क्रान्तिमूर्ति दुर्गाभाभी की जन्मस्थली शहजादपुर

                       

                                                                                           -अनिल वर्मा एवं हेत सिंह 

                                                            अपने जीवन को समिधा की भांति होम करके स्वाधीनता यज्ञ की पावन अग्नि को सदा प्रज्वलित करने वाली  क्रान्तिमूर्ति दुर्गा भाभी वास्तव में देश की आज़ादी की नींव के चन्द पत्थरों में से एक है .वह आज़ादी के लिए क्रांति के पथ पर चलने  वाली प्रथम भारतीय नारी थी,उन्होंने शौर्य और जीवटता के साथ क्रान्तिकारी आन्दोलन मे  सक्रिय योगदान दिया था .धन्य है,उत्तरप्रदेश के कौशाम्बी जिला के सिराथू तहसील के गाँव शहजादपुर की धरती,जिसने इस महान वीरांगना को जन्म दिया था . 

                            भगतसिंह, सुखदेव , आजाद आदि   प्रखर क्रांतिकारियों  की अनन्य साथी दुर्गा देवी बोहरा का जन्म ७ अक्टूबर १९०७ को शाहज़ादपुर में हुआ था , उनके पिता बांकेबिहारी भट्ट इलाहाबाद  कलेक्ट्रेट में  नाज़िर थे ,जब वह केवल १० माह की थी , तभी उनकी माता यमुना की मृत्यु हो गयी ,पिता ने दूसरा विवाह कर लिया , सौतेली माँ ने  प्रताड़ित करके कर तीसरी कक्षामें ही उनकी पदाई छुड़ा दी थी , पिता को भी वैराग्य की धुन लग गयी थी ,बुआ जी  की  सख्त संरक्षकता में शहजादपुर और गंगा नदी के किनारे  करेहटी की कुटी में उनका बचपन बीता था  ,महज 11 वर्ष की अल्पायु में ही सन १९१७-१८ में भगवती शरण बोहरा से उनका विवाह हो गया , वह  प्रखर  देशभक्त थे , उनके साथ ने दुर्गा देवी के मन में भी राष्ट्रप्रेम और  देश की आज़ादी के लिए संघर्ष करने की अलख  जगा दी थी .हालाँकि उनके ससुर अंग्रेजपरस्त थे , जब उन्हें ब्रिटिश हूकुमत रायबहादुर का ख़िताब से विभूषित करने  जा रही थी ,तब इसके विरोध में भगवतीचरण और दुर्गा देवी ने उनका घर त्याग  दिया ,फिर दुर्गा देवी ने पति की प्रेरणा से अपनी अधूरी  पढाई  पूरी की और  नेशनल कॉलेज लाहौर से प्रभाकर की उपाधि ली थी  .

                                                          ससुर की मौत के बाद अंग्रेज सरकार द्वारा प्रताड़ित करने पर दुर्गा देवी अपने पति सहित १७ अगस्त १९२० को शहजादपुर आ गयी थी  ,२ माह तक वह दोनों यहाँ चोरी छिपे क्रांतिकारियों की  मदद करते रहे ,   अपार धन दौलत , एश्वर्य और सुखों को त्याग कर क्रांति के कंटक  से भरे मार्ग पर चलना कठिन तपस्या की भांति था ,दुर्गा   देवी  को ससुर जी से ४० हज़ार रूपये मिले थे ,हालाँकि पिता उनकी क्रांति पथ  के पघधर  नहीं थे , फिर भी उन्होंने दुर्गा के लिए ५ हज़ार रूपये श्री बटुक नाथ अग्रवाल के पास रखवा दिए थे , बाद में यह सम्पूर्ण राशि क्रान्तिकारी गतिविधियों के संचालन में  काफी काम आयी थी  .  

                    दुर्गा भाभी ने अपने पति भगवतीचरण बोहरा  साथ मिलकर अंग्रेजो के खिलाफ  सशस्त्र  क्रान्तिकारी  गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लिया  , उन्होंने भगत सिंह , सुखदेव , राजगुरु , आजाद और यशपाल के साथ कन्धा से कन्धा  मिलाकर  आज़ादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी  , सभी क्रान्तिकारी साथी उन्हें आदर से ''भाभी ''  कहते थे , उनके पति भगवती शरण ने भगतसिंह के साथ मिलकर क्रान्तिकारी दल हिन्दुस्तानी रिपब्लिक आर्मी का गठन किया था , लाहौर में रावी के तट के किनारे बम विस्फोट में पति की शहादत के सदमे को भी उन्होंने अदम्य  धैर्य एवं हौसले  से झेला था और अपने वैधव्य के दर्द को भुला कर अपना जीवन दल और देश के लिए समर्पित कर दिया था . क्रान्तिकारी दल द्वारा अंग्रेज पुलिस कप्तान सांडर्स के वध उपरांत उन्होंने भगत सिंह और उनके साथियों को पुलिस लाहौर के चप्पे चप्पे में शिकारी कुत्तों की तरह तलाश कर रही थी , तब दुर्गा भाभी ने  अफसर के वेशधारी भगत सिंह की पत्नी बनकर   मेमसाहब के रूप धारण कर के  अपने छोटे से बच्चे शची का जीवन भी खतरे में डालकर उन्हें  ट्रेन से लाहौर से कलकत्ता पहुचने में असीम शौर्य  का परिचय दिया था .उनका दूसरा खास काम लैमिग्टन रोड गोलीकांड को अंजाम देना था ,  9 अक्टूबर १९३० को उन्होंने बम्बई  के गवर्नर हैली को मौत के घाट उतरने के लिए  उसी  बंगले में धुसकर  गोलिया चलायी थी , पर दुर्भाग्य से  हैली तो बच गया , परन्तु एक अग्रेज अफसर और  महिला को गोली लगी थी .

