज भी गिरफ्तार किये गए , उन्हें इस बार लाहौर जेल में कैद रखकर भीषण नारकीय यातनाये दी गयी ,उन्हें आर्म्स एक्ट में तीन साल की कठोर कारावास की सजा दी गयी ,, लाहौर में स्पेशल ट्रिब्यूनल के सामने उन पर द्वितीय लाहौर षड़यंत्र केस का मुकदमा चला और इस मामले में  उन्हें  तीन साल की सजा दी गयी , पर जेल के भीतर भी उनकी जीवटता और जिंदादिली में रंच मात्र भी कमी नहीं आई , वह वहाँ  भी अंग्रेजों  अफसरों के अन्याय पूर्ण दुर्व्यवहार के खिलाफ जमकर मुकाबला करते थे , वह करीब १५०० दिन लाहौर और मियांवाली जेल में सजा भोगे थे।
                                 आज़ादी को लेकर क्रांतिकारियों के मन में एक सपना था , जिसे जीवित क्रांतिकारियों ने आज़ादी के बाद ढहते देखा , इसी अपूर्णता को लेकर सुखदेव राज के भीतर बैचेनी बढ़ गयी और उन्होंने सदा के लिए घर छोड़ दिया , उन्होंने बौद्ध धर्म  अपना लिया , वह कई वर्षो तक गया में रहे , सन ५० के दशक में जब वो आचार्य विनोबा भावे से मिले , विनोबा जी उनसे कहा कि  क्रान्तिकारी को ऐसा जीवन शोभा नहीं देता है , फिर वह विनोबा जी की प्रेरणा से कुष्ठ रोगियों की सेवा में जुट गए। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री कैलाश नाथ काटजू के कहने पर वह दुर्ग जिले के अंडा गावं में आ गए और फिर उन्होंने कर्मठतापूर्वक यहाँ अपना बचा हुआ सम्पूर्ण जीवन कुष्ठ रोगियों की सेवा के मिशन के लिए समर्पित कर दिया , बाहरी दुनिया से उनका संपर्क कट गया ,काफी दिनों बाद उनके क्रन्तिकारी साथी वैशम्पायन ने जो रायपुर में महाकौशल पत्रिका के संपादक थे , उन्हें दुर्ग रेलवे स्टेशन पर देखकर पहचाना , फिर वैशम्पायन जी की प्रेरणा और सरोजिनी नायकर के सहयोग से उन्होंने एक पुस्तक '' जब जागी ज्योति '' लिखी थी।

                                             गुमनामी के अंधेरों में रहते हुए ही सुखदेव राज  ५ जुलाई १९७३ को दुनिया से अलविदा हो गए , उनकी मौत के बाद अंडा गावं में सन १९७६ में उनकी स्मृति में स्मारक बनाया गया , जिसका अनावरण म. प्र. के मुख्यमंत्री श्री श्यामाचरण शुक्ल ने किया था , पर स्मारक की वह जगह अब वो किसी गणपति प्रोडक्ट इंडस्ट्रीज को बेची जा चुकी है , उनका समाधि स्थल अब परिसर में बंद  है , बाहर कोई सूचना पटल तक नहीं है ,अब  यहाँ सुखदेव राज का स्मारक होने के बारे किसी को पता नहीं लगता है, छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार से यह  उम्म्मीद है कि वह इस महान क्रांतिवीर को सम्मान प्रदान करने के लिए उनके स्मारक को विकसित करेगी, ताकि उनसे युवा पीढ़ी को देशप्रेम और बलिदान की प्रेरणा मिल सके ।

कुष्ठरोग आश्रम का भवन
स्मारक पर अनिल वर्मा, अजीत बक्शी
उनके स्मारक पर अंकित उद्गार
सुखदेव राज द्वारा लिखित पुस्तक

क्रान्तिमूर्ति दुर्गाभाभी की जन्मस्थली शहजादपुर

                       

                                                                                           -अनिल वर्मा एवं हेत सिंह 

                                                            अपने जीवन को समिधा की भांति होम करके स्वाधीनता यज्ञ की पावन अग्नि को सदा प्रज्वलित करने वाली  क्रान्तिमूर्ति दुर्गा भाभी वास्तव में देश की आज़ादी की नींव के चन्द पत्थरों में से एक है .वह आज़ादी के लिए क्रांति के पथ पर चलने  वाली प्रथम भारतीय नारी थी,उन्होंने शौर्य और जीवटता के साथ क्रान्तिकारी आन्दोलन मे  सक्रिय योगदान दिया था .धन्य है,उत्तरप्रदेश के कौशाम्बी जिला के सिराथू तहसील के गाँव शहजादपुर की धरती,जिसने इस महान वीरांगना को जन्म दिया था . 

