Bhagat Singh ka Shahadat isthal : Central Jail Lahore

भगत सिंह  का शहादत स्थल : सेंट्रल जेल लाहौर 
                              



फांसी का फन्दा

शैडमैन चौक

                      












                                                                 २३ मार्च सन १९३१ शाम करीब  ७ बजे सेंट्रल जेल लाहौर में भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव ने काल  कोठरियों से बाहर आकर एक दूसरे के हाथ थाम लिए 
थे,  तभी भगतसिंह के कंठ से मार्मिक गीत फूट पड़ा और तीनो झूमकर गा रहे थे -

                                             '' दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फत ,
                                                    मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी .''

                          भारत माता के ये महान सपूत झूमते गाते फांसी घर की ओंर चले, उनके पीछे पूरा काफिला चला , आगे पीछे जेल के वार्डन , अगल बगल सरकारी अफसर और बीच में गूँज रहा था   आज़ादी के मतवालों का तराना , फिर फांसीघर आ गया , सामने मंच पर तीन फंदे झूल रहे थे , अंदर लाहौर  का अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर तीनो को खुला देखकर कुछ परेशांन  सा खड़ा था ,तभी भगत सिंह उसकी ओर मुखातिब हुए , वह बोले   '' Well Mr. Magistrate,you are fortunate to be able today to see how Indian revolutionries can embress death with pleasure for the sake of their supream ideal''

                                    भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव सीना ताने हुए जोश के साथ फांसी के मंच की सीढियों पर चढ़ें,भगत सिंह ने अपने साथियों से अलविदा कहा , इसके जबाब में उनके साथियों ने ''भगतसिंह जिंदाबाद''  के नारे लगाये , फिर तीनो के   '' इन्कलाब जिंदाबाद,   डाउन विथ इम्प्रिलिज्म,  डाउन विथ यूनियन जैक ''के नारों से पूरा आकाश गुंजायमान हो गया , जेल के बैरिको में निरुद्ध सभी बंदियों  के नारों के  स्वर भी जेल की दीवारो को भेदकर बाहर तक पहुच रहे थे.  भगत सिंह , राजगुरु  और सुखदेव ने फांसी के  फंदों को चूमा और अपने ही हाथो अपने गले में डाल लिया , तीनो वीरों के नारे आसमान की बुलंदियों को छू रहे थे, तीनो मित्रो के पहले पैर , फिर हाथ बांध दिए गए , चेहरे पर काली टोपी चढ़ा दी गयी ,   मजिस्ट्रेट ने घड़ी देखी  ७ बजकर ३३ मिनट , जल्लादों  ने मंच के नीचे आकर कांपते हाथो से चरखी घूमा  दी, तख्ता गिरा और फिर यह तीनो वीर एक साथ शहीद हो गए अपने  वतन के लिए .

                         इस ऐतिहासिक घटना के आज  ८२ वर्ष बाद इतिहास का पुनराविलोकन से यह ज्ञात  होता  है  कि लाहौर की वह सेंट्रल जेल, जहाँ भगत सिंह और उनके साथी शहीद हुए थे , अब  लगभग नस्त्नाबूत हो चुकी है , जिन कालकोठरियों में इन शहीदों को रखा गया था , वह खाक में मिल चुकी है . लाहौर में टेम्पल रोड के निकट जेल रोड आज भी बहुत शांत स्थान है , जिसके दोनों और शानदार लम्बे  वृछो की अनवरत श्रंखला है , यदि गुलमर्ग की ओंर जाये,  तो अभी भी दाँयी ओर सेंट्रल जेल की मिट्टी की एक दीवार के भग्नावशेष नज़र आते है. जेल की ऊँची दीवारों के पास जहाँ शहीदों की फांसी  का तख्ता था , अब वह ऐतिहासिक स्थल ट्राफिक सिग्नल का चबूतरा में तब्दील हो चूका  है , जिसके चारो ओर हर दिन हजारों  गाड़ियाँ गुजरती है, धूल और धुए के गुबार उभरते है और उनमें विलीन हो जाती है , इन शहीदों से जुडी अतीत की सुनहरी यादें .