                                           सन १९३१ में भगतसिंह , राजगुरु और सुखदेव फांसी पर चढकर शहीद हो गए , आजाद सहित सभी प्रमुख क्रान्तिकारी   शहीद हो गए थे अथवा पकड़ जा चुके  थे , क्रान्तिकारी दल छिन्नं भिन्न हो गया , गहन हताशा का दौर था फिर भी दुर्गा भाभी क्रान्तिकारी  बुलंद हौसले के साथ आन्दोलन को आगे बढ़ने में जुटी रही , अंततः वह भी पकड़ी गयी और जेल  गयी , जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने कुछ दिनों तक दिल्ली में कांग्रेस के साथ काम किया , फिर उन्होंने सन १९३९ में लखनऊ के पुराना किला इलाके में एक मांटेसरी स्कूल की स्थापना की और इसके बाद उन्होंने  अपना संपूर्ण जीवन  बच्चो की  शिक्षा और समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया , बाद में उन्होंने यही पर क्रान्तिकारी शिव वर्मा के साथ मिलकर शहीद स्मारक और स्वतंत्रता संग्राम शोध संस्थान की स्थापना की थी और बाद में अपनी पूरी सम्पति संस्थान को समर्पित करके उनके इकलौते बेटे शचि के पास गाज़ियाबाद चली गयी , वही पर १४  अक्टूबर  १९९९ को दुर्गा भाभी ने दुनिया को अलविदा कर दिया था .

                                 दुर्गा भाभी का शादी के बाद शहजादपुर आना जाना लगा रहता था , वह सन १९४२ में पिता की मृत्यु के बाद यहाँ आई थी , फिर उनका शहजादपुर आना संभव न हो सका , मेरे आदरणीय बुजुर्ग शुभचिंतक   श्री हेतसिंह जी  के भीतर ८० वर्ष की आयु  में  आज भी राष्ट्रप्रेम का  वही अनूठा जज्बा है , जो स्वाधीनता के पूर्व युवावस्था में था , देशभक्तों  और क्रांतिकारियों की  उपेक्षा से उनका मन  बहुत व्यथित रहता है . वह स्वयं गत १ अप्रैल २०१४  को शहजादपुर गए थे और दुर्गा भाभी के चचेरे भतीजे श्री उदयशंकर भट्ट से मिले थे , उदय जी ने उन्हें यह  बताया कि उनके पूर्वज करीब ३५० वर्ष पूर्व गुजरात से यहाँ आकर बस गए  थे , कालांतर में यहाँ उनके पूर्वजो की जमींदारी कायम हो गयी थी ,  दुर्गा भाभी और भगवती शरण जी के क्रान्तिकारी हो जाने से अंग्रेजो ने उनके परिवार की  सारी संपत्ति कुर्क कर हडप ली थी , पर उन्हें अपने परिवार के इस महान वीरांगना पर गर्व है . 

                                      स्वाधीनता उपरांत  महान क्रान्तिकारी दुर्गा भाभी ने देश के लिए  अपनी महान सेवाओं के लिए कोई प्रतिफल नहीं चाहा , उनसे कम उपलब्धि हासिल करने वाली एक महिला क्रान्तिकारी   सरकार  ने भारत रत्न से नवाजा , जबकि भाभी  पूर्णता गुमनामी के अँधेरे में खोयी रही  . यह विडम्बना है कि अपनी ही सरजमीं  पर भी  दुर्गा भाभी आज तक यथोचित सम्मान से वंचित है ,  राजनेताओं द्वारा अनेक बार घोषणायें करने के बावजूद शाहजादपुर में दुर्गा  भाभी का आज तक कोई राष्ट्रीय स्मारक नहीं बन सका  है,  शहजादपुर में जिस ऐतिहासिक घर में दुर्गा भाभी का जन्म हुआ था ,उसकी  पावंन भूमि हर देशभक्त के लिए एक तीर्थ की भांति नमन किये जाने योग्य  पवित्र स्थल   है , पर आज भी वह मकान  जीर्णशीर्ण हालत में  पड़ा हुआ है , दुर्गा भाभी के  नाम का सहारा लेकर राजनीति की वैतरणी पार करने वाले नेताओ द्वारा  उनकी  कोई सुध न लिया बेहद शर्मनाक है ,आज यह स्थिति शहजादपुर की ही नहीं वरन पूरे देश की है , क्रांतिकारियों और स्वाधीनता संग्राम सेनानियों से जुड़े अधिकांश  ऐतिहासिक स्थल उपेक्षा के शिकार हो रहे  है . उनका अस्तित्व ही मिटने की कगार पर है , आगामी   पीढ़ियों के लिए  देश की आज़ादी के इतिहास की इस बेशकीमती विरासत को  संजोने की किसी को कोई फिक्र नहीं है .निसंदेह स्वाधीनता के उपरांत हम आर्थिक और भौतिक रूप से विकास  की बुलंदियों तक पहुँच रहे है, पर यह भी कटुसत्य  है कि स्वाधीन भारत के वाशिंदों  ने अपनी नीवं के उन पत्थरों को भुला दिया है , जिन पर तरक्की की यह बुलंद इमारते खड़ी  है .

                                   '' जिनकी लाशो पर चलकर यह आज़ादी आई है 
                                       उनकी याद बहुत ही गहरी लोगो ने दफनाई है .''

                                                                                                - अनिल वर्मा (मो. न. 09425181793   )
                                                                                                - हेत सिंह    (मो. न. 07275020220 )  
  
( निवेदन -  कृपया पाठक गण लेख पर टीप लिखकर अपने विचारों से अवगत करने का कष्ट करे )

    

                                                          
                           
दुर्गा भाभी का जन्मस्थल 

दुर्गा भाभी का मकान







Amar Shaheed Thakur Roshan Singh


           ठाकुर रोशनसिंह : उपेक्षित है अंतिम निशाँ

 

                       ‘’ शहीदों की चिताओ पर लगेंगे हर बरस मेले,
                              वतन पर मरने वाले का यही बाकि निशाँ होगा‘’

         
रोशन सिंह का फांसी स्थल



बावड़ी , जहाँ रोशन सिंह  स्नान करते थे
रोशन सिंह की बैरेक


                                                                     आज के दौर में यह शेर पूर्णतः बेमानी हो चुका है ,मुल्क की आज़ादी के लिए मर मिटने वाले अमरशहीदों को भुला दिया गया है,शहीदों के विचारों, संदेशों ,उनके बलिदान की अनुपम गाथाएं भी बिसरा दी गयी है ,अधिकांश शहीदों के जन्मस्थल एवं शहादत स्थल और उनसे जुड़े स्मारक बदहाली और गुमनामी के अंधेरों में खो गए है.यही अंजाम ऐतिहांसिक काकोरी कांड मे शहीद होने वाले क्रान्तिकारी ठाकुर रोशन सिंह का शहादत स्थल का भी हुआ है.