                            भगतसिंह, सुखदेव , आजाद आदि   प्रखर क्रांतिकारियों  की अनन्य साथी दुर्गा देवी बोहरा का जन्म ७ अक्टूबर १९०७ को शाहज़ादपुर में हुआ था , उनके पिता बांकेबिहारी भट्ट इलाहाबाद  कलेक्ट्रेट में  नाज़िर थे ,जब वह केवल १० माह की थी , तभी उनकी माता यमुना की मृत्यु हो गयी ,पिता ने दूसरा विवाह कर लिया , सौतेली माँ ने  प्रताड़ित करके कर तीसरी कक्षामें ही उनकी पदाई छुड़ा दी थी , पिता को भी वैराग्य की धुन लग गयी थी ,बुआ जी  की  सख्त संरक्षकता में शहजादपुर और गंगा नदी के किनारे  करेहटी की कुटी में उनका बचपन बीता था  ,महज 11 वर्ष की अल्पायु में ही सन १९१७-१८ में भगवती शरण बोहरा से उनका विवाह हो गया , वह  प्रखर  देशभक्त थे , उनके साथ ने दुर्गा देवी के मन में भी राष्ट्रप्रेम और  देश की आज़ादी के लिए संघर्ष करने की अलख  जगा दी थी .हालाँकि उनके ससुर अंग्रेजपरस्त थे , जब उन्हें ब्रिटिश हूकुमत रायबहादुर का ख़िताब से विभूषित करने  जा रही थी ,तब इसके विरोध में भगवतीचरण और दुर्गा देवी ने उनका घर त्याग  दिया ,फिर दुर्गा देवी ने पति की प्रेरणा से अपनी अधूरी  पढाई  पूरी की और  नेशनल कॉलेज लाहौर से प्रभाकर की उपाधि ली थी  .

                                                          ससुर की मौत के बाद अंग्रेज सरकार द्वारा प्रताड़ित करने पर दुर्गा देवी अपने पति सहित १७ अगस्त १९२० को शहजादपुर आ गयी थी  ,२ माह तक वह दोनों यहाँ चोरी छिपे क्रांतिकारियों की  मदद करते रहे ,   अपार धन दौलत , एश्वर्य और सुखों को त्याग कर क्रांति के कंटक  से भरे मार्ग पर चलना कठिन तपस्या की भांति था ,दुर्गा   देवी  को ससुर जी से ४० हज़ार रूपये मिले थे ,हालाँकि पिता उनकी क्रांति पथ  के पघधर  नहीं थे , फिर भी उन्होंने दुर्गा के लिए ५ हज़ार रूपये श्री बटुक नाथ अग्रवाल के पास रखवा दिए थे , बाद में यह सम्पूर्ण राशि क्रान्तिकारी गतिविधियों के संचालन में  काफी काम आयी थी  .  

                    दुर्गा भाभी ने अपने पति भगवतीचरण बोहरा  साथ मिलकर अंग्रेजो के खिलाफ  सशस्त्र  क्रान्तिकारी  गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लिया  , उन्होंने भगत सिंह , सुखदेव , राजगुरु , आजाद और यशपाल के साथ कन्धा से कन्धा  मिलाकर  आज़ादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी  , सभी क्रान्तिकारी साथी उन्हें आदर से ''भाभी ''  कहते थे , उनके पति भगवती शरण ने भगतसिंह के साथ मिलकर क्रान्तिकारी दल हिन्दुस्तानी रिपब्लिक आर्मी का गठन किया था , लाहौर में रावी के तट के किनारे बम विस्फोट में पति की शहादत के सदमे को भी उन्होंने अदम्य  धैर्य एवं हौसले  से झेला था और अपने वैधव्य के दर्द को भुला कर अपना जीवन दल और देश के लिए समर्पित कर दिया था . क्रान्तिकारी दल द्वारा अंग्रेज पुलिस कप्तान सांडर्स के वध उपरांत उन्होंने भगत सिंह और उनके साथियों को पुलिस लाहौर के चप्पे चप्पे में शिकारी कुत्तों की तरह तलाश कर रही थी , तब दुर्गा भाभी ने  अफसर के वेशधारी भगत सिंह की पत्नी बनकर   मेमसाहब के रूप धारण कर के  अपने छोटे से बच्चे शची का जीवन भी खतरे में डालकर उन्हें  ट्रेन से लाहौर से कलकत्ता पहुचने में असीम शौर्य  का परिचय दिया था .उनका दूसरा खास काम लैमिग्टन रोड गोलीकांड को अंजाम देना था ,  9 अक्टूबर १९३० को उन्होंने बम्बई  के गवर्नर हैली को मौत के घाट उतरने के लिए  उसी  बंगले में धुसकर  गोलिया चलायी थी , पर दुर्भाग्य से  हैली तो बच गया , परन्तु एक अग्रेज अफसर और  महिला को गोली लगी थी .