                                       किसी ज़माने में सेंट्रल जेल लाहौर ( जिसे कोट लखपत जेल भी कहा जाता था )  इतने बड़े परिसर में फैली हुई थी कि जेलर  जेल के एक से दूसरे बैरक में जाने के लिए बग्घी का उपयोग करते थे, पर वहां अब एक टूटी फूटी दीवार के अवशेष के सिवा कुछ नहीं बचा है,  जेल के अधिकांश हिस्से को तोड़कर यहाँ एक शानदार' शैडमैन कालोनी ' बनायीं जा चुकी है, अब तो इस कालोनी का शुमार लाहौर के सबसे महंगे  और पाश  इलाके में होता  है, पर यह कहा जाता है कि फांसी के तख्ते वाली  भूमि के टुकड़े को खरीदने का  साहस काफी दिनों  तक कोई नहीं जुटा पा रहा था ,तो  पाकिस्तानी हूकुमत ने ठीक उसी जगह पर  ट्राफिक पॉइंट बनवा  दिया था , इस गोलचक्कर के   बारे में एक ओर दिलचस्प कहानी है ,यह कहा जाता है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिखार अली भुट्टो के आदेश पर  नेशनल असेंबली के सदस्य नवाज़ मोहम्मद खान की हत्या के लिए इसी चौक पर उस पर गोलिया चलायी गयी थी , जो उसके पिता अहमद रजा कसूरी  को लगी थी और वह बुरी तरह घायल हुए थे , कसूरी के दादा उन लोगो में से थे , जिन्होंने भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के खिलाफ गवाही दी थी और उनके शवो की शिनाख्त की थी, पुराने लोगो की  यह धारणा थी  कि  'नैमोसिस ' (बदले की देवी ) ने कसूरी परिवार को इस गोलचक्कर पर धर दबोचा था .

                              अखंड भारत के जिस लाहौर शहर में  क्रांतिकारी भगत सिंह और सुखदेव नॅशनल  कालेज में पढ़े बड़े थे ,  उन्होने आजाद के साथ मिलकर लाला लाजपत रॉय की हत्या का बदला लेने के लिए एडीशिनल  एस. पी. सांडर्स का यही वध करके राष्ट्रीय स्वाभिमान को जाग्रत किया था , भूख हड़ताले  की ,  जेल में जुल्म सहे  और   इस धरती को अपने पवान लहू से सीचा था  ,यह विडम्बना है  उसी लाहौर में यह  अमरशहीद आज़ादी के बाद बेगाने हो गए है , उन्हें पूरी तरह से भुला दिया गया  है , यूँ भी शहीदों का देशभक्ति के अलावा कोई मज़हब  नहीं होता है , फिर भी  न जाने क्यों पाकिस्तानी हूकुमत उन्हे अपना नहीं सकी है  और  आज तक  वहां  भगत सिंह और बाकी शहीदों का कोई स्मारक नहीं बन सका है , यद्दपि हाल  के कुछ वर्षो में  लाहौर की  फिजां  में कुछ बदलाव नज़र  आया  है ,अब यहाँ की  नयी पीढ़ी  भी भगत सिंह की दीवानी हो रही है ,  उनके दबाब के कारण हालाकिं प्रशासन ने  यहाँ भगत सिंह और उनके साथियों की  स्म्रातियों को संजोने के लिए एक भव्य स्मारक बनाने की  धोषणा की है और शैडमेन चौक का नाम भी  भगत सिंह चौक किया जाना प्रस्तावित  है , इस बारे में लाहौर हाईकोर्ट में एक रिट भी लंबित है   ,परन्तु  जब तक इस धोषणा  का क्रियान्वयन न हो जाये , तब तक पाकिस्तानी  हुकुमरानों  पर  यकीन   करना कठिन ही है .