          
          9 अगस्त, 1925 को लखनऊ के निकट काकोरी में रेल का सरकारी खजाना लूटकर ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने वाले काकोरी कांड और बमरौली डकैती कांड में २२ अगस्त १९२७ को लखनऊ की चीफ कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश लुइस शर्ट और विशेष न्यायाधीश मोहम्मद रजा ने क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल ,अशफाक उल्ला खां ,राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को भारतीय दंड सहिंता  की धारा  १२१(ए) व १२०(बी) के तहत ५-५  वर्ष की बामशक्कत कैद और धारा ३०२ व ३९६ के अनुसार फाँसी की सजा सुनाई  थी ,पर मौत का फरमान सुनकर यह वीर नौजवान खिलखिलाकर हंस पड़े थे.

                  ठाकुर रोशनसिंह  ने ६ दिसम्बर १९२७ को इलाहाबाद स्थित मलाका (नैनी) जेल की काल-कोठरी से अपने एक मित्र को लिखे पत्र में लिखा था: "इस सप्ताह के भीतर ही फाँसी होगी। आप मेरे लिये रंज हरगिज न करें। मेरी मौत खुशी का सबब होगी, यह मौत किसी प्रकार अफसोस के लायक नहीं है,दुनिया की कष्ट भरी यात्रा समाप्त करके मैं अब आराम की जिन्दगी जीने के लिये जा रहा हूँ ,हमारे शास्त्रों में लिखा है कि जो आदमी धर्मयुद्ध में प्राण देता है उसकी वही गति होती है जो जंगल में रहकर तपस्या करने वाले ऋषि मुनियों की।" पत्र समाप्त करने के पश्चात अन्त में उन्होंने अपना यह शेर भी लिखा था-
      
             "जिन्दगी जिन्दा-दिली को जान ऐ रोशन!
              वरना कितने ही यहाँ रोज फना होते हैं।"


          फाँसी से पूर्व रात्रि में ठाकुर रोशनसिंह कुछ घण्टे सकून से सोये ,फिर देर रात से ही ईश्वर-भजन में लीन रहे। प्रात:काल शौचादि से निवृत्त हो यथानियम स्नान ध्यान किया, कुछ देर गीता-पाठ भी किया,फिर पहरेदार से कहा-"चलो " वह हैरत से देखता रह गया कि यह शख्स इन्सान है या देवता . फिर ठाकुर साहब ने अपनी काल-कोठरी को अंतिम बार प्रणाम किया और सीना तानकर गीता हाथ में लेकर निर्विकार भाव से फाँसी घर की ओर चल दिये।वहां जाकर उन्होंने फाँसी के फन्दे को चूमा ,फिर जोर से तीन बार 'वन्दे मातरम्'का उद्घघोष  किया और वेद-मन्त्र - "ओ३म् विश्वानि देव सवितुर दुरितानि परासुव यद भद्रम तन्नासुव" - का जाप करते हुए फन्दे से झूल कर शहीद हो गए।
              मलाका जेल के मुख्यद्वार पर अपार जनसमूह ठाकुर साहब के अन्तिम दर्शन करने एकत्र था, उनका शव जेल से बाहर आते ही आसमान "रोशन सिंह! अमर रहें!!" के नारों से गूँज उठा .विशाल शवयात्रा गंगा यमुना के संगम तट पर जाकर रुकी,जहाँ वैदिक रीति से उनका अन्तिम संस्कार किया गया। फाँसी के बाद ठाकुर साहब के चेहरे पर एक अद्भुत शान्ति दृष्टिगोचर हो रही थी। मूँछें वैसी की वैसी ही थीं ,बल्कि गर्व से कुछ ज्यादा ही तनी हुई लग रहीं थीं । ठाकुर साहब को मरते दम तक बस एक ही मलाल था कि उन्हें फाँसी दे दी गयी, कोई बात नहीं,क्योंकि उन्होंने तो जिन्दगी का सारा सुख भोग लिया,परन्तु बिस्मिल,अशफाक और लाहिडी ने जीवन का एक भी ऐशो-आराम नहीं देखा ,उनको इस बेरहम बरतानिया सरकार ने फाँसी पर क्यों लटका दिया.
                             आज इस ऐतिहासिक घटना के बाद ८७ वर्ष बीत चुके है ,वह मालका जेल जो महान क्रान्तिकारी ठाकुर रोशनसिंह की फांसी की गवाह थी , वर्तमान में स्वरुपरानी संपत अस्पताल में तब्दील हो चुकी है ,जिस बैरेक में शहीद रोशनसिंह कैद रखे गए थे ,वहां अब लोक निर्माण विभाग का स्टोर है ,जहां टूटा फूटा कबाड़ भरा हुआ है ,बैरेक के पास की  पानी की जिन बावड़ियों  में शहीद रोशन सिंह स्नान करते थे, उनकी हालत बेहद दयनीय है ,जिस जगह ठाकुर रोशनसिंह को फांसी हुई थी,वो अब पार्क का हिस्सा है,वहां पर स्मारक के बतौर एक बदरंग मटमैला पत्थर जरुर लगा है, उस  पर कभी ठाकुर साहब का अधोलिखित शेर अंकित था ,पर अब वह पूरी तरह से धूमिल और अपठनीय हो गया  है ,इस पार्क के भीतर ही  एक गन्दा नाला बहता रहता है, चारो ओर कूड़े कचेरे के ढेर से पूरे परिसर की हालत अति दयनीय है। स्मारक के आसपास इतनी गंदगी है, कि वहां एक पल ठहरना मुश्किल है।यह देखकर मन अत्यंत दुखित हो जाता है .दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जिले के थाना सिंधौली के पैना बुजुर्ग गांव में शहीद ठाकुर रोशन सिंह की प्रपौत्री इंदू सिंह को पति की मौत के बाद दबंगों द्वारा जमीन से बेदखल कर सरेआम मारपीट कर प्रताड़ित किया जा रहा है,उसका घर जलाकर राख कर दिया गया,आज वह भीषण गरीबी में नरेगा में मजदूरी करके बच्चों सहित खुले आसमान के नीचे रह रही है, पर कोई उनकी सुध लेने वाला नहीं है.