                                           सन १९३१ में भगतसिंह , राजगुरु और सुखदेव फांसी पर चढकर शहीद हो गए , आजाद सहित सभी प्रमुख क्रान्तिकारी   शहीद हो गए थे अथवा पकड़ जा चुके  थे , क्रान्तिकारी दल छिन्नं भिन्न हो गया , गहन हताशा का दौर था फिर भी दुर्गा भाभी क्रान्तिकारी  बुलंद हौसले के साथ आन्दोलन को आगे बढ़ने में जुटी रही , अंततः वह भी पकड़ी गयी और जेल  गयी , जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने कुछ दिनों तक दिल्ली में कांग्रेस के साथ काम किया , फिर उन्होंने सन १९३९ में लखनऊ के पुराना किला इलाके में एक मांटेसरी स्कूल की स्थापना की और इसके बाद उन्होंने  अपना संपूर्ण जीवन  बच्चो की  शिक्षा और समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया , बाद में उन्होंने यही पर क्रान्तिकारी शिव वर्मा के साथ मिलकर शहीद स्मारक और स्वतंत्रता संग्राम शोध संस्थान की स्थापना की थी और बाद में अपनी पूरी सम्पति संस्थान को समर्पित करके उनके इकलौते बेटे शचि के पास गाज़ियाबाद चली गयी , वही पर १४  अक्टूबर  १९९९ को दुर्गा भाभी ने दुनिया को अलविदा कर दिया था .

                                 दुर्गा भाभी का शादी के बाद शहजादपुर आना जाना लगा रहता था , वह सन १९४२ में पिता की मृत्यु के बाद यहाँ आई थी , फिर उनका शहजादपुर आना संभव न हो सका , मेरे आदरणीय बुजुर्ग शुभचिंतक   श्री हेतसिंह जी  के भीतर ८० वर्ष की आयु  में  आज भी राष्ट्रप्रेम का  वही अनूठा जज्बा है , जो स्वाधीनता के पूर्व युवावस्था में था , देशभक्तों  और क्रांतिकारियों की  उपेक्षा से उनका मन  बहुत व्यथित रहता है . वह स्वयं गत १ अप्रैल २०१४  को शहजादपुर गए थे और दुर्गा भाभी के चचेरे भतीजे श्री उदयशंकर भट्ट से मिले थे , उदय जी ने उन्हें यह  बताया कि उनके पूर्वज करीब ३५० वर्ष पूर्व गुजरात से यहाँ आकर बस गए  थे , कालांतर में यहाँ उनके पूर्वजो की जमींदारी कायम हो गयी थी ,  दुर्गा भाभी और भगवती शरण जी के क्रान्तिकारी हो जाने से अंग्रेजो ने उनके परिवार की  सारी संपत्ति कुर्क कर हडप ली थी , पर उन्हें अपने परिवार के इस महान वीरांगना पर गर्व है . 