                                                                                                             -   अनिल वर्मा
                                                                                          anilverma55555@gmail.com










Pilgrim of Immortal Martyrs : Hussainiwala

                                    अमर शहीदों का पावन तीर्थ : हुसैनीवाला


शहीदों के जीवान्त स्मारक
शहीदों की प्रतिमाएं
दत्त जी की समाधि
माता विद्यावती की समाधि
प्राचीन बुर्ज
शहीदों की समाधि

                 
 भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव ऐसे महान वीर थे, जिनके गर्व से तने शीश को ब्रिटिश साम्राज्य की अपार शक्ति भी झुका नहीं सकी  थी  . फांसी के बाद भी उनके पार्थिव शरीर अंगेजो पर इतने भारी पड़े थे  कि  गोरो को उनके शरीर के टुकड़े टुकडे  करके  मिटटी तेल से जलाने पर   भी  सकून हासिल  नहीं हो  सका था . पर इन शहीदों की नश्वर देह का एक कतरा भी जहाँ गिरा , वह धरा पावन हो गयी . २३ मार्च १९३१ की मध्यरात्रि में फिरोजपुर के पास सतलुज नदी के किनारे शहीदों के पार्थिव अंश अंग्रेजी हूकुमत के फौजी  दस्तें द्वारा आग के हवाले कर दिए थे ., परन्तु आग की रोशनी देखकर वहां  पर लोगो के आ जाने  पर फौजी उनके अधजले शव के टुकडे वही फेककर भाग गए थे .
                   
                    इसके बाद  दिन ,माह, साल गुजरते चले गए . आखिर शहीदों का खून रंग लाया और १५अगस्त १९४७ को हमारा देश आजाद हो गया. पर इसके साथ  बटवारे की गहरा  दर्द भी झेलना पड़ा , यह बलिदानी धरा  उस त्रासदी की मूक गवाह बनी , बटवारे के दौरान   लाखों  बच्चों , युवतियों एवं जवानो की खून से लथपथ लाशे और भीषण अनाचार देखकर यह धरा कराह उठी थी कि क्या इसी आज़ादी के लिए शहीदों ने  अपनी जिन्दगी कुर्बान की  थी. सतुलज की गोद रक्तरंजित हो गयी थी. यह  विडम्बना थी कि  जिस जगह इन शहीदों के शव के अधजलें  अंश हुए मिले  थे , उसी जगह से देश दो टुकड़ों में विभक्त हो  गया और  दुर्भाग्यवश शहीदों के रक्त से सिंचित यह भू-भाग पाकिस्तान की सीमा में चला गया. जनवरी १९६१ में जब दोनों मुल्को के बीच जमीन का समायोजन हुआ, तो शहीदों की पवित्र भूमि का यह हिस्सा भारत सरकार के कब्जे में आ गया  और  तब से हुसैनीवाला हैडवर्क्स के पास स्थित यह उजाड़ भूमि  राष्ट्र की  अमूल्य सम्पति और शहीदों का पावन तीर्थ बन गयी है  .
                                                                                   यहाँ सर्वप्रथम  शहीदों की स्मृति में स्मारक के रूप में ईटों का एक मंच बनाया गया था  ,जिसमें एक सीधी शिला थी , सन १९६१ में यहाँ पहली बार शहीदी मेले का आयोजन किया किया गया, जो अब भी प्रतिवर्ष अनवरत आयोजित किया जाता  है. सितम्बर १९६४ में जब यहाँ पंजाब के मुख्यमंत्री पधारे और  उनके प्रयासों से यहाँ ६५ हज़ार रुपये की लागत से एक भव्य स्मारक बनाया गया, जिनका शिलान्यास २३ मार्च १९६४ को  केन्द्रीय रक्षा मंत्री श्री  यशवंतराव चव्हाण ने किया था , १८ जुलाई १९६५ को क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त का निधन होने पर उनकी अंतिम इच्छा अनुसार  उनके  साथियों की समाधि के पास ही  उनकी  समाधि बनायीं गयी . फरवरी १९६८ के मध्य तक पंजाब सरकार ने नए सिरे से शानदार काले पत्थरों से समाधिस्थल बनवाया ,  २३ मार्च १९६८ को भगत  सिंह की ८६ वर्षीय वीर माता विद्यावती देवी ने अपने  तीनो सपूतो  की  प्रतिमाओं के सामने शीश झुकाकर उनकी शहादत को नमन किया था  तथा पंजाब के मुख्यमन्त्री लक्ष्मण सिंह  ने यह स्मारक राष्ट्र को समर्पित किया था .