            यह विडम्बना है कि अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के  शहादत स्थल में बदहाली और उपेझा का सन्नाटा छाया हुआ है और उनके वंशज इंसाफ पाने के लिए दर दर  भटक रहे है। इस अमर शहीद के अंतिम निशाँनों की इस दुर्दशा पर हम सब बेहद शर्मिंदा है। इसके लिए सरकारे,नेता  और अफसर तो जिम्मेदार है ही ,पर यह भी कटुसत्य है कि स्वाधीन भारत के वाशिंदों ने भी देश के इन सपूतों को भूला देने में कोई कसर बाकी नहीं  रखी है। शायद स्वर्ग में बैठी शहीदों की आत्मा भी इस बदहाली पर आंसू बहा रही होगी। 

                                  -विकास गोयल 
                                  मोब.न.09416506058 

Bharat mei Angerji Raj aur Pandit Sundar Lal

 ''भारत में अंग्रेजी राज'' के रचियता प.सुन्दरलाल                                                                                


                                            


             भारत की स्वतन्त्रता का श्रेय उन साहसी लेखकोंकवियों को भी है, जिन्होंने अपनी ओजस्वी वाणी और प्रखर लेखनी से विदेशी दासता से आक्रान्त देशवासियों के हृदय में अंग्रेज़ी शासन से मुक्ति की अलख जगाई और प्राणों की परवाह न करते हुए भी स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये निरन्तर संघर्ष करने का जज्बा जागृत किया। ऐसे ही एक लेखक थे पंडित सुन्दर लाल, जिनकी पुस्तक 'भारत में अंग्रेजी राज' ने सत्याग्रह या बम-गोली द्वारा अंग्रेजों से लड़ने वालों को प्रेरणा देते हुए सत्य इतिहास की रचना की थी  ,वास्तव में यह पुस्तक भारतीय स्वाधीनता का गौरव ग्रन्थ है  

            सन 1857 के स्वाधीनता संग्राम के दमन के उपरांत अंग्रेजों ने योजनाबद्ध रूप से हिन्दू और मुस्लिमों में मतभेद उत्पन्न किये और 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत बंगाल का विभाजन कर दिया। , इतिहास के विद्वान पण्डित सुन्दरलाल ने इस विद्वेष की जड़ तक पहुंचने का प्रयास किया। जब वह  उच्चाध्ययन के लिए इंग्लैंड गये , तब  ब्रिटिश पुस्तकालयों में संग्रहीत भारत में ब्रिटिश राज से विभिन्न प्रामाणिक  दस्तावेजों तथा इतिहास का गहन अध्ययन किया। उनके सामने अनेक रहस्य खुलते चले गये, जिसने उनके भीतर के विद्रोही को जाग्रत कर दिया ,  इसके बाद वे तीन साल तक क्रान्तिकारी बाबू नित्यानन्द चटर्जी के घर पर शान्त भाव से पुस्तक के काम में जुटे रहे। इस पुस्तक को पण्डित सुन्दर लाल जी के बोलने पर  प्रयाग के श्री विशम्भर पाण्डे ने लिखा था , इसी साधना के फलस्वरूप एक हजार पृष्ठों का 'भारत में अंग्रेजी राज'  नामक ग्रन्थ तैयार हुआ , पर  इसकी पाण्डुलिपि का प्रकाशन आसान नहीं था। सुन्दरलाल जी जानते थे कि प्रकाशित होते ही ब्रिटिश हूकुमत इसे जब्त कर लेगी । अत: उन्होंने इसे कई खण्डों में बांटकर विभिन्न शहरों में छपवाया। उन खण्डों को प्रयाग में जोड़ा गया और अन्तत: 18 मार्च, 1928 को यह पुस्तक प्रकाशित हो गयी। 

           पहला संस्करण २०००प्रतियों का था। १७०० प्रतियां तीन दिन के अन्दर ही ग्राहकों तक पहुंचा दी गयीं। शेष ३०० प्रतियां डाक या रेल द्वारा  जा रहीं थींपर इसी बीच अंग्रेजी हुकूमत की मुखालफत वाली इस पुस्तक को  २२  मार्च को प्रतिबन्धित घोषित कर इन्हें जब्त कर लिया। जो १७००  पुस्तक वितरित हो चुकीं थीं, उन्हें भी ढूंढने का असफल प्रयास किया गया, पर तमाम विरोध के बावजूद पुस्तक आज़ादी के मतवालों के बीच आयी और लोकप्रियता के शिखर तक पहुंची। जवाहर लाल नेहरू से लेकर महात्मा गांधी तक ने पं. सुंदरलाल की इस कृति की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। गांधीजी ने अपने पत्र 'यंग इण्डिया' में लिखे लेख में लोगों को सलाह दी थी कि वे कानून तोड़ कर भी इस पुस्तक के अंश को छापें और इसका वितरण करे .