                                      स्वाधीनता उपरांत  महान क्रान्तिकारी दुर्गा भाभी ने देश के लिए  अपनी महान सेवाओं के लिए कोई प्रतिफल नहीं चाहा , उनसे कम उपलब्धि हासिल करने वाली एक महिला क्रान्तिकारी   सरकार  ने भारत रत्न से नवाजा , जबकि भाभी  पूर्णता गुमनामी के अँधेरे में खोयी रही  . यह विडम्बना है कि अपनी ही सरजमीं  पर भी  दुर्गा भाभी आज तक यथोचित सम्मान से वंचित है ,  राजनेताओं द्वारा अनेक बार घोषणायें करने के बावजूद शाहजादपुर में दुर्गा  भाभी का आज तक कोई राष्ट्रीय स्मारक नहीं बन सका  है,  शहजादपुर में जिस ऐतिहासिक घर में दुर्गा भाभी का जन्म हुआ था ,उसकी  पावंन भूमि हर देशभक्त के लिए एक तीर्थ की भांति नमन किये जाने योग्य  पवित्र स्थल   है , पर आज भी वह मकान  जीर्णशीर्ण हालत में  पड़ा हुआ है , दुर्गा भाभी के  नाम का सहारा लेकर राजनीति की वैतरणी पार करने वाले नेताओ द्वारा  उनकी  कोई सुध न लिया बेहद शर्मनाक है ,आज यह स्थिति शहजादपुर की ही नहीं वरन पूरे देश की है , क्रांतिकारियों और स्वाधीनता संग्राम सेनानियों से जुड़े अधिकांश  ऐतिहासिक स्थल उपेक्षा के शिकार हो रहे  है . उनका अस्तित्व ही मिटने की कगार पर है , आगामी   पीढ़ियों के लिए  देश की आज़ादी के इतिहास की इस बेशकीमती विरासत को  संजोने की किसी को कोई फिक्र नहीं है .निसंदेह स्वाधीनता के उपरांत हम आर्थिक और भौतिक रूप से विकास  की बुलंदियों तक पहुँच रहे है, पर यह भी कटुसत्य  है कि स्वाधीन भारत के वाशिंदों  ने अपनी नीवं के उन पत्थरों को भुला दिया है , जिन पर तरक्की की यह बुलंद इमारते खड़ी  है .

                                   '' जिनकी लाशो पर चलकर यह आज़ादी आई है 
                                       उनकी याद बहुत ही गहरी लोगो ने दफनाई है .''

                                                                                                - अनिल वर्मा (मो. न. 09425181793   )
                                                                                                - हेत सिंह    (मो. न. 07275020220 )  
  
( निवेदन -  कृपया पाठक गण लेख पर टीप लिखकर अपने विचारों से अवगत करने का कष्ट करे )

    

                                                          
                           
दुर्गा भाभी का जन्मस्थल 

दुर्गा भाभी का मकान







Amar Shaheed Thakur Roshan Singh


           ठाकुर रोशनसिंह : उपेक्षित है अंतिम निशाँ

 

                       ‘’ शहीदों की चिताओ पर लगेंगे हर बरस मेले,
                              वतन पर मरने वाले का यही बाकि निशाँ होगा‘’

         
रोशन सिंह का फांसी स्थल



बावड़ी , जहाँ रोशन सिंह  स्नान करते थे
रोशन सिंह की बैरेक


                                                                     आज के दौर में यह शेर पूर्णतः बेमानी हो चुका है ,मुल्क की आज़ादी के लिए मर मिटने वाले अमरशहीदों को भुला दिया गया है,शहीदों के विचारों, संदेशों ,उनके बलिदान की अनुपम गाथाएं भी बिसरा दी गयी है ,अधिकांश शहीदों के जन्मस्थल एवं शहादत स्थल और उनसे जुड़े स्मारक बदहाली और गुमनामी के अंधेरों में खो गए है.यही अंजाम ऐतिहांसिक काकोरी कांड मे शहीद होने वाले क्रान्तिकारी ठाकुर रोशन सिंह का शहादत स्थल का भी हुआ है.

          
          9 अगस्त, 1925 को लखनऊ के निकट काकोरी में रेल का सरकारी खजाना लूटकर ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने वाले काकोरी कांड और बमरौली डकैती कांड में २२ अगस्त १९२७ को लखनऊ की चीफ कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश लुइस शर्ट और विशेष न्यायाधीश मोहम्मद रजा ने क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल ,अशफाक उल्ला खां ,राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को भारतीय दंड सहिंता  की धारा  १२१(ए) व १२०(बी) के तहत ५-५  वर्ष की बामशक्कत कैद और धारा ३०२ व ३९६ के अनुसार फाँसी की सजा सुनाई  थी ,पर मौत का फरमान सुनकर यह वीर नौजवान खिलखिलाकर हंस पड़े थे.