                               सन १९७१ में भारत पाकिस्तान के मध्य युद्ध के बादल मंडराने  लगे , २ दिसम्बर १९७१ को पाकिस्तानी सेना के चार ब्रिगेड ने भारतीय सीमा पर भीषण हमला किया , जिसमे ५००० पाक सैनिक  एवं १५ टैंक  थे, भारत की १५ वी पंजाब रेजिमेंट ने मेजर ऍम . पी. एल.वरिय्या तथा मेजरसिंह के नेतृत्व में अत्यंत कम सैनिको के साथ  बहादुरी से लड़ते हुए पाकिस्तानियों को  आगे बढने से रोका, पर  एक बार फिर फिर यह समाधिस्थल युद्ध की विभीषिका  का गवाह रहा  और भारी गोलाबारी से स्मारक पूरी तरह तबाह हो गया, पास में स्थित प्राचीन बुर्ज की दीवारों पर तो भीषण गोलाबारी के निशाँ आज भी मौजूद है. पाकिस्तानी सैनिक  घोर नीचता दिखाते हुए स्मारक के पत्थर उठा कर ले गए थे . फिर  सन १९७३ में भारत सरकार ने तीनो शहीदों की जीवान्त कांस्य प्रतिमा के साथ भव्य स्मारक पुनः निर्मित कराया था  , १ जून १९७५ को माता विद्यावती भी अपने वीर पुत्रों के पास सदा  के लिए  आ गयी थी , यहीं उनका अंतिम संस्कार हुआ था .

                       हुसैनीवाला में भारत पाकिस्तान  सीमा पर बी. एस.एफ. का मुख्यालय है,यहाँ भी वाघा बॉर्डर की तरह  प्रतिदिन शाम को सूर्यास्त के समय दोनों देशो की सेनाओ द्वारा सीमा पर संयुक्त रूप से अपने अपने  ध्वज उतारने की रस्म बड़े ही जोश खरोश से  की जाती है. सन २००३ में जब मै  शहीदों को   श्रद्धांजलि अर्पित करने हुसैनीवाला  गया था , तब मेरा मन यह देखकर भावुक हो गया था कि इस  स्मारक से चंद कदमो की दूरी पर पाकिस्तान का चाँद सितारा वाला हरा झंडा फहरा रहा था और दूसरी तरफ था हमारा प्यारा   तिरंगा झंडा . परन्तु  जिस अखंड भारत की आज़ादी के लिये इन शहीदों ने लहू बहाया था , क्या उनकी कुर्बानियां व्यर्थ चली गयी है ? जिस तरह से जर्मनी के दो टुकड़े मिलकर फिर से एक राष्ट्र  हो गए है, क्या एक दिन वो भी वक्त आएगा,  जब भारत और पाकिस्तान फिर से  एक हो सकेगे.

                                                                                                        - अनिल वर्मा

Shaheed Saligram Shukla's Birth Centenary

                 आज़ाद के साथी :शहीद सालिगराम शुक्ल 


                                               चन्द्रशेखर आज़ाद  अपने नाम के अनुरूप  हमेशा आज़ाद ही रहें , पर देश  के नाम हो गयी उनकी जिन्दगी को बचाए रखने में कुछ योगदान उनके बहादुर साथियों का भी था ,जो सदॆव आज़ाद के लिये ढाल बने रहें / उन्ही में से एक क्रान्तिकारी  साथी थे सालिगराम   शुक्ल , जिन्होंने आज़ाद को बचाने  के लिए अपनें  प्राणों की आहुति  दे दी थी  / इस महान बलिदानी  क्रांतिकारी सालिगराम  शुक्ल की विगत १३ अप्रैल २०१३ को जन्मशताब्दी  थी ,पर यह अफ़सोस है कि देश में किसी  ने  इस गुमनाम शहीद को याद करने  की  जहमत भी नहीं उठायी । 
            