             दूसरी ओर प. सुन्दरलाल जी प्रतिबन्ध के विरुद्ध न्यायालय में चले गये।  उनके वकील तेजबहादुर सप्रू ने यह तर्क दिया कि इसमें एक भी तथ्य असत्य नहीं है। तब सरकारी वकील ने यह कहा था कि, ‘यह इसीलिए तो  अधिक खतरनाक है। सुन्दरलाल जी ने संयुक्त प्रान्त की सरकार को पत्र लिखा। शुरू में तो गर्वनर राजी नहीं हुए; पर मुख्यमंत्री श्री जी. बी. पन्त के प्रयासों से 15 नबम्वर 1937 को उन्होंने प्रतिबन्ध हटा लिया, फिर अन्य प्रान्तों में भी प्रतिबन्ध हट गया।  चर्चित पुस्तक होने के कारण अब नये संस्करण को कई लोग इसे छापना चाहते थे; पर सुन्दरलाल जी ने कहा कि वे इसे वहीं छपवायेंगे, जहां से यह कम दाम में छप सके। सन १९३८ में ओंकार प्रेस  प्रयाग ने इसे केवल सात रुपए मूल्य में छापा। इस संस्करण के छपने से पहले ही १०,००० प्रतियों के आदेश मिल गये थे। मेरे बाबा श्री मोतीलाल वर्मा स्वाधीनता संग्राम सेनानी इस ग्रन्थ को स्वतंत्रता  आन्दोलन की गीता मानते थे , उनसे ही मुझे  इस दूसरे संस्करण की तीनो जिल्द प्राप्त हुई थी , जो आज भी मेरे पास मौजूद है                                 
        प. सुंदर लाल ने अपनी इतिहास प्रसिद्ध पुस्तक भारत में अंग्रेजी राजमें यह लिखा है कि मुसलमानों के आने से ठीक पहले पंजाब से दक्षिण तक और बंगाल से अरब सागर तक करीब -करीब सारा देश अलग -अलग राजपूत सरदारों के शासन में आ गया। किंतु कोई प्रधान केंद्रीय शक्ति इन सब छोटी -बड़ी रियासतों को एक सूत्र में बांधने वाली न थी। आए दिन इन तमाम रियासतों के बीच अपना- अपना राज बढ़ाने के लिए एक दूसरे से संग्राम होते रहते थे।देश की राजनैतिक और राष्ट्रीय एकता स्वप्न मात्र थी। पंडित सुंदर लाल ने अंग्रेजी राज के विवरण से पहले यहां इस्लाम और मुस्लिम हमलावरों और उनके अच्छे -बुरे पहलुओं का भी ब्यौरा  दिया है।आज के भारत में जिस तरह राष्ट्रीय मसलों पर भी यहां तक कि इस देश के खिलाफ जारी छद्म युद्ध पर भी यहां के विभिन्न नेताओं व शासकों में जिस तरह अनेकता दिखाई पड़ रही है,उसी तरह के हालात का विवरण भी सुंदरलाल की पुस्तक में है। उन्होंने लिखा है कि मुसलमानों की हुकूमत कायम होने से ठीक पहले पंजाब से दक्षिण तक और बंगाल से अरब सागर तक करीब -करीब सारा देश अलग -अलग राजपूत सरदारों के शासन में आ गया। किंतु कोई प्रधान केंद्रीय शक्ति इन सब छोटी -बड़ी रियासतों को एक सूत्र में बांधने वाली न थी। आए दिन इन तमाम रियासतों के बीच अपना- अपना राज बढ़ाने के लिए एक दूसरे से संग्राम होते रहते थे।देश की राजनैतिक और राष्ट्रीय एकता स्वप्न मात्र थी। 'भारत में अंग्रेजी राज' में अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर द्वारा 8 जून 1857 जारी एलान का उद्धरण मिलता है जिसमें भारतीयों का आह्वान करते हुए कहा गया है- हिंदुस्तान के हिंदुओं और मुसलमानों उठो. भाइयों, उठो! खुदा ने जितनी बरकतें इनसान को अता की हैं, उनमें सबसे कीमती बरकत 'आजादी' है. क्या वह जालिम नाकस, जिसने धोखा दे - देकर यह बरकत हमसे छीन ली है, हमेशा के लिए हमें उससे महरूम रख सकेगा? ...नहीं,  नहीं. फिरंगियों ने इतने जुल्म किए हैं कि उनके गुनाहों का प्याला लबरेज हो चुका है'

           इस किताब के दो खंडों में सन १६६१ ई. से लेकर १८५७  ई. तक के भारत का इतिहास संकलित है. यह अंग्रेजों की कूटनीति और काले कारनामों का खुला दस्तावेज है, जिसकी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए लेखक ने अंग्रेज अधिकारियों के स्वयं के लिखे डायरी के पन्नों का शब्दश: उद्धरण दिया है. 
         
                पं. सुंदरलाल का जन्म मुजफ्फरनगर जिले की गावं खतौली के कायस्थ परिवार में २६ सितम्बर सन १८८५  को तोताराम के घर में हुआ था । बचपन से ही देश को पराधीनता की बेड़ियों में जकड़े देखकर  उनके दिल में देश को आजादी दिलाने का जज्बा पैदा हुआ। वह कम आयु में ही परिवार को छोड़ प्रयाग चले गए  और  प्रयाग को कार्यस्थली बनाकर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। पं.सुंदरलाल स्वयं एक सशस्त्र क्रांतिकारी के रुप में गदर पार्टी से बनारस में संबद्ध हुए थे।लाला लाजपत रॉय, अरविन्द घोष , लोकमान्य तिलक के निकट संपर्क उनका हौंसला बढ़ता गया और  कलम से माध्यम से देशवासियों को आजाद भारत के सपने को साकार करने की हिम्मत दी, उनकी प्रखर लेखनी ने १९१४-१५ में भारत की सरजमीं पर गदर पार्टी के सशस्त्र क्रांति के प्रयास और भारत की आजादी के लिए गदर पार्टी के क्रांतिकारियों के अनुपम बलिदानों का सजीव वर्णन किया है। लाला हरदयाल के साथ पं.सुंदरलाल ने समस्त उत्तर भारत का दौरा किया था। १९१४ में शचींद्रनाथ सान्याल और पं.सुंदरलाल एक बम परीक्षण में गंभीर रुप से जख्मी हुए थे। वह लार्ड कर्जन की सभा में बम कांड करने वालों में पंडित सोमेश्वरानंद बनकर शामिल हुए थे , सन १९२१ से १९४२ के दौरान वह गाँधी जी के सत्याग्रह में भाग लेकर ८ बार जेल गए