                  ठाकुर रोशनसिंह  ने ६ दिसम्बर १९२७ को इलाहाबाद स्थित मलाका (नैनी) जेल की काल-कोठरी से अपने एक मित्र को लिखे पत्र में लिखा था: "इस सप्ताह के भीतर ही फाँसी होगी। आप मेरे लिये रंज हरगिज न करें। मेरी मौत खुशी का सबब होगी, यह मौत किसी प्रकार अफसोस के लायक नहीं है,दुनिया की कष्ट भरी यात्रा समाप्त करके मैं अब आराम की जिन्दगी जीने के लिये जा रहा हूँ ,हमारे शास्त्रों में लिखा है कि जो आदमी धर्मयुद्ध में प्राण देता है उसकी वही गति होती है जो जंगल में रहकर तपस्या करने वाले ऋषि मुनियों की।" पत्र समाप्त करने के पश्चात अन्त में उन्होंने अपना यह शेर भी लिखा था-
      
             "जिन्दगी जिन्दा-दिली को जान ऐ रोशन!
              वरना कितने ही यहाँ रोज फना होते हैं।"


          फाँसी से पूर्व रात्रि में ठाकुर रोशनसिंह कुछ घण्टे सकून से सोये ,फिर देर रात से ही ईश्वर-भजन में लीन रहे। प्रात:काल शौचादि से निवृत्त हो यथानियम स्नान ध्यान किया, कुछ देर गीता-पाठ भी किया,फिर पहरेदार से कहा-"चलो " वह हैरत से देखता रह गया कि यह शख्स इन्सान है या देवता . फिर ठाकुर साहब ने अपनी काल-कोठरी को अंतिम बार प्रणाम किया और सीना तानकर गीता हाथ में लेकर निर्विकार भाव से फाँसी घर की ओर चल दिये।वहां जाकर उन्होंने फाँसी के फन्दे को चूमा ,फिर जोर से तीन बार 'वन्दे मातरम्'का उद्घघोष  किया और वेद-मन्त्र - "ओ३म् विश्वानि देव सवितुर दुरितानि परासुव यद भद्रम तन्नासुव" - का जाप करते हुए फन्दे से झूल कर शहीद हो गए।
              मलाका जेल के मुख्यद्वार पर अपार जनसमूह ठाकुर साहब के अन्तिम दर्शन करने एकत्र था, उनका शव जेल से बाहर आते ही आसमान "रोशन सिंह! अमर रहें!!" के नारों से गूँज उठा .विशाल शवयात्रा गंगा यमुना के संगम तट पर जाकर रुकी,जहाँ वैदिक रीति से उनका अन्तिम संस्कार किया गया। फाँसी के बाद ठाकुर साहब के चेहरे पर एक अद्भुत शान्ति दृष्टिगोचर हो रही थी। मूँछें वैसी की वैसी ही थीं ,बल्कि गर्व से कुछ ज्यादा ही तनी हुई लग रहीं थीं । ठाकुर साहब को मरते दम तक बस एक ही मलाल था कि उन्हें फाँसी दे दी गयी, कोई बात नहीं,क्योंकि उन्होंने तो जिन्दगी का सारा सुख भोग लिया,परन्तु बिस्मिल,अशफाक और लाहिडी ने जीवन का एक भी ऐशो-आराम नहीं देखा ,उनको इस बेरहम बरतानिया सरकार ने फाँसी पर क्यों लटका दिया.
                             आज इस ऐतिहासिक घटना के बाद ८७ वर्ष बीत चुके है ,वह मालका जेल जो महान क्रान्तिकारी ठाकुर रोशनसिंह की फांसी की गवाह थी , वर्तमान में स्वरुपरानी संपत अस्पताल में तब्दील हो चुकी है ,जिस बैरेक में शहीद रोशनसिंह कैद रखे गए थे ,वहां अब लोक निर्माण विभाग का स्टोर है ,जहां टूटा फूटा कबाड़ भरा हुआ है ,बैरेक के पास की  पानी की जिन बावड़ियों  में शहीद रोशन सिंह स्नान करते थे, उनकी हालत बेहद दयनीय है ,जिस जगह ठाकुर रोशनसिंह को फांसी हुई थी,वो अब पार्क का हिस्सा है,वहां पर स्मारक के बतौर एक बदरंग मटमैला पत्थर जरुर लगा है, उस  पर कभी ठाकुर साहब का अधोलिखित शेर अंकित था ,पर अब वह पूरी तरह से धूमिल और अपठनीय हो गया  है ,इस पार्क के भीतर ही  एक गन्दा नाला बहता रहता है, चारो ओर कूड़े कचेरे के ढेर से पूरे परिसर की हालत अति दयनीय है। स्मारक के आसपास इतनी गंदगी है, कि वहां एक पल ठहरना मुश्किल है।यह देखकर मन अत्यंत दुखित हो जाता है .दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जिले के थाना सिंधौली के पैना बुजुर्ग गांव में शहीद ठाकुर रोशन सिंह की प्रपौत्री इंदू सिंह को पति की मौत के बाद दबंगों द्वारा जमीन से बेदखल कर सरेआम मारपीट कर प्रताड़ित किया जा रहा है,उसका घर जलाकर राख कर दिया गया,आज वह भीषण गरीबी में नरेगा में मजदूरी करके बच्चों सहित खुले आसमान के नीचे रह रही है, पर कोई उनकी सुध लेने वाला नहीं है.