                                                        ८ अप्रैल १९१३ को  जन्मे  सालिगराम  के मन में  बचपन से ही देश की आजादी के लिए  कुछ करने की चाहत थी  । उन्होंने  कानपुर के डी.ए. वी. कालेज में  प्रवेश लिया था , जो उन दिनों  क्रांतिकारियों  का गढ़  बन चुका  था।  उन्होंने  क्रांतिकारी  दल में  प्रवेश करने के लिए  बहादुरी का परिचय दिया था , जब वह एक एक्शन के लिए इंदौर भेजे गए थे , एक्शन तो नहीं हुआ , पर वह २०-२५ भीलों  से मुकाबला होने  पर भी बच  निकले ,फिर  पुलिस के हाथो  पड़ने पर भी किसी तरह से अपना मौउज़र   पिस्तॊल  लेकर वापस लाने  में सफल रहे थे , वह  कानपुर में दल के विश्वस्त  साथी माने जाते थे। 

                                                        १ दिसम्बर १९३० की बात है।  उस समय तक  आज़ाद   के अलावा सभी प्रमुख  क्रांतिकारी  शहीद अथवा  गिरफ्तार हो चुके  थे , आज़ाद इन हादसों  से  विचलित होने के बावजूद  भी  दल के बचे कुचे साथियों  में किसी तरह से उत्साह  बनाये रखे हुए थे।  आज़ाद के निर्देश पर युवा क्रांतिकारियों की एक टोली निशानेबाजी  के  अभ्यास के लिए ग्रीनपार्क में   एकत्र  होने  वाली थी , आज़ाद को भी वहीँ पहुचना था , वैशम्पायन   आज़ाद के साथ थे।  सुरेन्द्र पाण्डेय उस दिन बड़ी  कठिनाई से गुप्तचरों  से पीछा छुड़ा सके थे , फिर भी रास्तें में उनकी सायकिल  धोखा  दे गयी , सालिगराम उनकी सायकिल  बदलनें के लिए डी.ए. वी. कालेज  हॉस्टल जा रहें थे, सुरेन्द्र पाण्डेय रास्ते  में रुके थे।  

                                            जब सालिगराम  कालेज के सामने पहुचे , तो सामने हॉस्टल की ओर  से सी. आय. डी. इंस्पेक्टर शम्भुनाथ के साथ  पुलिस का एक दस्ता  आता दिखाई दिया , पुलिस क्रांतिकारी  गज़ानंद पौदार को खोजने आई हुए थी ,अक्सिलियरी  फ़ोर्स  मुख्यालय की   तरफ से उन पर टार्च  की रौशनी पड़ी ,पुलिस ने उन्हें पहचान लिया था,शम्भू नाथ ने सालिगराम को बाहों  में जकड लिया ,पर सालिगराम  ने  खुद को छुड़ाकर  रिवाल्वर से लगातार फायर करना शुरू कर दिया ,उनकी पहली गोली का निशाना  एक सिपाही और दूसरी का निशाना   एक  पुलिस उपकप्तान  बना।   फिर सालिगराम  अपने साथियों को सावधान करने के लिए दो बार चिल्लाएं  ''पुलिस से सावधान ,पुलिस से सावधान '' , उनकी आवाज सुनकर चौकन्ने होकर सुरेन्द्र पाण्डेय  वहां  से बच  निकले।  परन्तु फिर गोलियों की जबरदस्त बौछार  आई और  सालिगराम  गोली लगने से वतन के लियें  शहीद  हो गये /उनकी खून से लथपत लाश सड़क पर पड़ी  हुई  थी , साइकिल और टिफिन बॉक्स भी पड़ा हुआ  था। थोड़ी देर बाद जब आज़ाद ,वैशम्पायन और नंदकिशोर  वहां  से गुजरे , पुलिस  आड़ में उनकी ताक  में थी , पर आज़ाद  ने  एक नज़र में ही पूरी स्थिति  भाँप  ली , उनके इशारे पर सब साथी बिना रुके  वहां से निकल गए, पुलिस आज़ाद को सामने देखकर भी न पहचान सकी।  आज़ाद ने बाद में काफी दुखी होते हुए यह  कहा था  कि ''आज हमने अपना एक बहुत ही बहादुर और भरोसे का साथी खो दिया है / ''