              पंडित सुंदरलाल पत्रकार, साहित्यकार, स्तंभकार के साथ ही साथ स्वतंत्रता सेनानी थे, वह  कर्मयोगी एवं स्वराज्य हिंदी साप्ताहिक पत्र के संपादक भी रहे, उन्होंने ५० से अधिक  पुस्तकों की रचना की    प्रख्यात क्रांतिकारी गणेश शंकर विद्यार्थी पं. सुंदरलाल के प्रमुख शिष्यों में एक  थे , पंडितजी ने ही गणेश शंकर को 'विद्यार्थी' की उपाधि से नवाजा था ।  स्वाधीनता उपरांत उन्होंने अपना जीवन सांप्रदायिक सदभाव को समर्पित कर दिया , वह अखिल भारतीय शांति परिषद् के अध्यक्ष एवं भारत चीन मैत्री  संघ के संस्थापक भी रहे, प्रधानमंत्री प. जवाहरलाल नेहरु ने उन्हें अनेक बार शांति मिशनो में विदेश भेजा, पंडित सुन्दरलाल  ने ९५ साल की आयु में 9 मई १९८१ को  दुनिया को  अलविदा कह दिया, लेकिन आज भी उनकी यह अमर कृति नयी पीढीयों का मार्गदर्शन कर रही हैं।

                                                    -अनिल वर्मा







Great Lady Revolutionary Susheela Didi

                                 क्रान्तिकारी वीरांगना सुशीला देवी 




                                 भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन  में एक अदद भाभी दुर्गा भाभी और एक अदद दीदी का नाम हजारों सरफरोशों के लिए बलिदान की प्रेरणा बन गया था. भगतसिंह , चन्द्रशेखर आज़ाद , भगवती चरण बोहरा एवं अन्य सभी  क्रांतिकारियों की अनन्य सहयोगी और उनकी प्रिय दीदी  सुशीला दीदी  एक महान वीरांगना थीं .


                                      सुशीला फौज के अवकाश प्राप्त डॉ. करमचंद की पुत्री थीं , उनका जन्म ५ मार्च १९०५ को पंजाब के गुजरात जिले के दन्तोचूहड़ गाँव( अब पाकिस्तान में ) में हुआ था , उनका पूरा परिवार कट्टर आर्यसमाजी और राष्ट्रभक्त था ,सन १९२६ में हिन्दी  साहित्य सम्मेलन  देहरादून जाने पर  उनका परिचय भगवती चरण बोहरा से हुआ था , जो क्रान्तिकारी विचारधारा से ओत पोत थे  , सुशीला पर उनका गहरा प्रभाव पड़ा था और उनके मन में भी देशभक्ति की ज्वाला धधकनें लगी. ८ अप्रैल १९२७  को  जालंधर के कन्या महाविद्यालय में परीक्षा कक्ष में  जब उन्हें यह पता लगा कि काकोरी कांड में क्रांतिवीर  रामप्रसाद बिस्मिल, रोशनसिंह और राजेंद्र लाहिड़ी को फाँसी हो गयी है , तो वह सदमे के कारण बेहोश होकर गिर गयी थी और परीक्षा नहीं दे पाई थी  , उन्होंने इस केस में क्रान्तिकारियो की पैरवी हेतु अपनी शादी के लिए रखा गया १० तोला सोना दान कर दिया था ,सन  १९२७ में क्रान्तिकारी दल '' हिन्दुस्तान प्रजातंत्र संघ '' का सक्रिय सदस्य बनने के बाद उन्होंने पहला काम  जालंधर में गोपनीय पर्चो के वितरण का काम किया था .फिर शिक्षा पूर्ण होने के बाद वह कलकत्ता में सेठ सर छज्जूराम की पुत्री के अध्यापन का काम करने चली गयी . कलकत्ता में साईमन कमीशन के आगमन के विरोध में आन्दोलन में उन्होंने बहुत जोश खरोश से भाग किया था , तब आन्दोलन  का नेतृत्व कर रहे नेताजी सुभाषचन्द बोस ने भी उनकी साहसिक कार्यशैली को  सराहा   था  . लाहौर में सांडर्स के वध के बाद   सरदार भगत सिंह जब दुर्गा भाभी के साथ फरार होकर छद्म वेश में  ट्रेन से कलकत्ता पहुचे थे , तब स्टेशन पर भगवती चरण बोहरा और सुशीला दीदी ने उनका स्वागत किया था , फिर भाभी भगत सिंह को दीदी के संरक्षण में छोड़कर वापस लाहौर चली गयी थी .