            यह विडम्बना है कि अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के  शहादत स्थल में बदहाली और उपेझा का सन्नाटा छाया हुआ है और उनके वंशज इंसाफ पाने के लिए दर दर  भटक रहे है। इस अमर शहीद के अंतिम निशाँनों की इस दुर्दशा पर हम सब बेहद शर्मिंदा है। इसके लिए सरकारे,नेता  और अफसर तो जिम्मेदार है ही ,पर यह भी कटुसत्य है कि स्वाधीन भारत के वाशिंदों ने भी देश के इन सपूतों को भूला देने में कोई कसर बाकी नहीं  रखी है। शायद स्वर्ग में बैठी शहीदों की आत्मा भी इस बदहाली पर आंसू बहा रही होगी। 

                                  -विकास गोयल 
                                  मोब.न.09416506058 

Bharat mei Angerji Raj aur Pandit Sundar Lal

 ''भारत में अंग्रेजी राज'' के रचियता प.सुन्दरलाल                                                                                


                                            


             भारत की स्वतन्त्रता का श्रेय उन साहसी लेखकोंकवियों को भी है, जिन्होंने अपनी ओजस्वी वाणी और प्रखर लेखनी से विदेशी दासता से आक्रान्त देशवासियों के हृदय में अंग्रेज़ी शासन से मुक्ति की अलख जगाई और प्राणों की परवाह न करते हुए भी स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये निरन्तर संघर्ष करने का जज्बा जागृत किया। ऐसे ही एक लेखक थे पंडित सुन्दर लाल, जिनकी पुस्तक 'भारत में अंग्रेजी राज' ने सत्याग्रह या बम-गोली द्वारा अंग्रेजों से लड़ने वालों को प्रेरणा देते हुए सत्य इतिहास की रचना की थी  ,वास्तव में यह पुस्तक भारतीय स्वाधीनता का गौरव ग्रन्थ है  

            सन 1857 के स्वाधीनता संग्राम के दमन के उपरांत अंग्रेजों ने योजनाबद्ध रूप से हिन्दू और मुस्लिमों में मतभेद उत्पन्न किये और 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत बंगाल का विभाजन कर दिया। , इतिहास के विद्वान पण्डित सुन्दरलाल ने इस विद्वेष की जड़ तक पहुंचने का प्रयास किया। जब वह  उच्चाध्ययन के लिए इंग्लैंड गये , तब  ब्रिटिश पुस्तकालयों में संग्रहीत भारत में ब्रिटिश राज से विभिन्न प्रामाणिक  दस्तावेजों तथा इतिहास का गहन अध्ययन किया। उनके सामने अनेक रहस्य खुलते चले गये, जिसने उनके भीतर के विद्रोही को जाग्रत कर दिया ,  इसके बाद वे तीन साल तक क्रान्तिकारी बाबू नित्यानन्द चटर्जी के घर पर शान्त भाव से पुस्तक के काम में जुटे रहे। इस पुस्तक को पण्डित सुन्दर लाल जी के बोलने पर  प्रयाग के श्री विशम्भर पाण्डे ने लिखा था , इसी साधना के फलस्वरूप एक हजार पृष्ठों का 'भारत में अंग्रेजी राज'  नामक ग्रन्थ तैयार हुआ , पर  इसकी पाण्डुलिपि का प्रकाशन आसान नहीं था। सुन्दरलाल जी जानते थे कि प्रकाशित होते ही ब्रिटिश हूकुमत इसे जब्त कर लेगी । अत: उन्होंने इसे कई खण्डों में बांटकर विभिन्न शहरों में छपवाया। उन खण्डों को प्रयाग में जोड़ा गया और अन्तत: 18 मार्च, 1928 को यह पुस्तक प्रकाशित हो गयी। 