                         आज भी डी.ए. वी. कालेज  कानपुर  के सामने  सालिगराम शुक्ल  का स्मारक  बना हुआ है , जो कभी नौजवानों  और विधार्थियों  को  देशप्रेम के लिए प्रेरित करता  था।  आज स्मारक के सामने स्थित ग्रीन पार्क स्टेडियम में इंटरनेशनल क्रिकेट मैच देखने हजारो लाखो दर्शक आते  है , पर कोई  एक नज़र भी  उनकी प्रतिमा को नहीं देखता है ।  आज के युवाजगत के नायक क्रिकेटर है,  इन छदम नायकों के लिए हमने देश के वास्तविक महानायकों को भुला दिया  है ,यह विडम्बना है कि आज़ादी जिन कंधो पर चढ़कर आयी है ,उन्हें भुला दिया गया  है।  शहीद सालिगराम  की शहादत  को  भी हमने विस्मृत कर  दिया है।  भारत माता के इस महान सपूत को जन्मशताब्दी  पर  शत शत  नमन /
                                                                                                                                 -अनिल वर्मा 
Krantikari Saligram Shukal
Krantiveer Saligram Shukal
                                             

Hockey Wizard Dhayanchand Aur Tirange ki Shaan





                          हॉकी जादूगर ध्यानचंद और तिरंगे की शान
       
                           मेजर  ध्यानचंद को आज समूची दुनिया हॉकी जादूगर के नाम से जानती है , वह जितने  महान   खिलाडी थे , उससे भी महान इन्सान थे। आज के दौर में जहां कई खिलाडी चंद सिक्कों के लिए अपना ईमान बेच रहे है , वही दादा ध्यानचंद ने बेहद मुफलिसी में रहते हुए भी राष्ट्रहित को सदॆव  सर्वोपरि रखा था,  उन्हें अपने वतन के लिए बेइंतहा मोहब्बत थी।  उन्होंने भारत को ओलिंपिक हॉकी में  ३ स्वर्ण पदक तब दिलाये थे , जब हमारा देश अंग्रेजो का गुलाम था।  बर्लिन ओलिंपिक १९३६ में ३१ जुलाई को उदघाटन दिवस पर  मार्चपास्ट में भारत को नियम विरुद्ध रूप से जबरन ब्रिटेन की टीम के पीछे चलने के लिए मजबूर किया गया । तब पराधीन भारत में तिरंगा झंडा फहराना भी अंग्रेज सरकार  के खिलाफ विद्रोह का परिचायक था, पर ध्यानचंद ने बर्लिन ओलिंपिक के  फाइनल मैच के पहले टीम के सामने  तिरंगा झंडा रखकर अपनी नौकरी , शोहरत और जिन्दगी को दाव  पर  लगाते हुए  टीम में जीत की अलख जगा दी  थी। 

                      बर्लिन  में भारत हॉकी के फाइनल में पहुच गया था , यह मैच १४ अगस्त को नियत  था, पर उस दिन भीषण वर्षा के कारण  मैदान में पानी भर जाने से १५ अगस्त को यह मैच खेला जाना था।  भारत  का मुकाबला मेजबान जर्मनी से था, ओलिंपिक के पहले एक  अभ्यास मैच में भारत जर्मनी से परास्त हो  गया था, इसलिये  टीम काफी दहशत और दबाब में  थी। फिर उसी दिन एडोल्फ़ हिटलर भी मैच देखने आने वाला था और उसकी उपस्थिति मात्र  जर्मन टीम में जोश भरने के लिए काफ़ी  थी। इन हालत में  ध्यानचंद पर कप्तान  होने के नाते टीम का मनोबल बढाने  का अहम्  दायित्व था। 