                                  सुशीला दीदी और दुर्गा भाभी ने ही  कुदासियापार्क  दिल्ली  में  भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को असेंबली में बम फेकने के लिए  अपने रक्त से तिलक लगा कर अंतिम विदाई दी थी . तुगलकाबाद दिल्ली के पास  वायसराय की  ट्रेन को बम से उडाने  के ऐतिहासिक एक्शन में सुशीला  भी शामिल थी , लाहौर जेल में क्रांतिकारियों पर मुकदमा चल रहा था , जब दीदी का काम था गिरफ्तार साथियों को जेल में खाने  पीने की सामग्री भिजवाना , लाहौर आने वाले उनके परिजनों का ख्याल रखना और मुकदमे के खर्च का प्रबंध करना . दीदी ने इसके लिए  कलकत्ता में '' मेवाड़ पतन '' नाटक खेलकर काफी धन संग्रह किया  था , उन्हीं दिनों जेल में ६३ दिन की लंबी भूख हडताल करके शहीद होने वाले क्रान्तिकारी यतीन्द्र नाथ दास का शव जब लाहौर से कलकत्ता लाया गया  था , तब सुशीला दीदी ने उनकी आरती उतारी थी , जब भगत सिंह और दत्त को लाहौर जेल से छुड़ाने की योजना बनी थी ,  तो सुशीला दीदी कलकत्ता की नौकरी छोड़कर पूरी तरह से दल के काम में जुट गयी थी , उन्होंने कश्मीर बिल्डिंग में सिख लड़के के भेष  में रहकर बम बनाने का काम भी किया , वह बहावलपुरवाली कोठी में अन्य क्रांतिकारियों के साथ ऐसे रहती थी कि वे लोग एक परिवार के सदस्य लगे और किसी को शक न हो , परन्तु जब   कोठी में दुर्घटना वश बम विस्फोट हो गया ,  तो पुलिस से बचने के लिए उन्हें दुर्गा भाभी के साथ गोला बारूद से भरी भारी अटेची उठाकर भागना पड़ा था , तब उन्होंने अपनी सहेली सत्यवती के यहाँ शरण ली थी , बाद में आजाद ने उन्हें दिल्ली भेज दिया था , दिल्ली में भी उन्होंने आजाद और अन्य क्रान्तिकारी साथियों के साथ मिलकर बम फैक्ट्री में काम किया .बाद में आज़ाद ने उन्हें पहले कानपुर भेजा और कुछ दिनों बाद इलाहाबाद भिजवा दिया था  , कुछ दिन तक वह पुरषोत्तम दास टंडन के यहाँ उनकी पुत्री की भांति रही , फिर  चाँद के संचालक श्री रामरख सहगल ने उन्हें और दुर्गा भाभी को '' माता  मंदिर '' के व्यस्थापक का काम सौप दिया था , आजाद के कहने पर वह उनके खिलाफ वारंट होने पर भी जोखिम उठाकर लाहौर जेल में भगतसिंह से मिलने गयी थी , उन्होंने दिल्ली जाकर गाँधी जी से मिलकर भगतसिंह की रिहाई का  प्रयास किया था .

                               सुशीला दीदी १ अक्टूबर १९३१ को लेमिगटन रोड बम्बई में यूरोपियन सार्जेंट टेलर और उनकी पत्नी पर गोली चलाकर फरार हो गयी थी , सन १९३१ में भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु,भगवती चरण बोहरा और  आजाद की शहादत के बाद  सुशीला दीदी ने भारतीय कांग्रेस में शामिल होकर देश की आज़ादी का काम जारी रखा , जबकि उन पर दो- दो  वारंट थे और इनाम भी धोषित था , फिर भी सन १९३२ में उन्होंनें चतुराई का परिचय देते हुए प्रतिबंधित कांग्रेस के दिल्ली अधिवेशन में  ' इंन्दू ' के नाम से एक महिला टोली का नेतृत्व किया था और गिरफ़्तार होने पर जेल में इन्दू के नाम से  ही ६ माह की पूरी सजा काट आई , पर कोई उन्हें पहचान न सका था . 

                                                                   सुशीला जी के फरारी के दिनों में दिल्ली के एक वकील श्याम मोहन ने उन्हें काफी दिनों तक अपने घर में शरण देकर काफी मदद की  थी , अत: पिता ने हर्षपूर्वक १ जनवरी १९३३ को श्याम मोहन के साथ उनका विवाह करा दिया , क्रान्तिकारी विचारधारा के समर्थक श्याम मोहन को भी एक साल जेल की नज़रबंद रहकर इसकी कीमत चुकानी पड़ी थी , शादी के बाद  दीदी दिल्ली में ही बस गयी थी,वह पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान मोहल्ले में एक विद्यालय का संचालन करने लगीं। कुछ समय वह दिल्ली नगरनिगम की सदस्य और दिल्ली महिला कांग्रेस की अध्यक्ष भी रहीं.वह  चुपचाप देश के लिए अपना कर्त्तव्य पालन का दायित्व निभाती रही , पर अपने प्रिय  भाई भगत सिंह, आजाद और भगवती चरण के चले जाने की गहरी मानसिक  वेदना , लगातार संघर्ष  और तनाव के कारण उनका स्वास्थ लगातार बिगड़ता चला गया और फिर १३ जनवरी १९६३ को वह ख़ामोशी से इस संसार से कूच कर गयी . , उनकी मृत्यु पर साथी क्रान्तिकारी वैशम्पायन ने यह कहा था कि '' दीदी  तुम्हे शत शत नमन , तुम्हारी पहचान अभी नहीं हुई है , पर  बाद में होगी'' .  देश के लिए प्राणों की बाजी लगाने वाली इस महान सत्यनिष्ठ वीरांगना  को स्वाधीन भारत में लोग आज भले ही भुला  चुके है , पर शायद कभी ऐसा वक्त भी  आएगा, जब  देश के प्रति उनके महान योगदान को पहचाना जायेगा .

                                                                                                               -  अनिल वर्मा 
                       
                 

Revolutionary Batukeshwar Dutt's daughther Dr. Bharti Bagchi

   क्रान्तिकारी बटुकेश्वर दत्त की  बेटी डॉ. भारती बागची 


भगत सिंह के परिवार के साथ 
माता पिता और माता विद्यावती के साथ 


भारतीजी,प्रो. जगमोहन, तिवारीजी और अनिल वर्मा 

डॉ. भारती बागची दत्त 


                   







                                                                                              महान क्रान्तिकारी बटुकेश्वर दत्त ने भगत सिंह के साथ ८ अप्रैल १९२९ को नईं दिल्ली की सेंट्रल अस्सेम्बली में बम विस्फोट करके ब्रिटिश साम्राज्य को समूल हिला दिया था . उनके साथी भगत सिंह , सुखदेव, राजगुरु ,चन्द्रशेखर आज़ाद आदि एक-एक करके वतन के लिए शहीद होते चले गए . दत्त बाबू  को असेंबली केस में कालापानी की सजा हुए थी. उन्होंने  १० वर्ष तक अंदमान की नारकीय जेल में कालापानी  की सजा भोगी थी  और फिर देश के आजाद होने तक भी काल कोठरियों  में बंद रहे . परन्तु यह विडम्बना है कि स्वाधीन भारत में उन्हें असहाय, निर्धनता, गुमनामी और जिल्लद भरी जिन्दगी ही नसीब हुई थी . वह महान क्रांतिवीर जिसके भगत सिंह के साथ  फोटो असेम्बली बम कांड के बाद देश के हर घर ,चाय  पान  की दुकानों तक में शीशे से मढे होते थे , वही स्वाधीनता के उपरांत सिगरेट कम्पनी में मामूली एजेंट के रूप में दर-दर की ठोकर खाने के लिए मजबूर हो गया था .उन्होंने उपेझा  का हर दंश सहन किया , पर स्वाभिमान से तना उनका शीश कभी नहीं झुका . 