           पहला संस्करण २०००प्रतियों का था। १७०० प्रतियां तीन दिन के अन्दर ही ग्राहकों तक पहुंचा दी गयीं। शेष ३०० प्रतियां डाक या रेल द्वारा  जा रहीं थींपर इसी बीच अंग्रेजी हुकूमत की मुखालफत वाली इस पुस्तक को  २२  मार्च को प्रतिबन्धित घोषित कर इन्हें जब्त कर लिया। जो १७००  पुस्तक वितरित हो चुकीं थीं, उन्हें भी ढूंढने का असफल प्रयास किया गया, पर तमाम विरोध के बावजूद पुस्तक आज़ादी के मतवालों के बीच आयी और लोकप्रियता के शिखर तक पहुंची। जवाहर लाल नेहरू से लेकर महात्मा गांधी तक ने पं. सुंदरलाल की इस कृति की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। गांधीजी ने अपने पत्र 'यंग इण्डिया' में लिखे लेख में लोगों को सलाह दी थी कि वे कानून तोड़ कर भी इस पुस्तक के अंश को छापें और इसका वितरण करे .


             दूसरी ओर प. सुन्दरलाल जी प्रतिबन्ध के विरुद्ध न्यायालय में चले गये।  उनके वकील तेजबहादुर सप्रू ने यह तर्क दिया कि इसमें एक भी तथ्य असत्य नहीं है। तब सरकारी वकील ने यह कहा था कि, ‘यह इसीलिए तो  अधिक खतरनाक है। सुन्दरलाल जी ने संयुक्त प्रान्त की सरकार को पत्र लिखा। शुरू में तो गर्वनर राजी नहीं हुए; पर मुख्यमंत्री श्री जी. बी. पन्त के प्रयासों से 15 नबम्वर 1937 को उन्होंने प्रतिबन्ध हटा लिया, फिर अन्य प्रान्तों में भी प्रतिबन्ध हट गया।  चर्चित पुस्तक होने के कारण अब नये संस्करण को कई लोग इसे छापना चाहते थे; पर सुन्दरलाल जी ने कहा कि वे इसे वहीं छपवायेंगे, जहां से यह कम दाम में छप सके। सन १९३८ में ओंकार प्रेस  प्रयाग ने इसे केवल सात रुपए मूल्य में छापा। इस संस्करण के छपने से पहले ही १०,००० प्रतियों के आदेश मिल गये थे। मेरे बाबा श्री मोतीलाल वर्मा स्वाधीनता संग्राम सेनानी इस ग्रन्थ को स्वतंत्रता  आन्दोलन की गीता मानते थे , उनसे ही मुझे  इस दूसरे संस्करण की तीनो जिल्द प्राप्त हुई थी , जो आज भी मेरे पास मौजूद है                                 
        प. सुंदर लाल ने अपनी इतिहास प्रसिद्ध पुस्तक भारत में अंग्रेजी राजमें यह लिखा है कि मुसलमानों के आने से ठीक पहले पंजाब से दक्षिण तक और बंगाल से अरब सागर तक करीब -करीब सारा देश अलग -अलग राजपूत सरदारों के शासन में आ गया। किंतु कोई प्रधान केंद्रीय शक्ति इन सब छोटी -बड़ी रियासतों को एक सूत्र में बांधने वाली न थी। आए दिन इन तमाम रियासतों के बीच अपना- अपना राज बढ़ाने के लिए एक दूसरे से संग्राम होते रहते थे।देश की राजनैतिक और राष्ट्रीय एकता स्वप्न मात्र थी। पंडित सुंदर लाल ने अंग्रेजी राज के विवरण से पहले यहां इस्लाम और मुस्लिम हमलावरों और उनके अच्छे -बुरे पहलुओं का भी ब्यौरा  दिया है।आज के भारत में जिस तरह राष्ट्रीय मसलों पर भी यहां तक कि इस देश के खिलाफ जारी छद्म युद्ध पर भी यहां के विभिन्न नेताओं व शासकों में जिस तरह अनेकता दिखाई पड़ रही है,उसी तरह के हालात का विवरण भी सुंदरलाल की पुस्तक में है। उन्होंने लिखा है कि मुसलमानों की हुकूमत कायम होने से ठीक पहले पंजाब से दक्षिण तक और बंगाल से अरब सागर तक करीब -करीब सारा देश अलग -अलग राजपूत सरदारों के शासन में आ गया। किंतु कोई प्रधान केंद्रीय शक्ति इन सब छोटी -बड़ी रियासतों को एक सूत्र में बांधने वाली न थी। आए दिन इन तमाम रियासतों के बीच अपना- अपना राज बढ़ाने के लिए एक दूसरे से संग्राम होते रहते थे।देश की राजनैतिक और राष्ट्रीय एकता स्वप्न मात्र थी। 'भारत में अंग्रेजी राज' में अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर द्वारा 8 जून 1857 जारी एलान का उद्धरण मिलता है जिसमें भारतीयों का आह्वान करते हुए कहा गया है- हिंदुस्तान के हिंदुओं और मुसलमानों उठो. भाइयों, उठो! खुदा ने जितनी बरकतें इनसान को अता की हैं, उनमें सबसे कीमती बरकत 'आजादी' है. क्या वह जालिम नाकस, जिसने धोखा दे - देकर यह बरकत हमसे छीन ली है, हमेशा के लिए हमें उससे महरूम रख सकेगा? ...नहीं,  नहीं. फिरंगियों ने इतने जुल्म किए हैं कि उनके गुनाहों का प्याला लबरेज हो चुका है'