                  १५ अगस्त की सुबह जब भारतीय टीम  ड्रेसिंग  रूम में एकत्र  हुई  , तब कप्तान ध्यानचंद नें बिना  कुछ बोले ही  टीम के सामने तिरंगा  झंडा रख दिया ,मानो यह कह दिया हो कि  अब तिरंगे  की लाज तुम्हारे ही हाथ में है।  सभी खिलाडियों ने बहुत सम्मान  के साथ ध्वज को सलामी दी और वह  वीर सैनिकों की भांति मैदान में उतर पड़े।   स्टेडियम में मौजूद ४०००० हज़ार दर्शको में से चन्द भारतीय  ही'' भारत माता की जय'' के नारे लगा रहे थे। परन्तु भारतीय खिलाडी देश के लिए जी जान   से खेले , दूसरे  हाफ में भारत ४-१ से आगे हो गया था ।  जर्मन तानाशाह  हिटलर अपने नाज़ी प्रोपोगंडा  मंत्री  जोसेफ गैबल्स और जोकिन रिब्रैनग्राफ  के साथ अपनी टीम की जीत के मसूबे लेकर स्टेडियम में आयाथा , उसने जीवन में हारना नहीं सीखा था , अपनी टीम को हारते देखकर वह गुस्से में मैच अधूरा  ही छोड़कर चला गया।  ध्यानचन्द  ने फिर ५ मिनट में ४ गोल किये, उन्होंने  उस मैच में कुल ६ गोल किये थे और  भारत   जर्मनी को ८-१ से रौदकर लगातार तीसरी बार ओलिंपिक विजेता विजेता बन गया।  सचमुच  उस दिन विश्व में तिरंगे  की शान बन गयी थी ,  तब कौन जानता  था कि ११ वर्ष बाद  १५ अगस्त ही भारत का स्वाधीनता  दिवस बनेगा। 

                                                                               इस  मैच के दूसरे दिन हिटलर ने  ड्यूस हॉल में अपने स्वभाव के विपरीत ध्यानचंद और भारतीय खिलाडियों को सम्मानित किया और ध्यानचंद  के  शानदार खेल से प्रभावित होकर उन्हें अपनी टीम में जनरल के पद पर आने का आमंत्रण दिया था, उस समय ध्यानचंद भारतीय सेना में केवल सूबेदार के छोटे से पद पर ही थे, परंतु  उन्होंने विनम्रता पूर्वक हिटलर का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। उन्हें अपना वतन जान से ज्यादा प्यारा था।

                               इसके पूर्व भी ध्यानचंद जी ने सन १९२८-२९ में महान क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद को  फरारी के दिनों में झाँसी में अपने घर मे शरण दी थी, आज़ाद ब्रिटिश हूकुमत के फरार मुजरिम थे और उन्हें जिन्दा या मुर्दा पकडवाने पर २५००० रु.  हजार का इनाम घोषित था। सरकार को इस बात का पता लगने की स्थिति में ध्यानचंद जी की नौकरी और जिंदगी को दोनों को खतरा था , पर  उन्होंने जीवटता पूर्वक आज़ाद को आश्रय  देकर भारत माता के प्रति अपने पुनीत  कर्तव्य का निर्भीकता पूर्वक पालन किया था । दादा  ध्यानचंद  का यह राष्ट्र प्रेम सबके लिए  अनुकरणीय  है। 









Krantiveer Sardar Ajeet Singh

Articles of Ajit Singh


                     

                                                                                                                                                                     
                                       क्रांतिकारी  भगत सिंह को आज सारा देश शहीदे-आज़म के नाम से नाम से जानता  है , पर भगत सिंह को क्रांति के पथ पर चलने के लिए प्रेरित करने वालें महान  क्रांतिवीर और  उनके यशस्वी चाचा सरदार अजीत सिंह को इस  देश ने भुला दिया है ।  अजीत सिंह ने मुल्क की आज़ादी के लिए पूरी जिंदगी कुर्बान कर दी  , वह ३७ साल तक देश के बाहर रहकर भी आज़ादी के लिए गहन संघर्ष में लीन  रहे।
                                   २३ फरवरी १८८१  को खटकरकलां जिला जालंधर , अब जिला नवांशहर  में पिता सरदार अर्जुन सिंह और माता जयकौर के यहाँ जन्मे सरदार अजीत सिंह को देशभक्ति विरासत में मिली थी।  उन्होंने डी.ए.वी. कालेज लाहौर में डिग्री प्राप्त की और लॉ कालेज बरेली में कानून की पढ़ाई छोड़कर वह स्वाधीनता आन्दोलन में भी सक्रिय रूप से जुट गए । उन्होंने अपने भाई सरदार किशन सिंह के साथ मिलकर '' पगड़ी सम्हाल जट्टा '' का नारा देकर पंजाब के गरीब किसानो को स्वाभिमान से रहकर देश की आज़ादी के लिए जाग्रत किया था।  
                                  वह आर्य समाज के संस्थापक  सदस्यों में से एक थे, सन १९०७ में उन्हें ब्रिटिश हूकुमत द्वारा लाला लाजपत राय के साथ बर्मा की मांडले जेल भेज दिया ,वहां  से रिहा होने के बाद भारतमाता सोसाइटी की क्रांतिकारी  गतिविधियों के कारण  अंग्रेजों  की आख की किरकिरी बन गये , उन्हें राजद्रोह में फाँसी देने का षड्यंत्र रचने की खबर मिलने पर , वो सूफी अम्बा प्रसाद के साथ ईरान चले गए और वहां क्रांतिकारियों का एक केंद्र स्थापित किया।  इसके बाद वह जर्मनी,तुर्की, पर्शिया,अफ़ग़ानिस्तान,रोम ,  जिनेवा, फ्रांस, ब्राज़ील पूरी दुनिया में जाकर देश की आज़ादी के लिए संघर्ष करते रहे, पर अंग्रेज सर् कार  उन्हें पकड़ न सकी  . सन १९१८ में वह सेनफ्रंसिसको में   ग़दर पार्टी के संपर्क में  भी रहें। सन १९३९ में दुसरे विश्व युद्ध  के दौरान  यूरोप चले गए और नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के साथ मिलकर स्वाधीनता प्राप्ति के अभियान  में जुटे रहें।