                      बटुकेश्वर दत्त का विवाह उनके जन्मदिन १८ नवम्बर१९४७ को अंजलि देवी से हुआ था . अंजलि देवी का बचपन अपार वैभव और एश्वर्य में गुजरा था , पर दत्त बाबू के साथ उन्होंने नितांत निर्धनता और तंगहाली  को झेलते हुए भी एक आदर्श भारतीय नारी की भांति अपने पति का साथ खूब निभाया . दत्त बाबू की एकलौती बेटी भारती  का जन्म ८ जून १९४९ को पटना में हुआ था , उन्होंने बेटी को विरासत में अनमोल संस्कार दिए थे .  भारतीजी यह बताती है कि उन्होंने अपने महान पिता से बहुत कुछ सीखा था , कभी झूठ न बोलना , सबकी मदद करना और अनुशासन में रहकर देश और समाज के कल्याण के लिए कार्य करना , ये सब गुण पिता से ही प्राप्त हुए थे .दत्त बाबू की जन्म शताब्दी पर सन २०१० में नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित मेरी पुस्तक '' बटुकेश्वर दत्त : भगत सिंह के सहयोगी '' की रचना यात्रा के दौरान मुझे अक्टूबर २००९ में पटना में डॉ. भारती बागची  दत्त से अनेक बार वार्तालाप करके इतिहास को खखालनें का सौभाग्य मिला था , तब भारती जी ने यादों के बवंडर में डूबता-उतरते रुंधे कंठ से यह भी बताया था कि उनके पिता उनके लिए बहुत भावुक थे , जब वह सन १९६५ में दिल्ली के अस्पताल में मृत्यु  शैय्या पर थे , तब उन्होंने उनका हाथ पकड़ कर यह  कहा था कि '' बेटा भावुकता को जीवन में अधिक स्थान न देना , इसका कोई मोल ना  होगा और  मन को कष्ट ही होगा ''. भारती जी  ने  अपने पिता का अंतिम संस्कार करके बेटी के साथ बेटे का भी दायित्व निर्वाह किया था .

                              सन १९६५ में दत्त बाबू की मृत्यु के समय भारती ने कालेज में प्रवेश लिया ही था, माँ अंजलि देवी ने स्कूल की छोटी सी नौकरी उनका पालन पोषण किया , भारतीजी ने अर्थशास्त्र में पी. एच. डी. की है और वर्तमान में वह पटना के मगध कालेज में अर्थशास्त्र की रीडर है . सन १९६९ में भारती का विवाह होने पर अमरशहीद  भगत सिंह की माता विद्यावती देवी ने उन्हें घर की बेटी मानते हुए शादी का जोड़ा, गहने और अन्य भेंट भेजी थी . उनके पति भी मगध कालेज में प्रोफ़ेसर थे , उनकी सन २००६ में  मृत्यु हो चुकी है , उनके ३ बेटे है . भारती जी अपने पिता की भांति ही मृदु भाषी ,अत्यंत्र शांत और सरल स्वभाव की है . इस लेखक को उनसे मौसीजी के रूप में  माता के समान  स्नेह प्राप्त होता है . 

                     यह नैराश्य पूर्ण बात है कि पटना में न्यू जक्कनपुर स्थित जिस मकान में बटुकेश्वर दत्त अपने अंतिम दिनों में रहते थे , उसे आज तक  राष्ट्रीय धरोहर धोषित नहीं किया जा सका  है , दत्त बाबू को उनके जीवनकाल में स्वाधीनता सेनानी का दर्ज़ा तक न मिल सका था , उनकी मृत्यु के ४८ साल बाद भी अब तक उन पर कोई डाक टिकट जारी  नहीं किया गया ,जबकि  एक एक रन के लिए लाखो करोडो रूपये कमाने वाले पेशेवर  क्रिकेटर सचिन तेदुलकर पर कई  डाक टिकट जारी हो रहे है , पटना सहित पूरे देश में उनकी एक भी मूर्ति नहीं है , सन १९६५ में उनके घर को जाने वाली जिस गली का नाम ' बी. के . दत्त लेन ' रखा गया था , उसी नाम पट्टिका के बोर्ड के नीचे मोहल्ले भर का  कचडा  फेका जाता है .  यह विडम्बना है कि इस देश में जहाँ क्रिकेटर्स , फ़िल्मी कलाकारों और नेताओ और पूंजीपतियों को तो भगवान की तरह पूजा जा रहा है , पर देश को आजाद कराने वाले महान स्वाधीनता सेनानियों और क्रांतिकारियों को भुला दिया जाता  है  , बटुकेश्वर  दत्त ने अपना पूरा जीवन देश के  लिए कुर्बान कर दिया, पर इसी देश ने   उन्हें और उनके परिवारजनों को विस्मृत  कर दिया . दत्त बाबू की पत्नी और बेटी भारती को मेरी पुस्तक प्रकाशित होने के पहले तक बिहार सरकार  से कभी कोई मदद नहीं मिली , यहाँ तक कि उन्हें किसी कार्यक्रम में  आमन्त्रित भी  नहीं किया जाता था , हालाकि अब इस हालत में कुछ मामूली सुधार आया है ,  यह हम भारतवासियों का दुर्भाग्य है कि हम ना तो इस महान क्रान्तिकारी की स्मृतियों को उचित रूप से संजो पाए है और न ही उनके वंशजो को यथोचित सम्मान दे सके है .

                                   '' जालिम फलक ने लाख मिटने की फिक्र की ,
                                      हर दिल में अक्स रह गया , तस्वीर रह गई.''

                                                                                                                - अनिल वर्मा