           इस किताब के दो खंडों में सन १६६१ ई. से लेकर १८५७  ई. तक के भारत का इतिहास संकलित है. यह अंग्रेजों की कूटनीति और काले कारनामों का खुला दस्तावेज है, जिसकी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए लेखक ने अंग्रेज अधिकारियों के स्वयं के लिखे डायरी के पन्नों का शब्दश: उद्धरण दिया है. 
         
                पं. सुंदरलाल का जन्म मुजफ्फरनगर जिले की गावं खतौली के कायस्थ परिवार में २६ सितम्बर सन १८८५  को तोताराम के घर में हुआ था । बचपन से ही देश को पराधीनता की बेड़ियों में जकड़े देखकर  उनके दिल में देश को आजादी दिलाने का जज्बा पैदा हुआ। वह कम आयु में ही परिवार को छोड़ प्रयाग चले गए  और  प्रयाग को कार्यस्थली बनाकर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। पं.सुंदरलाल स्वयं एक सशस्त्र क्रांतिकारी के रुप में गदर पार्टी से बनारस में संबद्ध हुए थे।लाला लाजपत रॉय, अरविन्द घोष , लोकमान्य तिलक के निकट संपर्क उनका हौंसला बढ़ता गया और  कलम से माध्यम से देशवासियों को आजाद भारत के सपने को साकार करने की हिम्मत दी, उनकी प्रखर लेखनी ने १९१४-१५ में भारत की सरजमीं पर गदर पार्टी के सशस्त्र क्रांति के प्रयास और भारत की आजादी के लिए गदर पार्टी के क्रांतिकारियों के अनुपम बलिदानों का सजीव वर्णन किया है। लाला हरदयाल के साथ पं.सुंदरलाल ने समस्त उत्तर भारत का दौरा किया था। १९१४ में शचींद्रनाथ सान्याल और पं.सुंदरलाल एक बम परीक्षण में गंभीर रुप से जख्मी हुए थे। वह लार्ड कर्जन की सभा में बम कांड करने वालों में पंडित सोमेश्वरानंद बनकर शामिल हुए थे , सन १९२१ से १९४२ के दौरान वह गाँधी जी के सत्याग्रह में भाग लेकर ८ बार जेल गए

              पंडित सुंदरलाल पत्रकार, साहित्यकार, स्तंभकार के साथ ही साथ स्वतंत्रता सेनानी थे, वह  कर्मयोगी एवं स्वराज्य हिंदी साप्ताहिक पत्र के संपादक भी रहे, उन्होंने ५० से अधिक  पुस्तकों की रचना की    प्रख्यात क्रांतिकारी गणेश शंकर विद्यार्थी पं. सुंदरलाल के प्रमुख शिष्यों में एक  थे , पंडितजी ने ही गणेश शंकर को 'विद्यार्थी' की उपाधि से नवाजा था ।  स्वाधीनता उपरांत उन्होंने अपना जीवन सांप्रदायिक सदभाव को समर्पित कर दिया , वह अखिल भारतीय शांति परिषद् के अध्यक्ष एवं भारत चीन मैत्री  संघ के संस्थापक भी रहे, प्रधानमंत्री प. जवाहरलाल नेहरु ने उन्हें अनेक बार शांति मिशनो में विदेश भेजा, पंडित सुन्दरलाल  ने ९५ साल की आयु में 9 मई १९८१ को  दुनिया को  अलविदा कह दिया, लेकिन आज भी उनकी यह अमर कृति नयी पीढीयों का मार्गदर्शन कर रही हैं।

                                                    -अनिल वर्मा