                                        अप्रैल १९४६ में सरदार जी गिरफ्तार  होकर जर्मनी के एक कैम्प में नज़रबंद थे , पूरे देश में उनकी रिहाई  का आन्दोलन होने और अंतर्राष्टीय दबाब पड़ने पर मजबूरन अंग्रेजों  को उन्हें रिहा  करना पड़ा। मार्च  १९४७ में देश की आज़ादी का सपना पूरा होने पर वह ३७ वर्ष बाद मुल्क वापस लौटे थे , पर देश के बटवारे का गम उनके मन पर छा गया था  , वह कहने लगे थे  कि '' ना  जवाहर देख रहा है  ना  जिन्ना , दोनों तरफ खून की नदिया बहा जाएगी ,मै यह देख नहीं सकूगा  , मै  जा रहा हूँ। '' लोगो ने सोचा कि वह  फिर से विदेश जाने की बात कर रहे है , किसी तरह उनकी पत्नी बीबी हरनाम कौर ने उन्हें रोका।   १४  अगस्त 1947 को जब रात  १२ बजे वह रेडियो पर आज़ादी के समारोह का प्रसारण सुनते रहें ,वह देश की आज़ादी का यज्ञ पूर्ण होने से बहुत प्रसन्न थे।  सुबह ४ बजे जब स्वाधीन भारत में  सूरज की पहली किरण ने उजियारा किया  , तब उन्होंने  अपने घरवालो को जगाकर कहा कि  'मेरा मकसद पूरा हो गया है अब  मै जा रहा हूँ ,दुनिया भर में फैले मेरे दोस्तों के लिए  मेरा संदेश लिख लो' , पर घरवालो ने डॉक्टर की सलाह पर  उनकी बात न मानी।  उन्होंने पत्नी सरदारनी हरनाम कौर को बुलाया और उनके पैर छूकर कहा कि '' मै  भारत माता की सेवा में लगा रहा , तुम्हारी  सेवा के फ़र्ज़ को पूरा नहीं कर सका, मुझे  माफ़ करना। '' फिर सरदार अजीत सिंह ने अंतिम बार  ''जय हिन्द '' का नारा  बुलंद किया  और  इच्छा  मृत्यु के साथ जीवन त्याग दिया। पौराणिक वीर भीष्म के बाद अजीत सिंह के अलावा ऐसी स्वेच्छा  मृत्यु  किसी और को नहीं मिली है ।  वास्तव में सरदार अजीत सिंह हमारे देश की क्रांति के भीष्म ही थे। पर्यटन स्थल डलहौजी में पंचकुला की हसीन वादियों मे स्थित  उनकी समाधि  देश के लिए  महान बलिदान  का स्मारक है। 

                                                                                        -अनिल वर्मा          anilverma55555@gmail.com